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दिन विषयक

मैं इतना गुस्सा क्यूँ करता हूँ ? किस बात की चिढ़ है मुझमें ? यह मुझे क्यूँ नहीं स्वीकार होता है कि जिसे मैं अपना सबसे करीबी मानता हूँ उसका कोई और करीबी हो सकता है। उसकी योजनाओं में नहीं भी हो सकता हूँ मैं। मैं कहीं नहीं हो सकता..मैं क्यूँ चाहता हूँ कि वो बस मुझे महत्वपूर्ण माने.. यह गलत बात है। 

मैं कभी कभी बातचीत के दौरान ऐसे शब्दयुग्म इस्तेमाल कर जाता हूँ जिसके लिए फिर महीनों पछतावा होता है। मैं नहीं समझ पा रहा ऐसा क्यूँ हो रहा है। मैं जानता हूँ आसावधानी से बोला गया एक शब्द हमारी वर्षों की मेहनत पर पानी फेर देता है। बहुत करीबी का भी मन दुखा देता है, फिर मैं क्यूँ नहीं छोड़ पा रहा हूँ इसे... 

मुझे बहुत स्थिर और व्यवस्थित होने की जरूरत है। मुझे चुप रहने की जरूरत है।

मैं कहीं दूर निकल जाना चाहता हूँ घूमने... मगर कैसे ? न जेब में धन है न साथ जाने वाले का मन 

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रिश्ते ख़ालिस भावनात्मक होते हैं, वो मन से चलते हैं , वहाँ बुद्धि लगाने पर सब चौपट हो जाता है। 

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कल रात नींद नहीं आई। आँसू रह रह कर आते रहे। बीते दिनों की याद आती रही, पिछले वर्ष भी इन दिनों..  ख़ैर। 

अभी जब मैं शहर में हूँ तो वो नहीं है, फिर मैं चला जाऊंगा तो वो आएगी... जाने कैसे देख पाउँगा जब मिलूँगा उसे.. मिलूँगा भी या फिर इंतज़ार करना होगा.. राम जाने।

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गद्य साहित्य का इतिहास पढ़ना शुरू किया है। आज दिन भर मन लगा नहीं मुश्किल से 50 पन्ने पढ़ पाया होंउँगा, बैठा सुबह से कुर्सी पर ही हूँ, सुबह लक्ष्मण सर गए थे, उन्होंने अपनी गजलें सुनाई,  कभी कभी उनकी गज़लों में सोच सोचकर लगाए गए शब्द दिखते हैं, स्वतः उतरे भाव नहीं, वो कविता सुंदर लिखते हैं, पढ़ाते अच्छा हैं। आदमी ईमानदार हैं। एकनिष्ठ हैं परिवार के प्रति जिम्मेदार हैं। राजनीति नहीं करते। जो ज्यादा सुखद है। 

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मैं कोई यात्रा वृतांत पढ़ना चाहता हूँ.. मैं कल्पनाओं में ही सही मगर इस सारे परिदृश्य से दूर होना चाहता हूं कुछ पल को... यह दो ही तरह सम्भव है पहला उसके सीने से लग सकूँ..या कोई यात्रा वृतांत पढ कर उन जगहों की कल्पना करके। 

मैं अपने चल रहे जीवन का 98 फीसदी कल्पना करके ही जी रहा हूं।

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महीनों से एक कविता का ड्राफ्ट पड़ा था आज अचानक एक स्मृति से वो कविता पूरी हो गई। वो बात यूँ है कि अपने बचपन में मैं बहुत फैशनी था, हर चीज़ अच्छी चाहिए होती थी, समझौता नहीं करता था बिल्कुल...ज़िद्दी था बहुत।  और जीवन उल्टा था, पिताजी की नौकरी थी नहीं, मामा मेरे इसी स्वभाव पर कभी कभी कहते थे.. 'हगे का गाडिन न लीलय का बेल' यानि अवकात से अधिक की इच्छा। तब ये बात चुभती थी। अब लगता है ठीक कहते थे। 

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सब अच्छा है। बहुत अच्छा। 

― 8 फरवरी 2025 / 9 बजे शाम  

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