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साफ पानी की तलाश

गर्भ जब मां के पेट से बाहर इस दुनिया की तरफ बढ़ता है तो सबसे ज्यादा और सबसे पहले उसे जो शब्द सुनाई पड़ते हैं वह जीवन भर उन्हीं शब्दों का अनुकरण करता रहता है.... हम सब खुद को थोड़ा सा और जोर लगाते, धकियाते बढ़ते रहते हैं उम्रभर। न जाने बढ़ते रहते हैं या घटते रहते हैं। यह भी अजीब प्रश्न है, मगर यह तो प्रश्न।

इस प्रश्न के प्रतिउत्तर में जितने भी तर्क हैं, सब कुतर्क हैं। 

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मन को मन जैसा महसूस करने के लिए मन का कुछ कुछ होते रहना जरूरी है। बिना बारिश के धरती भी पानी देना बंद कर देती है। 

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सुबह आंख खुलते से धूल और गंदगी से लिपटा रहा, फिर भी सब साफ़ नहीं हुआ, सब कुछ है ही इतना गंदा की जिससे साफ करना चाहते हैं वही गन्दा हो जाता है। फिर साफ से गन्दा हुए को साफ करना पड़ता है। और फिर वही..  
जबसे गाड़ी ली है पहली बार वह इतने दिन बन्द खड़ी थी, धूल और गंदगी से सनी हुई, अपने को धुलने से पहले उसे धुला, फिर स्टार्ट करते रहा न स्टार्ट हुई, शायद नाराज़ हो गई थी कि मैं तो तुम्हारे लिए हर कदम खड़ी रही, फटे टायर भी घसीटा तो चली, तुम मुझे छोड़कर चले गए, माफ़ी माँगा, साफ सफाई की, पैदल लेकर निकला कि देखे क्या हुआ है, ये इतना नाराज़ की मानने और स्टार्ट होकर चलने के लिए मेरा ढाई घंटा लीं... ख़ैर यह उनका हक़ है। 

पैदल पैदल जब इन्हें लेकर जा रहा था तो इनसे बतिया रहा था। मैंने पूछा तुम तो 18 ही दिन चुप थी, दूर थी तो तुम्हें खुलने में इतना समय लग रहा है, जो आदमी महिनों से बन्द है वह तो फिर इस जन्म खुल ही नहीं पाएगा.? इतनी नाराजगी ठीक नहीं है! कुछ बोली ही नहीं..इनका नाटक जायज भी है। मेरे घर को यह बड़ी पसंद हैं, वो उनकी आवाज़ से पहचान लेती है इन्हें... इनके टायर फटने पर घण्टों धूप में खड़ी होकर 
सही करवाया था। 

नाराजगी दूर हुई तो हम दोनों निकले फिर उस ओर जिधर जीने लायक कुछ है..थोड़ा जिया, रोया, पीछे के शीशे में अजनबी चेहरों से साइड लेते लौट आया फिर। अब वह खुश नीचे खड़ी हैं.. मैं ऊपर अकेले स्मृति में झूलता बैठा हूँ। 

सबसे ज्यादा नाराज़गी सबसे ज्यादा उम्मीद हमें अपने प्रिय से ही होती है, क्योंकि हम वहीं अपने सच्चे रूप में होते हैं। सच्चाई समर्थन मांगती है। 

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कमरा सूखे फूलों का स्थायी घर हो गया है। मेरा घर यह कमरा कभी कभी होता है। 

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घर फोन नहीं किया, घर से फोन नहीं आया।

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बचपन से अब तक मैं जिस भावना, जिस समर्पण और सहज उपलब्धता के साथ जिसके साथ जुड़ा वहाँ वहाँ मुझे प्रेक्टिकल होना सिखाया गया। सीख रहा हूँ। मरने तक सीख जाऊँगा।  

भावना से भरे होने में सुख है। 

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एक लोग ने पूछा आपका इस बार भी नही हुआ पीएचडी में.. मैंने कुछ जवाब नहीं दिया। उन्हें कैसे बताएं जीत हार उन घोड़ों की किस्मत है जो रेस में दौड़ते हैं। मैं ऐसी रेस को अपने योग्य नहीं मानता। और अब पीएचडी में दाखिला और नेता का ईमानदारी से चुनाव जीतना, दोनों एक बात है। ईवीएम हैक नहीं होता, वोट तो पड़ता है न उसमें ? फर्ज़ी। 

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होमियोपैथी की दवा और जहर की बूंद का स्वाद एक जैसा ही होता होगा, होमियोपैथी से मरता नहीं बस आदमी।

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किताबों के साथ नए तरीके से बैठना शुरू करना है, अभी तुरंत से..

― 7 फरवरी 2025 / 11: 30 रात 

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