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काश ! फरवरी कल ही बीते


कभी डर से इस शहर से भागता हूँ, कभी फिर जीने का सहारा खोजते लौट आता हूँ।

शहर जाम से पटा पड़ा है। आदमियों से ज्यादा गाड़ियां हैं। मुझे बन्द गाड़ियों में यात्रा करना बहुत खलता है। सिर फटने लगता है, उल्टियां होती हैं। हुआ भी वही सब.. 

लोग इतने अनियंत्रित और अव्यवस्थित हैं कि उन्हें देख देख कर मन में क्रोध भर जाता है। रास्ता आँख मुँह बन्द किए जैसे तैसे कटा, 9 किलोमीटर की पद यात्रा के बाद जैसे तैसे कमरे पर पहुँचा.. 

आज कमरे पर पहुँचने की जल्दी नहीं थी। बस था कि पहुँच जाऊँ, उस गन्ध के आसपास, उन चीज़ों के आसपास जहाँ से दूरी का आभास घटता है। फूल सूख गए हैं, इतने की छू दिया तो धूल की तरह बिखर गए, इन्हें उसके लिए लाया था, उसे सफेद फूल बहुत पसंद हैं, महीनों से उसे दे नहीं पाया, आज एक जगह देखा, मगर लेने का कोई अर्थ महसूस नहीं हुआ.. किसी दिन मैं फूलों की दुकान खरीदकर उसे दे दूँगा । मन तो आज ही था मगर दूँगा कैसे ? कह भी तो नहीं सकता.. नीचे आओ जरा.. गली में खड़ा हूँ ' 

शहर में इतनी भीड़ है, इतने लोग लेकिन एक अनुपस्थिति सबको अर्थहीन कर देती है, लग रहा है कोई नहीं है। कहाँ ही है कोई , गाड़ी के शीशे में दिखने वाला कोई नहीं है। न यह पूछने वाला कि थक गए हो ? आते ही मन हुआ..गाड़ी पर कपड़ा मारूँ और गली तक चला जाऊं.. फिर.. 

उस सड़क तक गया था जहाँ.. जहाँ उन आँखों में अपने जाने का दुःख देखा था। अभी यहीं किनारे बैठा हूँ।

अनुपस्थिति में हमें उन जगहों से सांस मिलती है जहाँ कभी वह उपस्थित था। 

यही वह जगह जहाँ उसने कहा था.. ' कैसे भी 5 मिनट में आप मेरे सामने होंगे..' 
काश! फिर से डाँट कर पुकार ले मुझे, मैं उसके पाँव चूमता और कहता.. आशीर्वाद में यही बात फिर से बोल दो..

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सजीव या निर्जीव किसी भी रूप में अपने आत्मीय के पास बने रहने की कोशिश ही प्रेम सम्बन्ध की धड़कन है, जब तक एफर्ट नाम की धड़कन चलती रहती है सम्बन्ध सांस लेता रहता है। सांस ही नहीं लेता, चलता, फिरता उछलता कूदता रहता है।

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कुछ लोग हमारी सारी उर्जा होतें हैं। 

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बीमारी, थकान, स्मृति और भूख में मैं बच्चों सा चिढ़ता हूँ मुझे स्पर्श चाहिए होता है, कोई है का आश्वासन चाहिए होता है। 
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ऐसी फरवरियों को बीतकर मार्च हो जाना चाहिए जिनमें प्रिय का साथ न हो....

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जिन दिनों की कल्पना हम औसत दिनों से लग कर लेते हैं, मन को कुछ बता देते हैं, फिर जब वह कल्पना टूटती है तो कुछ भी खुशी नहीं दे पाता, आते ही कैलेंडर से एक इच्छा मिटाया...  और भी जो हैं धीरे धीरे हटा दूँगा। जो जो इच्छाएँ मेरी भावनात्मक कमजोरी है, उसे दूर करूँगा, अपनी भावनाओं के लिए किसी पर बोझ देना ठीक नहीं... 
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नियति के निर्णय !

ख़ैर ठीक है सब । 

― 6 फरवरी 2025 / 9 बजे शाम 

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