टूट रही है देह। मन.. मन जैसा नहीं है। पिछले कई घण्टों से बस खड़ा हूँ। भोज सम्पन्न हुआ। उम्मीद करता हूँ दौड़भाग का अब तिरोहन होगा। घर अभी आया लौटकर अकेले। मेरा कहाँ कोई होता है मैं सेतु हूँ मुझसे होकर लोग पार होते हैं, भूल जाते हैं। दीदी लोग कल चली जाएँगी अपने घर तो पापा भी वहीं रुक गए हैं। मम्मी वहीं हैं ही पिछले आठ दिन से। मैं ही दौड़ रहा हूं। हर रोज़ अकेले बैठकर कमरे पर मन भर आँसू बहा लेता हूँ। मन ठण्डा हो जाता है। भीतर अजीब सी खीझ भरती जा रही है। मुझे वह सीना चाहिए जिसमें मैं अपना चेहरा छिपाकर सो सकूँ। एक गोंद या एक हाथ जो मुझे सुला सके। बिस्तर पर अकेले पड़ा हूँ। आसपास आवाज तक का सहारा नहीं है। मैं आवाज़ देना चाहता हूँ। कहना चाहता हूँ....
गहरी थकन हावी है। भीतर लग रहा है जैसे कोई चल रहा है। काश! नींद आ जाए।
पिछले कुछ सालों से और इन दिनों जो जीवन देख रहा भीतर यह डर गहरे बैठता जा रहा कि मैं लावारिश की तरह मरूँगा। कही किसी कमरे में कहीं पड़ा रहूँगा कोई देखने नहीं आएगा महीनों.. ख़ैर
मैं मरने की तरह सोना चाहता हूँ।
― 27/ 02 / 2025 / 10 : 20 रात
Aisa kyu sochte hai aap...sb acha hoga❤️
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