सब जगह होता हूँ और हर जगह छूट जाता हूँ। जिंदगी विनोद कुमार शुक्ल की कविता हो गई है। सारी जिंदगी पहले के ही कुछ सालों में थी। अब उस शुरू किए को पूरा करने की जदोजहद है। जदोजहद अधूरी रह जायेगी। जहाँ मन ऊब जाएगा वहीं मान लूँगा पूरी हो गई। अलग बात है पूरा कुछ भी नहीं।
जुकाम बुखार की तड़फ। उनींदी रात। गाय। दूध। कुछ पल को केश कर्तनालय। खरीदी। फिर. ननिहाल। भागवत। दिन भर बुखार रहा। दवा खाया। चलता रहा। शाम फिर वही। गाय चारा दूध। रात पिताजी आए। मम्मी वहीं हैं तो घर उन्हें काटने दौड़ रहा था। कह रहे थे उनके बिना जीवन का कोई अर्थ नहीं घर तो बहुत छोटी चीज़ है। लेकर गया वही। सबसे मिले। नाना पापा को गले लगाकर रोए। नानी भी। मना करते रहने के बाद मामी लोग पाँव धुलीं। थोड़ी देर टहल घूम कर चले आए। हर दूसरी बात र तुम्हारा ज़िक्र होता है। मैं नेपथ्य में रहता हूँ। यूँ लगता है मेरे होने का अर्थ इतना है कि मैं तुम्हारा आदमी हूँ। सब परिवार इकट्ठा था । मामा अपनी बहनों को पा फूले नहीं समाते। नाना नानी अपना परिवार इकट्ठा देख कुछ कुछ देर पर भावुक हो जाते हैं। नाना बड़े नाजुक मन के हैं। मैं दिखता रहूँ तभी उनको भरोसा रहता है कि सब ठीक हो रहा होगा। जो जो उनके विभाग और संघ के लोग आते हैं सबसे ऐसे बताते हैं जैसे मैं कोई बहुत बड़ा कुछ हूँ जबकि मेरी क्या औकात। मेरे साथ साथ तुम्हारे बारे में भी बताते रहते हैं सबसे...अरे हमारी ...।
पाँव दुख रहा है। मन भी। एक तरफ से खुश जैसा हूँ। एक तरफ़ से खाली सा मन बार बार वहीं अटका है। दो महीने हो गए। मैं कैसे जी रहा हूँ यह बस मेरी आत्मा जानती है या मेरी आँख। इतनी यात्रा करनी पड़ रही है तुम्हें..! काश यह सब यहीं रुक जाता तो ठीक रहता। फिर क्यूँ जाना कहीं। मन बहुत कुछ कहने को होता है पर डर लगता है। न कह पाया वैसे जैसे सोच रहा तो..? अपने हिसाब से ही करो। तुम समर्थ हो हर चीज के लिए। ईश्वर ऐसे बनाए रहें।
अब मुझे बस शहर आना है। मैं जिम्मेदारी से नहीं भाग रहा। बस तुम्हारे पास आने तुम्हें मनभर सीने से लगा लेने का मन है अब.. यहाँ रहना न रहने की ही तरह होगा। पर रहूँगा।
― 22 फरवरी 2025 / 10 : 30 रात
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