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तुम अपने चरणों में रख लो मुझको

निर्वासन सा महसूस होता रहता है। कहाँ से ? यह पता नहीं। मगर लगता है कहीं हूँ ही नहीं। जिस परिवार के लिए जूझता रहा, अपने को खपा दिया, वहीं मुझसे कोई बातचीत ही नहीं है। सूचनाएं दुसरो से मिलती हैं। लगभग रोज फोन करूँ तो बात हो न करूं तो पलट के कोई पूछता तक नहीं। मैं देर तक निहारता रहता हूँ राह, कोई पुकारे , कोई कभी तो कहे कि .... ख़ैर.. यह स्वीकार करना कितना कष्टकारी है कि धीरे धीरे अपने भाई बहन भी पड़ोसी बन जाते हैं। अनन्तः आपका कौन है आपकी माँ और बीबी के सिवा.. ? वो भी एक दिन नहीं पूछें तो कोई अचरज नहीं होगा।  

मेरे भीतर कल्पनाओं का एक संसार है, जहाँ मैं अपनी रचनात्मक उठापटक के साथ रहता हूँ। मुझमें घनघोर कामना है। वासना नहीं है। है भी तो वह उसी की है जिसके लिए होनी चाहिए। मैं घण्टों चुप रहता हूँ, कम बोलता हूं , बाहर लोगों से इंटरैक्ट नहीं हो पाता इसका यह मतलब बिल्कुल नहीं कि मैं आ अकेले रहना चाहता हूँ, मैं चाहता हूँ कि कोई है को महसूता रहूँ और रहूँ। मैं रहने की तरह रहना चाहता हूँ। अतिक्रमण की तरह नहीं। मैं जीने की तरह जीना चाहता हूँ मरते रहने की तरह नहीं। 
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बहुत शांति में सबसे गहरी अ-शांति होती है। बहुत सुख में सबसे ज्यादा दुःख। बहुत ईमानदार ही हो सकता है बहुत बड़ा बेईमान। बहुत सीधी सादी बात के हो सकते हैं बहुत टेढ़े अर्थ और बहुत टेढ़ी बात का हो सकता है बहुत सरल सा सपाट सा अर्थ। जैसे इतना कहने का केवल एक अर्थ है कि इंद्रधनुष के सारे रंग उसी सूर्य के हैं जिसे हम केवल नारंगी रंग से रंगते हैं। 

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मैं लिखने के विषय में सोचता नहीं, लिखते हुए सब जिया हुआ सोच लेता हूँ, लिखने से पहले और लिखने के बाद बस जीता हूँ जितनी आत्मीयता जितने खुलेपन के साथ जिया जा सकता है। 
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छोटी छोटी स्मृति में बड़ा बड़ा सुख तलाशता रहा, चीजें यहाँ से वहाँ करता रहा, कभी फूल पकड़कर रोया कभी एक कागज का टुकड़ा, भीतर से जीवित सा महसूस हुआ। बहुत कुछ लिखने और कह देने का मन होता रहा पर लगभग रोक लिया। दिनभर एक गाना सुनता रहा हेमंत कुमार की आवाज में। हेमंत कुमार की आवाज में प्रेम गीत भी साधु की पुकार लगता है, सुबह 11 बजे से लूप पर चल रहा था कितनी बार चला होगा पता नहीं। बस वही एक गाना। * 
पता नहीं क्या क्या पलटा, खोजा, पढ़ा, कुछ याद नहीं। भयंकर धूप थी तो बाहर नहीं निकला। अंदर ही जो कर सका किया। 
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न जाने क्यूँ लगता रहता है जैसे मैं देह नहीं हूं। या जब देह हूँ तो मुझे वह देह चाहिए जिसे मैं चाहता हूँ। मैं स्पर्श से ही जीता रह सकता हूँ, जैसे पौधे बिना पानी मुरझा जाते हैं वैसे मैं ....  यह बिल्कुल भी सेक्सुअल नहीं है। या हो भी सकती है पता नहीं। मेरे मन में तो नहीं आता। मगर मन चाहता है वो रहे। हम अपने भीतर बनते भावनाओं को इतना दबाने लग जाते हैं कि एक समय बाद हम उन्हें कहना भूल जाते हैं, छुवन को छुवन की तरह नहीं झिझक की तरह लेने लगते हैं। दबाव हमारे व्यक्तित्व में खीझ भरता है, हम ऊबे और चिड़चिड़ाते रहते हैं, अच्छे हार्मोन्स ही नहीं आज़ाद होते की हमें अच्छा महसूस हो। पता नहीं क्या कह रहा हूँ.. 

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जहाँ जहाँ विश्लेषण की जरूरत है हम वहाँ वहाँ विशेषण बन जाना चाहते हैं। हमारी समस्याओं का मूल यही है। हम क्यूँ भूल जाते हैं कि संज्ञा भी सर्वनाम होता है। और सर्वनाम भी संज्ञा.. 
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कभी कभी मन करता है अपने को आईने के सामने खड़ा करूँ और इतने तप्पड़ मारूँ की चेहरे की रंगत बदल जाए। 

― 23 मार्च 2025 / 9 : 20 रात 

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