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जो कुछ मुझे दिया है वो लौटा रहा हूँ मैं

सुबह सुबह बारिश हुई। उठकर बाहर टहलता रहा। पेड़ पौधों पर जमी धूल साफ हुई। बौर धूल गए। हवा थोड़ी ठंडी हुई । मार्च ही में जो जून सा माहौल है कुछ हल्का हुआ। मैं देर तक बैठा रहा। राग रामकली सुनता रहा। मुझे बारिश बहुत पसंद है। न जाने क्यूँ 
ख़ूब सूखे पत्ते गिरे हैं। अब उठता हूँ पर कोई है नहीं जिसे दे सकूँ। अपने आप को आप कुछ नहीं दे सकते सिवा दिलासा के। 

एक कहानी पढ़ी अमरकांत की 'मौत का नगर' । जातीय हिंसा की पृष्ठभूमि पर है। कथ्य अच्छा है, शिल्प भी अच्छा है पर कहानी कमजोर है। कुहासा कहानी पढ़ी है अमरकांत जी की और भी बीसियों कहानी पढ़ी है। अमरकांत जी के भीतर के कहानीकार का फ्लेक्चुएशन  होता रहता है । कभी कभी यूँ लगता है वह लिखने कुछ और बैठे थे लिख गयी कहानी, या उन्हें लग गया यह कहानी है तो उसे जहाँ लगा कामभर का हो गया वही छोड़ दिया। इनकी कहानी इंटरव्यू,  गले की जंजीर, ज़िंदगी और जोंक, फ़र्क, कबड्डी, यह अलग टेस्ट की कहानी हैं। ख़ैर ! मैं ग़लत हो सकता हूँ। मगर यह मेरा अपना अनुभव है। 

दिन भर इधर उधर न जाने क्या किया। कुछ काम किया कुछ पढ़ा। साहित्य इतिहास के लगभग 30 पन्ने पढ़े। दोपहर के बाद से मन न जाने क्यूँ अजीब सा हुआ है मन कर रहा है बैग उठाउँ और नर्मदा के किनारे भाग जाऊँ। पहाड़ में कहीं बैठा रहूँ। फोन फेंक दूँ। ऐसा कुछ पास न हो जिससे मुझे मेरी अपनी दुनिया से ज्यादा कहीं का कुछ पता चले। मुझे इन दिनों न जाने क्यूँ बार बार मन करता है मैं एक छोटा सा कुत्ता पाल लूँ या गिलहरी मिल जाए कहीं से जो मेरे आसपास रहे। चलती रहे मेरी देह भर पर।

शाम देर तक मंदिर की चौखट पर बैठा रहा पीठ किए। दर्शन नहीं किया। न सर झुकाया। मन नहीं किया। बात करते हुए कई बार मैं कहना कुछ चाहता हूं कह कुछ और जाता हूँ। दरअसल मैं कह भी कुछ रहा होता हूँ पर वह वह निकलता ही नहीं या वह सम्प्रेषित नहीं होता समझ नहीं आता। चुप हो जाता हूँ। 

शाम से कई लोगों से बात हुई। जीजा से बात हुई। उनके पिताजी का स्वास्थ्य वैसा ही है। पापा से घण्टों बात हुई। घर परिवार उनके ननिहाल गाय बछड़ा खेती बाड़ी, उनके पान प्रेम मम्मी की लापरवाही और सब सब पर .. ठीक हैं। कह रहा हूँ आइए दिखा लेते हैं तो मान नहीं रहें हैं। दोनों लोग आना कानी कर रहे हैं। अपने आप को लेकर इतनी लापरवाही है कि पूछिए मत। 

भीष्म साहनी की कहानी दो गौरैया पढ़ी। नेपथ्य में महादेवी की गिल्लू याद हो उठी। 

मैं अभी बहुत कुछ कहना चाहता हूं.. लेकिन सब शायद वही है जिसके जवाब में केवल हम्म सुनने को मिलेगा। मैं सुन लिया। कह दिया। 

― 20 मार्च 2025 / 9 :50 शाम 

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