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रौंदे हुए फूल


मुझे कहीं जाना हो या किसी करीबी को कहीं से आना हो मुझे नींद नहीं लगती। लाख जतन कर लूं नहीं आती नींद। अनगिन कल्पनाओं से भरा रहता है मन।  एक पल को स्थिर नहीं होता। भीतर कल्पनाओं के भवन बनते ढहते रहते हैं। मैं उसी कशमकश में जागता रहता हूँ। मैं धीरे धीरे करके बहुत कुछ टालना सीख गया मगर अपने भीतर का यह कशमकश नहीं टाल पाता। यूँ लगता है जैसे कल्पना कोई नदी है, तेज बहती नदी, जिसके किनारे पर ही मेरा चप्पू टूट जाता है और मैं फिर अनियंत्रित बहता रहता हूँ। बहता रहा रात भर। सुबह 4 बजे मम्मी नाश्ता बनाईं। कमरे में सब समेटा और निकल पड़ा। खाली हाथ गया था । फिर भी लौटते हुए सामान हो गया डिक्की भरकर। सोना का पैर छूने गया तो वो अपना मुँह फैला ली आगे पैर की सीध में.. उन्हें जब प्यार आता है तो ऐसे ही करती हैं बचपन से। 


इन दिनों लगता है जैसे शरीर ऊर्जाहीन होती जा रही है। पहले बाइक चलाने पर थकान नहीं लगती थी अब लगती है। कन्धा और रीढ़ की हड्डी लग रहा था निकल जाएगी। पर ठीक है। पहुँचा सबसे हालचाल लिया। धूल झाड़े। पुराने पड़े कपड़े कुछ कागज़ कुछ और स्मृति सब जला दिया। पता नहीं क्यूँ भीतर बहुत खालीपन महसूस हुआ। हम जिसे सहेजते रहते हैं जब वही नहीं है तो उन स्मृतियों का क्या अर्थ। फिर यह सवाल भी मन में घूमता रहा क्या स्मृति को मिटाया जा सकता है ? जवाब बार बार नहीं ही मिला। दबाना और मिटाना दो बिल्कुल अलग अलग राहें हैं। हम चीजों से आँख फेर सकते हैं पर जो छवि आंख कैद कर चुकी उसे डिलीट नहीं कर सकते। मस्तिष्क में फॉर्मेट का ऑप्शन नहीं होता। 

भला है, नहीं होता वरना कितना बुरा होता। 

दोपहर लेट गया था। लगभग घण्टे पर पलटने के बाद कब सो गया पता ही नहीं चला। सोया नहीं सपने में चला गया। इन दिनों मुझे लगने लगा है हम धीरे धीरे न नाम बचते हैं न देह बस एक महक बचते हैं एक आभास जिसे बताया नहीं जा सकता कि जिसे याद कर रहे हैं उसका क्या याद कर रहें हैं। वह अपने विस्तार में याद आता है। कभी कभी देह बस देह चाहती है मन बस मन। जहाँ साधिकार पड़ा रहा जा सके।  सच में नहीं मिलता सोच का जीवन तो सपने में जीवन जीते हैं। वही किया। मैंने कुछ नहीं किया मैं बस पड़ा रहा। सपना जब अपने चरम पर था फोन तेज से बजा, पूरी देह काँप गयी। अजीब सी सनसनी दौड़ गयी। फोन न उठा सका। कुछ घड़ी बाद देखा तो फोन वापस किया। नीतीश भइया बधाई दे रहे थे कि तुम्हारी लिखी कहानी पर बनी शॉर्टफिल्म 'क्रैश' अहमदाबाद इंटरनेशनल फ़िल्म फेस्टिवल में शॉर्टलिस्ट होकर चुनी गई है। मन कुछ पल को खुश हुआ। फिर तुरंत मायूस भी की कहाँ चला गया मेरा वह हुनर जो कहानियां लिख लेता था। किसने मारा उसे। क्या मैं ही क़ातिल हूँ ? शायद हूँ ही। 

सबको धन्यवाद कहा। बधाई दी। कलम को सही कैमरे का साथ मिल जाए तो वह खिल उठती है। 

यह सब कुछ जो है एक स्त्री की मेहरबानी है। मैं कुछ भी नहीं। मैं उसी का जाया हूँ। उसी का दोषी भी हूँ। उसी का प्रेमी भी। वही जिसके सामने आँख नहीं मिला पाता सारी दुनिया को आँख खोलकर आँख दिखाने वाला मैं। 

हम सब कहीं न कहीं हार जाते हैं। वहीं हार ही जीवन है। हार जाना चाहिए। 

शाम से इधर उधर करता पड़ा हूँ। कुछ काम विशेष है नहीं तो सोचा जो किताब लाया था वही पलट लूँ। आचार्य शुक्ल जी का इतिहास उठाया कुछ पढ़ा फिर रख दिया। शुक्ल जी ने जो मील का पत्थर गाढ़ दिया है वह हिंदी पट्टी में अंगद का पैर है। इस दुनिया में कुछ ही तस्वीरे हैं जिन्हें मैं अपलक देख सकता हूँ उनमें शुक्ल जी भी हैं। उनको लेकर मन भावुक है। लगता है मेरे ही परदादा हों मेरा खून। जानकी मंगल नाटक शुरू किया वह भी नहीं पढ़ पाया। मन में अजीब सा हो रहा था। जैसे कोई भीतर से गुदगुदी कर रहा हो। याद सी कोई..| मन खोलो तो आँख का बांध खुल जाता है। बेहतर है सब बन्द ही रहे। 

अच्छा है सब। बहुत अच्छा। 

इतनी योजनाएं हैं कि उन योजनाओं में जीवन कहीं खो गया है। कूचला हुआ जीवन जी रहें हैं हम..

यानि हम सब। 

― 19 मार्च 2025 / 7 :40 शाम 

टिप्पणियाँ

  1. आपको ढ़ेर सारी शुभकामनाएं 💮🌼
    जीवन में ऐसे ही आगे बढ़ते रहे 🌼
    सब अच्छा होगा महादेव की कृपा से 🙏🏻

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