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फ़रवरी, 2025 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

बात की बात

आज शारीरिक तौर पर लगभग स्थिर रहा। मन यात्रा में रहा सुबह 8:30 बजे से ही। अभी भी है। यूँ लगता है यात्रा ही नियति है। मगर विपरीत दिशा की ओर। शारीरिक तौर पर आज बहुत नहीं, हॉं हल्की फुल्की यात्रा की। मम्मी को लेने गया था। पापा भी सुबह ही आए 10 बजे के लगभग। आते ही खेत में जुट गए। इंतज़ार कर रहे थे कि मम्मी आएं। वहाँ गया तो सब फैला हुआ था उसे समेटने लगा और मम्मी तब तक अपने घर सबसे मिलने लगीं तो लेट होने लगा। पापा एकदम गुस्साए हुए फोन किये, यहीं आठ किलोमीटर से आने में कितना समय लगता है। ख़ैर! जब मम्मी को लेकर आ गया तो उनका गुस्सा गायब हो गया था। मैं पापा मम्मी की गतिविधि पर बस नज़र रखता हूँ और सीखता हूँ कैसे रहा जाता है। अदभुत सामंजस्य। उत्कट प्रेम। एक दूसरे से ज्यादा कोई महत्वपूर्ण नहीं.. अपनी औलाद भी नहीं। पति पत्नी का रिश्ता ऐसा ही होना चाहिए। वहाँ तीसरे की जगह होगी तो दिक्कत होगी। जीवन में कहीं तो सम्पूर्ण समर्पण चाहिए, हॉं वह व्यक्ति उस समपर्ण की कद्र करने वाला हो तो उससे सुंदर रिश्ता कोई हो नहीं सकता। न बोलकर भी बोलना सीखा जा सकता है। बिना छुए छू लेने सा प्रेम। आभास इतना गहरा की पीठ पीछे क...

थकन

टूट रही है देह। मन.. मन जैसा नहीं है। पिछले कई घण्टों से बस खड़ा हूँ। भोज सम्पन्न हुआ। उम्मीद करता हूँ दौड़भाग का अब तिरोहन होगा। घर अभी आया लौटकर अकेले। मेरा कहाँ कोई होता है मैं सेतु हूँ मुझसे होकर लोग पार होते हैं, भूल जाते हैं। दीदी लोग कल चली जाएँगी अपने घर तो पापा भी वहीं रुक गए हैं। मम्मी वहीं हैं ही पिछले आठ दिन से। मैं ही दौड़ रहा हूं। हर रोज़ अकेले बैठकर कमरे पर मन भर आँसू बहा लेता हूँ। मन ठण्डा हो जाता है। भीतर अजीब सी खीझ भरती जा रही है। मुझे वह सीना चाहिए जिसमें मैं अपना चेहरा छिपाकर सो सकूँ। एक गोंद या एक हाथ जो मुझे सुला सके। बिस्तर पर अकेले पड़ा हूँ। आसपास आवाज तक का सहारा नहीं है। मैं आवाज़ देना चाहता हूँ। कहना चाहता हूँ.... गहरी थकन हावी है। भीतर लग रहा है जैसे कोई चल रहा है। काश! नींद आ जाए।  पिछले कुछ सालों से और इन दिनों जो जीवन देख रहा भीतर यह डर गहरे बैठता जा रहा कि मैं लावारिश की तरह मरूँगा। कही  किसी कमरे में कहीं पड़ा रहूँगा कोई देखने नहीं आएगा महीनों.. ख़ैर मैं मरने की तरह सोना चाहता हूँ।  ― 27/ 02 / 2025 / 10 : 20 रात 

मेरे वियोगी

आज महादेव के विवाह का दिन था। आज ही के दिन उनका प्रेम जीत गया था। महादेव से सुंदर कौन प्रेमी होगा। वो खुद को आरोपित नहीं करते, पार्वती के जीवन का अतिक्रमण नहीं करते। उनका जीवन गहन अंधकार में ज्योति का जीवन है। त्याग का जीवन है। प्रकृति के पूजक है, वहीं रहते हैं। जिनका कोई घर नहीं । खंडित को मंडित करते हैं महादेव। विष पीकर सुंदर बोलते हैं। उनमें पति होने का अधिकार कम है साथी और प्रेमी सा साथ खड़े होने वाला स्वभाव अधिक है। वो वियोगी हैं। रोते हैं। अपनी पत्नी के प्रति ईमानदार हैं।  इस परंपरा को ध्यान से देखे तो सर्वत्र प्रेम की जीत की ही कथा है। प्रेम की ही स्थापना है। ईश्वर प्रेम के लिए लड़ते हैं।  अजीब यह है अब सब इतना विकृत हुआ है कि प्रेम करना ही गुनाह है। प्रेमी के लिए तड़पना मजाक की बात है। जाहिर करना तो इतना शर्मनाक है कि आप भरे समाज हाथ पकड़ लें तो लोगों की आँख तन जाती है। यह काश खत्म होता। दुनिया प्रेम से भर जाती। हर आदमी महादेव हो जाए हर स्त्री पार्वती। विवाह के नाम पर जो भी डर पैदा होता है वह खत्म हो, दोनों लिंगो में साथी मिलने का उत्स हो, लोग ईमानदार हों। कामन...

तारीख़ जल्दी क्यूँ नहीं पलटती ?

दिनचर्या वैसी ही थी जैसी कोई सुनना नहीं चाहता। तो छोड़ देते हैं। नया कुछ नहीं हुआ। वही दौड़भाग वही थकन। ऊब घेरे रहती है। न चाह कर भी रह रहा हूँ यहाँ... कहाँ होना चाहता हूँ ? यह भी नहीं पता। शायद पता भी है। कहूँगा तो विश्वास नहीं होगा, इतने लोग भरे हैं पर मैं अकेले हूँ। पिछले दस दिनों से स्थिर होकर उतनी ही देर बैठता हूँ जितनी देर डायरी लेकर बैठता हूँ। आसपास क़रीबी ही क़रीबी हैं मगर सब इतने दूर की किसी को यह तक खबर नहीं कि मैं.. हूँ या कहाँ से दौड़ कर आ रहा। बहने न हो तो मैं सम्भव है भीड़ की तरह गिन लिया जाऊँ। गलती मेरी भी है, मैं व्यवस्था करके हट लेता हूँ। ख़ैर... उम्मीद साली।  मैं कुछ दिन को कहीं भाग जाना चाहता हूँ। लिखते ही ख़्याल आ रहा है पिछले तीन साल से यह वाक्य सैकड़ों बार तो लिख बोल चुका होंउँगा ही। कुछ अर्थ निकला ? कुछ भी नहीं। वही मजबूरी। वही औपचारिकता। वही रोना । वैसा ही इंतज़ार। वैसा ही परिणाम। असफलता की जिल्द पर जिल्द चढ़ती जा रही है। जीवन लगभग यथावत है। क्या मैं प्रयास नहीं कर रहा ? अगर नहीं कर रहा तो फिर तकलीफ क्यूँ है ? कर तो रहा हूँ। मेरी हर मेहनत निष्फल होती जा रही है। सभी जतन...

अतीत दर्शन

आज 6 घण्टे से ज्यादा जाम में फंसा रहा। साथ गए ड्राइवर का जीवन बड़ा फिल्मी सा था। वो दो भाई तीन बहनें हैं। पिताजी माता और दादा के साथ परिवार में कुल आठ लोग थे। जमीन जायदाद थी। कुछ भैंसे थी। इनका परिवार खोआ बेंचा करता था। पड़ोस में दो घर मुस्लिम थे। उनके कुल नौ लड़के हुए, और उससे ज्यादा लड़कियां। सारे लड़के बड़े हुए तो इनकी जमीन जबरन कब्जा करने लगे जिससे रंजिश शुरू हुई। उस रंजिश में इनके दादा का देहांत हुआ, सर पर लट्ठ लगने से, पिताजी को गोली मारी गई, उनके बड़े भाई का गला काटा गया, माँ यह सब देखकर हृदयाघात से मर गई।  उस घटना के दौरान बहने और ये बुआ के घर गए थे जब यह सब हुआ। अब ये लोग घर से भागे रहते हैं। दो बहनों की शादी कर लिया है। एक बहन इंस्पेक्टर हो गई है। दूसरी पिछली साल बिहार में शिक्षक हुई। तीसरी पढ़ रही है। बिहार पुलिस हुआ था पर इनको छोड़कर वो जाने तैयार नहीं थी। ये नहीं पढ़े लिखे। जब यह सब घटना हुई थी तब ये 6वीं कक्षा में थे। बता रहे थे 8 साल पहले एक रात इन्होंने एक रिवाल्वर से उस घर के 3 सदस्यों की हत्या की और 2 लोग का गला रेत दिया। पुलिस इन्हें 2 साल खोजी, इनका इनकाउंटर ह...

दिन-विषयक

मन क्या चाहता है अगर यह तय कर पाना इतना ही आसान होता तो मन होता ही नहीं। कुछ और होता जो मन का वो काम करता जो मन बहुत सोच विचार करके करता है। स्थिर। एकलीक। बस मन का।  आप क्या चुनते अगर आपको लोक मर्यादा और मन के जीवन में से एक चुनना हो ? आ हाँ ... रुको फिर से सोचो ! हड़बड़ी में नहीं, मन भर सोच लो। फिर जवाब दो। कैसे निकलोगे रोज घर से बाहर ? कैसे नज़र मिलोगे माँ बाप से.? क्या बस खुद से नज़र मिला लेने से ही सब ठीक हो जाता है ? नहीं ! कभी नहीं, यह सम्भव ही नहीं। अपने से ज्यादा अपनो का जीवन महत्वपूर्ण होता है। ऐसी जगहों पर हम मर ही जाते हैं। मर ही जाना चाहिए। जीने के लिए जरूरी है। मर जाना।  हरारत। बुखार। दो चार बार उल्टी। आँख से पानी भी। सुबह से 4 टेबलेट खा चुका हूँ। अब राहत है।मन में असफलता का बोझ। खुद से  दो चार कठिन सवाल। मन में बेवजह बवाल। अपने ही सिर के खींचते रहा बाल। जीने की लालसा में क्या कर लिया है हाल। काश! बनारस ही किसी घाट पड़ा होता । उलटते पलटते बीती रात। मगर.. ख़ैर.. यह भी भला है कोई काम की बात।  काम की बात ?  ― 23 फरवरी 2025 / 7:30 शाम 

नेपथ्य में सम्भावना

सब जगह होता हूँ और हर जगह छूट जाता हूँ। जिंदगी विनोद कुमार शुक्ल की कविता हो गई है। सारी जिंदगी पहले के ही कुछ सालों में थी। अब उस शुरू किए को पूरा करने की जदोजहद है। जदोजहद अधूरी रह जायेगी। जहाँ मन ऊब जाएगा वहीं मान लूँगा पूरी हो गई। अलग बात है पूरा कुछ भी नहीं।  जुकाम बुखार की तड़फ। उनींदी रात। गाय। दूध। कुछ पल को केश कर्तनालय। खरीदी। फिर. ननिहाल। भागवत। दिन भर बुखार रहा। दवा खाया। चलता रहा। शाम फिर वही। गाय चारा दूध। रात पिताजी आए। मम्मी वहीं हैं तो घर उन्हें काटने दौड़ रहा था। कह रहे थे उनके बिना जीवन का कोई अर्थ नहीं घर तो बहुत छोटी चीज़ है। लेकर गया वही। सबसे मिले। नाना पापा को गले लगाकर रोए। नानी भी। मना करते रहने के बाद मामी लोग पाँव धुलीं। थोड़ी देर टहल घूम कर चले आए। हर दूसरी बात र तुम्हारा ज़िक्र होता है। मैं नेपथ्य में रहता हूँ। यूँ लगता है मेरे होने का अर्थ इतना है कि मैं तुम्हारा आदमी हूँ। सब परिवार इकट्ठा था । मामा अपनी बहनों को पा फूले नहीं समाते। नाना नानी अपना परिवार इकट्ठा देख कुछ कुछ देर पर भावुक हो जाते हैं। नाना बड़े नाजुक मन के हैं। मैं दिखता रहूँ तभी उ...

कब याद में तेरा साथ नहीं कब हाथ में तेरा हाथ नहीं

दो बहुत सख़्त चीजें नहीं जुड़ती हैं। बहुत सख़्त को जोड़ने के लिए बहुत नरम करना पड़ता है। इतना नरम की लगभग पिघलने की अवस्था तक पहुँच जाए। पिघलने की अवस्था तक ही पहुँचे, बहने तक नहीं। फिर उन दोनों पिघली हुई चीजों को एक साथ अपनी तमाम चीजों को छोड़कर एक दूसरे में मिलना होता है, मिल जाने के बाद फिर धीरे धीरे अपनी नरमाहट को कठोरता में परिवर्तित करना होता है। क्योंकि लगातार पिघलने की अवस्था में रहने पर पिघलना, बहने में बदल जाता है। रिश्ते भी ऐसे ही जुड़ते हैं। हम बहुत नरम होकर जुड़ते हैं फिर जुड़ जाने के बाद जब अपनी और अपनी अवस्था के साथ साम्य नहीं बनाते तो टूट जाते हैं। जैसे जैसे समय बीतता है, स्वभाव भी बदलता है। यह स्वाभाविक है। इसे हँसकर स्वीकार करना होता है। अन्यथा फिर रिश्ते टूट जाते हैं। तोड़ने के लिए नरम नहीं करना पड़ता।  दो लोगों के बीच अपनी अलग किस्म की केमेस्ट्री होती है। वह किसी दूसरे दो लोगों की तरह नहीं हो सकती, वहाँ तुलना दो लोगों में भेद पैदा करता है। साथी बनने के लिए अपने मन से ज्यादा अपने साथी के मन से चलना होता है। उसके मन से चलकर ही रिश्ता सुंदर होता है। जरूरी बात है क...

हैं न होने के बराबर मगर हैं हम लोग..

कुछ भी पूरा नहीं है।अधूरा भी नहीं है। क्या है पता नहीं। हूँ भी या नहीं, नहीं पता ! कहीं कहीं तो होना शब्द शर्मिंदा हो जाता होगा मेरे साथ, जब कहता होऊँगा कि ' मैं हूँ यहाँ देख लूँगा ' यह कहने के तुरंत बाद ही मन पूछता है, खुद को तो आजतक देख नहीं पाए और सब कैसे देख लोगे? मैं भीतर की बातें भीतर ही दबा लेता हूँ। हँसता हूँ। सबसे पूछता रहता हूँ कोई दिक्कत तो नहीं है ? कुछ चाय नाश्ता लेंगे ? बैठने में असुविधा तो नहीं है ? पूछता रहता हूँ चलता रहता हूँ। भीतर मैं कलझता रहता हूँ, भीतर का सब देखने का अधिकार उसी का है जिसके लिए मेरी देह का स्वेद और वीर्य है। जिसके लिए मैं बाहर भीतर एक सा हूँ।  दिन भर दौड़ता भागता रहा। एक पैर जमीन पर रहा एक गाड़ी पर..  अन्ततः आप कितना भी बचें वो पकड़ ही लेते हैं जो आप बिगड़ते नहीं देख पाते। जिम्मेदारी स्वभावगत होती है। बताकर काम करवाया जाता है। सोचकर, देखकर और छोटी बड़ी आवश्यकताओं का अवलोकन कर उसे सही करना जिम्मेदारी भरे स्वभाव से होता है। मैं घर वालों और रिश्तेदारों की उम्मीदों पर इतना खरा उतर जाता हूँ कि मुझे सब पकड़ाकर वो कहीं आराम से बैठ जातें हैं।...

कोउ लांघत कोउ उतरत थाहै

भले ही शब्द ब्रह्म हों लेकिन मैं अपनी अनुभूति को ठीक ठीक उनके सहारे भी नहीं कह पता। कई कई पन्नों में मन लिखता हूँ, फिर भी लगता रहता है कह नहीं पाया। और अजीब यह है कि उसके दो लाइन के जवाब में भी लग जाता है सब मन का हो गया।  *********** कुछ करते हुए या किसी से बात करते हुए अचानक किसी का ख़्याल एक बार को आ जाए तो उसे कहते हैं 'याद आई थी आपकी' पर जब कोई लगातार मन में बना रहे, हर साँस के आरोह अवरोह के साथ बाहर भीतर हो तो उससे कैसे कहें कि याद आ रही है...? ************* कल रात पता नहीं क्यूँ नींद ही नहीं आ रही थी, बड़ी मुश्किल से आखिरी पहर में आँख लगी। सुंदर सपना देखा। मन ख़ुश हो गया। आँख खुलते ही भाग गया सब्जी मंडी, वहां से लौटा तो चाय नसीब हुई, कल मंगलवार का व्रत था तो आज बिना नहाए कैसे पी सकते थे पानी। माता गयीं नाना के घर, आज घर पर मैं अकेले हूँ। शाम को ऊब रहा था तो आज घर के उस उस कमरे और कोने तक गया जहाँ जल्दी कभी जाना ही नहीं होता। दलान में रहते रहते भूल गया था कि घर में और भी कई कमरे हैं। हम अपने ही घर में रहते हुए नहीं रहते। घर के सभी कोनों को नहीं जानते। जैसे हम अपने करीबियों क...