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जैसे आँसू की यमुना पर छोटा-सा खद्योत

तुमसे बात करने की तीव्र इच्छा है। ऐसा लग रहा है रह रह कर कोई काँटा चुभो रहा है भीतर। पर बात क्या करूँगा पता नहीं। तुम्हारे सवाल का जवाब दे पाउँगा यह भी नहीं पता। मैं तुम्हारी आवाज़ सुनना चाहता हूँ। वही जिसमें शांति है। स्थिरता है। कुछ करते रहने का भार है। किसी मजबूरी का बोझ है। कौन सी पता नहीं। मैं जब जब तुमसे बात करता हूँ लगता है तुम कहीं दबी सी बोल रही हो। तुम्हें क्या कौन सा डर खाए जा रहा है पता नहीं। मैं जब तुम्हारे करीब भी होता हूँ और तुमसे वैसा व्यवहार नहीं पाता जैसा चाहता हूँ तो मेरे भीतर वह व्यवहार न पाने का शोक नहीं होता, ऐसा क्यूँ नहीं है ? किस बात की कचोट कौन सा अनुभव छीन ले गया तुमसे ऐसा व्यवहार इसकी चिंता खाए जाती है। तुम पूछती हो क्या सोचते रहते हैं हमेशा ? यही। कैसे बताऊं इसे कि यह डर बना रहता है। मैं भीतर बन रही चोट से ज्यादा तुम्हारे भीतर बने घाव की पीड़ा से व्यथित हुआ रहता हूँ। मैं जानता हूँ हर दर्द, हर नकार, हर संकोच का एक अतीत होता है। और हर अतीत की अपनी पृष्ठभूमि उसे मिटाई नहीं जा सकती। उस पर और रंग तो चढ़ाए जा सकते हैं न ? जिससे वह दिखे न.. 

सुबह से न जाने क्या कर रहा हूँ। कुछ उठा रहा हूँ पढ़ रहा हूँ बन्द कर दे रहा हूँ। एक घबराहट सी बनी हुई है। किस बात की पता नहीं। जेब से परेशान हो गया हूँ। जेब में कितना भी भर दो पूरा ही नहीं होता। कोई न कोई इच्छा रह जाती है। एक पूरा करने के लिए एक दबाना पड़ता है। 

यूँ लग रहा है मेरी देह से किसी ने सारी ऊर्जा निकाल ली है। मन है बस पड़ा रहूँ कुछ न बोलूं। फिर भी एक मन है जो कुछ चाहता है। वह जो भीतरी गुदगुदी है वह कैसे सही होगी। मन कर रहा है कहीं छिप जाऊँ। तुम छिपाओगे अपने सीने में ? मैं सांस रोक लूँगा। बस छिपा लो।  

तुम्हारे रहते, तुम्हारे सामने जिन जिन चीजों को कहा फेंक दूँगा, बेकार है, कोई मतलब नहीं, अब उन्हीं सब चीजों को सहेज का रख लिया है। मेरा वश चले तो मैं तुम्हारे पाँव की धूल तक रख लूँ, कंघी में फंसे बाल को भी। उस रुमाल को कभी न धुलूँ जिसमें तुम पोंछ गई हो अपना जूठा। तुम्हारे आँसू तक को पी जाने की इच्छा रखने वाला मैं, तुम्हारे पसीने पर भी किसी का अधिकार नहीं चाहता। कुछ भी माँगने पर तुरंत दे देने वाला मैं, तुम्हें लेकर, सिर्फ तुम्हें लेकर इतना पोसेसिव ( स्वत्वात्मक) हूँ कि मन होता है तुम्हारे समय का जो भी हिस्सा बचे वह बस मेरा हो, मुझसे बात करो तो बस मुझसे ही बात करो, और कहीं ध्यान न हो.. कोई एक समय तो हो जहाँ बस हम हों कोई और नहीं। पर इन सब बातों का मानी बेमानी हो जाता है जब तुम अपनी कोई इच्छा या मजबूरी व्यक्त कर देती हो तो, फिर तो मैं अपना मन भी भूल जाता हूँ। 

यह सब क्यूँ कह रहा हूँ मैं, पता नहीं! जबकि सामने होगी तो मैं कुछ न बोल पाउँगा, सिर्फ देखूँगा और आसूँ झरेंगे आंखों से। 

यह डायरी ही न मेरी ? या तुम्हारी याद पुस्तिका। क्या यह वही चिट्ठी तो नहीं जो मैं तुम्हें अब दिनभर में चार नहीं भेजता। 

वही है। 

आज एक अनुवाद का काम मिला है। जिन्होंने दिया वो पेरिस में सेट हैं। उन्होंने मेरी कविता कहीं पढ़ी। और अनुवाद भी किसी वेबसाइट पर पढ़ा। उनको लगता है मैं ही उनके उपन्यास का अनुवाद कर सकता हूँ। मुझे डर लगता है। मैं अपना लिखना न भूल जाऊँ। पर पैसे की जरूरत है तो कह दिया है। वो अभी एक अध्याय भेजेंगे फिर उन्हें अच्छा लगेगा तो आगे बात होगी। मैंने भारतीय अनुसार एक पेज के 550 रुपये कहें हैं। शब्द दर लगभग 1.50 रुपये पड़ेगी। आगे तुम जो कहोगी। 

भीतर अजीब सी महत्वकांक्षा जन्म ले रही है। मन करता है इतना पढ़ लूँ की किसी से किसी पर खड़े हो बात कर सकूं। एक मन कहता है इतना पढ़ लूँ की बिल्कुल चुप होना सीख जाऊँ। मैं ऐसे ही धनार्जन करना चाहता हूँ, मुझसे ऑफिस जॉब नहीं होगी मैं या तो पढ़ा सकता हूँ या पढ़ लिख सकता हूँ या फार्मिंग कर सकता हूँ। अगले साल के आख़िर तक अपना घर बनाना चाहता हूं अपने लोगों को देखते रहना चाहता हूं ,बात चीत ज्यादा मुझसे हो नहीं पाती बस चाहता हूं सब आसपास रहें। 

मैं सोच रहा था जायसी और तुलसी की अवधी पर स्वतंत्र काम करूँ। पीएचडी का चक्कर छोड़ो बड़ी रीढ़ तोड़ प्रकिया है। मैं आत्मसम्मान गिरवी नहीं रख पाउँगा। 

केदारनाथ अग्रवाल से सुबह सुबह टकरा गया। दरअसल उनकी एक चिट्ठी रखी थी। चिट्ठियां में रिकॉर्ड करने के लिए। रात वही सब पुराना उलट पुलट रहा था तो मिला। फिर उनकी कविता संग्रह मिली। पतली सी (हे मेरी तुम ) फ़ोटो कॉपी रखी थी। उसे 3 बार पढ़ गया। गीत चतुर्वेदी की ही दूसरी किताब पढ़ रहा हूँ 'अधूरी चीजों का देवता ' उसका डायरी वाला हिस्सा पढ़ा। एक वाक्य पर मन अटका रहा। कहते हैं। 'जो प्रेम मैं तुमसे कर चुका हूँ, उसे तुम भी अब छीन नहीं सकती'

ऐसे और बहुत वाक्य। मन किया फोन कर तुम्हें सुनाऊं सब.. फिर फोन करने का सोचकर रह गया। सुनाऊंगा कभी। 

हे मेरी तुम संग्रह में सब कविताएँ सुंदर हैं। एक कविता तो इतनी सुंदर थी केदारनाथ जी अपनी पत्नी से कहते हैं :- 

हे मेरी तुम ! 

बिना तुम्हारे--

जलता तो है

दीपक मेरा

लेकिन ऐसे

जैसे आँसू की यमुना पर

छोटा-सा

खद्योत ( जुगनू)

टिमकता


क्षण में जलता 

क्षण में बुझता।

**********

यह कितना तरल है न ..? 

अभी आसपास होती तो तुम्हें भेंट लेता । भेंटने का अर्थ जानती हो ? कसकर सीने से लगा लेना। बेटियां जब अपने मायके आती हैं तो माएँ जैसे उन्हें सीने से लगाती हैं उसे भेंटना कहते हैं। 

मेरी माँ । मेरी सहचरी। लौट आओ। छोटी दुनिया में सुख है। 

मैं किसी को बुला क्यूँ नहीं पाता? न रोक पाता हूँ। तुम रुककर मुझे भरोसा देना की मैं रोक सकता हूँ। 

********** 

रात माँ से बात हुई थी। उनकी मानताओं के विषय में सोच रहा था। माता से बात हो रही थी अभी उन्होंने प्रियंका दीदी के आने की चिंता है। एक सवाल यह है उन्होंने यहीं ले आऊँ अपने पास फिर मुझे यहीं रुकना पड़ेगा। तो मम्मी अकेली हो जाएंगी। पापा जाएंगे घर पर कह रहीं थी 'मतलब हम त्यौहार कय भी अकेले रही ' उनकी तबियत भी इन दिनों ठीक नहीं है। मैं कुछ बोल नहीं सका। बस चुप रहा। जीवन इतनी राहों पर खड़ा करता है कोई भी चुनो कोई पीछे छूटेगा ही.. 

मैं कौन सी चुनूँ ? मैं तो सबसे छूटा हुआ हूँ।

― 8 मार्च 2025 / 5 : 30 शाम 





टिप्पणियाँ

  1. तुमको पढ़ते पढ़ते मैं कभी थकती नहीं
    पता नहीं क्या जादू है तुम्हारे लिखे में

    बस लिखते रहो…

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  2. मुश्किल है पर सब ठीक - 🌸

    जवाब देंहटाएं

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