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मन दिमाग से नहीं चलता और न दिमाग मन से

दिमागी समझाइश पर इच्छाओं का भार इतना हो जाता है कि मन सारी सूझ बूझ सारी रोका टोकी भूल जाता है और मन उसी तरफ भागता है। वह फैंटसी नहीं है। वह वास्तविक जीवन है। जहाँ से फैंटसी का अर्थ है। रात बमुश्किल नींद आई। नींद आई तो सपने में अनगिनत साँप ने घेर लिया। तुम चीखती चिल्लाती रही। मुझे खींचती रही। मैं बचने का कोई जतन नहीं कर रहा है। मैं तुम्हारे भीतर अपने लिए प्रेम देखकर स्थिर हो गया था। मेरे भीतर से साँपों का डर चला गया था। अनन्तः तुम मुझे बचा ले गयी। साँप जैसे अचानक चलती राह में आए थे वैसे ही गायब हो गए। सब ख़ूब मोटे मोटे और खतरनाक थे। पर किसी ने काटा नहीं बस डराया, मैं डरा भी। तुममें अदम्य साहस है। 

नींद खुल गयी। फिर घण्टे भर बिस्तर पर करवट बदलता रहा। फोन में कुछ तस्वीर देखी जो मन को तरल कर गए। एक चिट्ठी लिखी। भेजने की हिम्मत नहीं हुई। नहीं भेजा। 4 बजे बिस्तर छोड़ दिया। कुछ देर बालकनी में बैठा रहा। मच्छर टूट पड़े तो फिर लौट आया फ्रेश हुआ और किताब लेकर बैठ गया। 'टेबल लैम्प' पढ़कर खत्म किया। गीत चतुर्वेदी के गद्य में एक भीतरी लय है। जो और कम मिलती है। उनकी गद्य भाषा इतनी सरल है कि लगता इस आदमी ने कितना पढ़ा होगा। उनका संस्कृत साहित्य का अध्ययन बड़ा मजबूत है। उनके सारे बिम्ब उपमा उक्ति लगभग वेदों उपनिषदों से ही आते हैं। उनके भीतरी सिनेमाई दृष्टि है। वह रील की तरह दिखा देते हैं सब। हर जिज्ञासु को वह किताब पढ़नी चाहिए। मैं इस किताब को खत्म करते करते इस लोभ से भर गया कि कालिदास ग्रंथावली मंगवा ही लूँ। वैदिक संस्कृत न सही लौकिक संस्कृत साहित्य के चरण तो छू ही लूँ। सुबह सुबह बच्ची का फोन आया। भीतर से अच्छा लगा। दिन भर यूँ ही कुछ पढ़ते पलटते बीता। 

दोपहर कुछ पढ़ते याद आया कि आज अज्ञेय का जन्मदिन है तो जो कुछ याद था उस पर एक वीडियो रिकॉर्ड किया। अज्ञेय की रचनावली का मोह नहीं जाता। कुछ ही लोग हैं जिन्हें पूरा का पूरा पढ़ना चाहता हूँ। द्विवेदी जी, निराला, शमशेर, मुक्तिबोध, अज्ञेय, रमेशचंद्र शाह, कृष्ण बलदेव वैद, राजकमल चौधरी, दोस्तोवस्की, कुछ और भी हैं पर अभी यही... मैं कैमरे पर बोल नहीं पाता मेरा सब ज्ञान शब्द भंडार जैसे कहीं दब जाता है। यूँ संवाद रूप में मैं शुरुआत से अब तक के लगभग लेखक, कवि, गद्यकार पर बेहिचक बोल सकता हूँ। 

शाम आदर्श आया था। उससे बात हुई। वो बड़ा भावुक हृदय है। थोड़ा लापरवाह है। पर रचनात्मक लोग अपने प्रति लापरवाह ही होते हैं। उन्हें अपनी होश रहेगी तो वो अच्छा साहित्य रच ही नहीं पाएंगे। उन्हें कोई चाहिए जो बस उन्हें सम्भाल लें और वो सब सम्भाल लेते हैं। 

पिताजी से बात हुई। माँ से भी हुई। एक लोग व्रत थी। एक लोग खिचड़ी बनाई थी। उन्हें यह दुःख साल रहा है कि होली पर वह अकेली रहेंगी। मैं समझाता रहा पर थोड़ी देर पर कुछ सोचकर चुप हो गया। भावनाओं पर समझाना नहीं चाहिए। झूठ ही सही मन रख लेना चाहिए। कह दिया है। दीदी को भी ले आऊँगा भले मुझे दौड़ना पड़े।

 एक कविता का कई भाग लिखा था आज अभी पढ़ रहा था हल्की लगी फाड़ दिया। 

एक आवाज़ के लिए इंतज़ार करता रहा। 

― 7 मार्च 2025 / 8:40 शाम 

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