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फिसलन

कितना और कब तक किया जा सकता है एफर्ट ? कोई तो सीमा होती होगी या बस जीवन एफर्ट करते बीत जाएगा। मुझे बहुत की इच्छा नहीं है पर जितनी है उतनी तो मिले उसमें भी कम कर दिया जाएगा तो फिर बचेगा क्या ? फिर तो चाहिए ही नहीं। मैं बिल्कुल उसी ख़्याल का हूँ कि 'हम तो पूरा का पूरा लेंगे जीवन' अगर चाहिए तो सही से चाहिए वगरना चाहिए ही नहीं। हर चीज की थोड़ी थोड़ी आवश्यकता है, थोड़ी मन की, थोड़ी देह की, थोड़ी ही आत्मा की, जीवन की भी बहुत थोड़ी ही, उसमें समझौता नहीं कर पाऊंगा मैं,  कह दो नहीं मिलेगा मैं छोड़ दूँगा, पर यह तनिक नहीं मानता मैं की थोड़ा सा ले लो, थोड़ा सा ही तो चाहिए, थोड़े का थोड़ा क्या होता है कुछ भी नहीं..

पता नहीं क्या चाहता हूँ मगर जो कुछ चाहता हूँ वैसा ही चाहता हूं जैसा सोचता हूँ। पूर्ण ईमानदारी, पूर्ण समर्पण और पूर्ण निष्ठा के साथ.. 

दिन इधर उधर करते, कुछ पढ़ते, कुछ लिखा हुआ ठीक करते बीता। सुबह से शाम तक एक बात नहीं लगातर बस चुप्पी। एक याद घेरे रही, मन करता रहा कि जाऊँ फिर सोचा नहीं, इंतज़ार कर लेते हैं, वो जब खुद आता है तो मन से आता है। 

न जाने क्यूँ आज मुझे ख़ूब रोना आया। भीतर अजीब सा लगता रहा, अपने को बहुत बेकार और नकारा सा महसूस करता हूँ, कितना कुछ कर लूं कहीं से वह रिजल्ट ही नहीं आता जो अपेक्षित होता है। सब हाथ से छूटता जाता है। अचंभित होता रहता हूँ कि कैसे इससे कम एर्फ्ट में लोग कहाँ हैं.. एक आवाज़ गूँजती है जैसे.. कि  यदि तुम अभी अचंभित हो रहे हैं तो हमेशा ही अचंभित होंगे क्योंकि जो आज सहजता से तुम्हारे हाथ से सरक जा रहा है वो फिर हाथ में आएगा ही नहीं। यहाँ अब यह कहावत की 'रेत को तेज कसोगे तो हाथ में एक भी नहीं बचेगा'  रेत के लिए नहीं अपने प्रियजनों के लिए भी लागू होता है। कह सकते हैं कि जिसे पकड़ना ही पड़े वह कहाँ आपका है, लेकिन लेकिन लेकिन.. बिना पकड़े भी तो कोई हमारा नहीं हो सकता। पेड़ मिट्टी का है या मिट्टी पेड़ का पता नहीं लेकिन जैसे ही मिट्टी ढीली होती है पेड़ जड़ समेत गिर पड़ता है, तो मूल बात यह है कि पकड़ जरूरी है, भरम में मत रहिए कि बिना पकड़े भी कुछ रुकेगा। हम सब और यह सारी सदी कटान पर खड़ी है, हम जड़ से किनारे को कसेंगे नहीं तो हम सब जाएंगे।' मैं चुप खड़ा सुनता हूँ सोचता हूँ और याद करता हूँ मैं कब मिट्टी था, मैं कब पेड़ था.. 

कोई जवाब ही नहीं मिलता। 

ख़ैर! सब ठीक है। एकदम मस्त | शायद यही जीवन है।

― 30 मार्च 2025 / 8: 55 बजे रात


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