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मन का मस्तिष्क

सुबह बहुत जल्दी उठ गया था। वही सब किया जो हर कोई रोज करता है। किताबें सही की और फिर दण्डी कृत दशकुमारचरित शुरू किया। कुल 80 पृष्ठ पढ़े। अभी 45 बचे हैं। कहते हैं संस्कृत गद्य अपने प्रारंभिक रूप में यजुर्वेद में ही मिलता है। उपनिषद और ब्राह्मण ग्रन्थों में भी उसकी परिपाटी चलती रही है। दशकुमारचरित में दस कुमारों के चरित्र का वर्णन है। जुआ चोरी व्यभिचार धोखा हत्या बेईमानी कामुकता अकाल अच्छा और बुरा राजा सब पर खुलकर और निर्मम होकर लिखा गया है। हर प्रेम कहानी का मूल यूँ लगता है कामाग्नि का भड़कना ही है। दण्डी यहाँ तक जाते हैं कि उनकी स्त्री पात्र खुद कहती हैं ' मुझसे संभोग करो,और मेरी काम पीड़ा मिटाओ'। मतलब यह की स्त्रियां अपनी हर इच्छा पर मुखर हैं कहीं दबी नहीं हैं। जो चाहती हैं कहती हैं। शास्त्रार्थ करती हैं। बहुपत्नी प्रथा है। लगभग समर्थन भी करता है कवि। विवाह से पहले पुरूष स्त्री को सम्भोग के लिए ले जाता है। सिद्धों की खूब चर्चा है, लगभग लोग अंध विश्वास में धंसे हुए हैं। देवता का कोई प्रत्यक्ष बात नहीं है पर उनकी आड़ ली जाती है। अजीब है सब। पर ठीक है.. अपने युग का नग्न यथार्थ कहती रचना है। पढ़ना तो चाहिए ही कि आँख से मर्यादावादी होने का गंदला पर्दा हटे। 

दोपहर में लेट गया था। झपकी लगी और सपना आया फिर मैं पूरा दिन बस सोया रहा। उस सपने का पीछा करता रहा जो मुझसे आगे आगे भागता जा रहा था। कितना मूर्खतापूर्ण है उसके पीछे भागना जो आपसे आगे है। कुल तो ये की पीछे भागना ही और भागना ही मूर्खतापूर्ण है। सपना हो या यथार्थ हम उतना ही देख सकते हैं जितना चलेंगे। हर एक कदम पर यथार्त है और दो कदम आगे अंधेरा। एक कदम ही देखो सुख से जिओ। यही 

मन को बहुत कुछ कहने का मन है पर मस्तिष्क कहता है ठीक नहीं है। जज किए जाओगे। कभी कभी लगता है देह का मस्तिष्क तो है ही मन का भी अपना एक स्वतंत्र मस्तिष्क है। 

― 28 मार्च 2025 / 9 बजे रात

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