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लगभग तय

कल दिनभर दौड़भाग करने और खाना परोसने खिलाने में निकल गया। रात देर से आया यही कोई 12 के क़रीब। भीड़ में भीड़ की तरह मन दबाए दौड़ते रहने के बाद जब हम अकेले होते हैं तो सब दबाया फूट पड़ता है। अपने आप से सामना होता है। फिर बचता है समर्पित हो जाने के। जुड़े हर व्यक्ति की दिनचर्या है, उसमें हस्तक्षेप भी ठीक नहीं है। पिताजी न जाने क्यूँ बड़े हताश से थे। अपनों की भीड़ में भी जब गैरों से बात करना पड़े तो और क्या ही होगा। ख़ैर! ..

डायरी खोलकर बैठा न जाने दिनभर का सोचा विचारा लिखा। नींद देर तक नहीं आई। बिस्तर पर कई तरफ से लेटकर देखा। थोड़ी देर जमीन पर लेटा रहा। सुबह देर से उठा। रात देर से लगभग सोने जैसा ही सोया भी था। देर से सोना और देर उठना कितना अपराधबोध भर देता है न हमारे भीतर ! फोन में तस्वीर देखता बिस्तर पर एक कोने कुछ घड़ी बैठा रहा। पिताजी की फटकार सुना तो वहाँ से उठा । कुछ घड़ी बालकनी में गमले देखा। कभी कभी सोचता हूँ हम कितने पापी हैं जिसकी पूरी पृथ्वी है उसे अंजुरी भर मिट्टी में समेट दिया है। अपने साथ भी तो हम यही कर रहे हैं।

इधर उधर कुछ घड़ी किया, गुनगुना पानी पिया। नहाया। ब्रेड ले आया था उसे सेंक लिया सोचा चाय बनाते हैं, पानी चढ़ाया पत्ती डाली दूध फट गया। उसे वैसे ही सिंक में रख दिया। ब्रेड खाया और मेज पर रखी किताबें ताकता बैठा रहा। रात की लिखी डायरी पढ़ा। क्या बे-वजह लिखता हूँ। फाड़ दिया। आलमारी में सब किताबें अव्यवस्था से पड़ीं हैं मन की तरह। ठीक करने का भी मन नहीं है। कभी कभी लगता है चीजों में रंग तभी तक है जब तक आप उन्हें किसी के लिए देखते हैं। भीतर अजीब सी हुँक सी उठ रही थी। फर्श पर बैठा रहा। एक फोन मिलाया, 50 सेकेंड में काट दिया। सोचता रहा वही सब जो बीत गया है। शुरू से शुरू करना कितना बोझिल काम है, मगर करना है। करते हैं। एक ही किताब को कितनी बार देखूं। एक ही चीज़ कितनी बार पढ़ूँ और फेल होकर फिर सिर झुकाए खड़ा हो जाऊँ। कौन खा गया मुझे। कहाँ मर गया है मेरे भीतर का वह आदमी जो सब कुछ सीख जाता था सीखना शुरू करते ही। इन दिनों मुझे लगता है आलसी हो गया हूँ। मन करता है बस पड़ा रहूँ कोई एक शब्द न बोले। मैं किसी से एक शब्द न बोलूं। 


― 26 मार्च 2025 / 2 :40 दोपहर 


रात का जो फाड़ कर फेंक दिया था, शाम उसे ख़ोजता रहा। शायद सुबह झाड़ू लगाने वाला ले गया। उसमें कुछ वाक्य बड़े सुंदर हुए थे। अपना लिखा हुआ मुझे याद भी तो नहीं रहता। काश! जिंदगी में undo या restore  की बटन होती तो डिलीट किया सब लौटा लाता। मन अजीब  भारी सा हुआ है। दिन भर क्या किया पता नहीं। ठीक जवाब यही है कि कुछ नहीं। जो इस कुछ नहीं को जानता है वही जानता है कि मैं क्या करता हूँ। कुछ सोचे हुए काम दुबारा शुरू करना चाहता हूं। पढ़ना भी चाहता हूँ। एक तरफ से तात्कालिक अर्थ आ सकता है पर इतना नहीं कि आगे का न सोचना पड़े। पर इस समय जो परिवार की दशा है कोई एक तरफ जाना कई तरफ से गिर जाना है। 

उस एक पर कितना दबाव है। फिर भी बिना पूछे मेरी जेब में पैसे डालता रहता है। मुझे भीतर ही भीतर बड़ा मारक कष्ट होता है। मैं जब जब हाथ फैलता हूँ लगता है मैं मर गया। कोई कुछ भी कहे पर भीतर से यह बात जाती नहीं कि मैं सामने वाले के लिए कुछ करूँ। सामने वाला बस ख़ुश रहे। पिताजी की दवा तक लेते हुए डर लगता है अभी इसका पैसा आ जाएगा। मैं खड़ा सोचता रहता हूँ इतना तो कर ही सकता हूँ.. मगर.. हम कितने असहाय हैं। कुछ चीजों से लड़ ही नहीं पाते। जैसे यह मन। जो हमें हमेशा दोराहे पर खड़ा करता है। 

भाड़ में जाए सब.. नहीं सोचना है कुछ। जो मेरा है उसका सब मेरा है, अभी नहीं तो कभी तो मैं इस योग्य होंउँगा की आज के किए का कई गुना करूँगा। अभी पढ़ते हैं। आगे महादेव जाने। 


― 26 मार्च 2025 शाम 8 : 20 


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