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मन के द्वारे

कभी कभी हम बोलते हुए ऐसा कुछ बोल जाते हैं जो हम अपने भीतर इसलिए छिपाते रहते हैं की कोई हमारा वह असली रूप न देख ले और उसका ग़लत फायदा उठाए। हम अपने लिए नहीं अपनी उस भावना के लिए डरते हैं जो भीतर है। वह निरी भावुकता नहीं होती। वह शुद्ध भावना होती है। जिससे मुझे प्यार हुआ मैं उसके सामने बिल्कुल निर्वस्त्र होकर खड़ा हो गया। इस विचार को छोड़कर कि वह क्या सोचेगा क्या कहेगा। मन खोलना देह खोलने से ज्यादा कठिन है।मन देना देह देने से ज्यादा असुरक्षा भरा। मैं सब दे चुका।

 'मेरा मुझमें कुछ नहीं.. '


*

मेरा घर बीमार। मैं भी बीमार ही.. कोई कहीं दूर दिन भर पड़ा रहा मैं उसे सोचता विचारता खड़ा रहा। 

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धूल,बालू ,तेज धूप, श्राद्ध, सूखता गला, साफ गाल, घण्टों की मशक्कत, महापात्रों का मान मनौवल। लौटना और बस लोट जाने सा मन। हल्का नाश्ता, ज्यादा उल्टी, थोड़ी देर बिटिया से खेलना। फिर पड़ जाना।

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एक लंबी चिट्ठी लिखता हूँ, उसे बार बार पढ़ता हूँ और

जब जब पढ़ता हूँ सोचता हूँ इसे अभी एक बार और पढूँगा अगर मैं नहीं रोया तो भेज दूँगा।

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सर पर अपने ही कठोर हाथों से तेल मालिश कर रहा था, और आँख बंद कर महसूस रहा था कि यह हाथ तुम्हारा हाथ है, मुझे मेरा सर और भारी लगने लगा, यूँ कह रहा हो ये हाथ ऐसे ही चलता रहे, दूर न हो..

पीड़ा बर्दाश्त है अगर तुम्हारा स्पर्श मिले।

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मैं जब जब कोई बच्चा गोंद में उठाता हूँ। मन में अनेक बिम्ब उभरते हैं। हर बिम्ब में तुम प्रमुख होती हो, मैं सहायक किरदार और नेपथ्य में तुम्हारा घर सहेजता हुआ तुम्हारे आगे पीछे चलता रहता हूँ। कोई पीछे महीन आवाज में पुकारता है माँ.. मैं अपने को छु कर महसूता हूँ कहीं यह आवाज मेरे भीतर ही तो नहीं, पर नहीं होती ! वह तुम्हारे भीतर से आती । मेरे भीतर कुछ भी भीतर रखने का सामर्थ्य ही नहीं सिवा तुम्हारे सपनों के..

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लगातार आती जाती आवाज़ में मन जब एक ही आवाज़ ख़ोजता हो तो समय नहीं खोजना पड़ता उसके लिए, सारा समय ही उसका होता है। बात न करके भी हम उसी से बात कर रहे होते हैं।

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हिंदी भाषा के पिछले 50 वर्षों के सबसे योग्य व्यक्ति को ज्ञानपीठ। ज्ञानपीठ आज वर्षों बाद ख़ुश हुआ होगा। विनोद कुमार शुक्ल जी जीते जागते अपवाद पुरूष हैं। वैसा न कोई जीवन है, न वैसी कविता। वह कविता की पाठशाला हैं। भावनाओं की सूक्ष्मदर्शी। उनसे कोई भावना नहीं बच सकी। कहने को कितना कुछ कहा जा सकता है उस पर जो एक एक शब्द सोचकर बोलता है। जिसे कविता का सजीव रूप देखना हो विनोद कुमार शुक्ल को देखे। 

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हिंदी भाषा के लिए गौरव का दिन है। पुरस्कार का मान बढ़ गया। आह .. यह सुख जो अनुभूत हो रहा वह अकथ है।नहीं कहा जाना ही उसका कहना है। 


― 22 मार्च 2025 / रात 12:20 

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