दिन !
एक के बाद अनेक दिन बीतते जाते हैं और हम सिकुड़ते जाते हैं। हम एक दिन इतना सिकुड़ जाते हैं कि थोड़ा और सिकुड़ने की इच्छा से टूट जाते हैं। हम आप टूटते हैं। आप ही जुड़ते हैं।
लिखा हुआ कुछ कितना अलौकिक होता है कितना सच्चा। कुछ शब्द छू रहा था और रो रहा था। कई बार वह बताया नहीं जा सकता जो महसूस होता है। ऐसा ही कुछ ..
आज मन स्मृतियों में ही टहलता रहा।
गौरी और कृधा के साथ खेला कुछ देर..दोपहर बाद से स्मृतियों से दो दो हाथ कर रहा हूँ।
हिम्मत नहीं है कुछ अब । आज इतना ही। सब ठीक है।
मैं समझ नहीं पाता कभी कभी रो लेने के बाद जितना खालीपन और शांति लगती है, कभी कभी उससे उलट मन भारी हो जाता है। क्यूँ ..?
― 21 मार्च 2025 / 8: 20 शाम
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