वही दिनचर्या। वैसा ही दिन । वैसी ही रात। दिनभर झकोर चलता रहा। मन हिलता रहा। कभी कभी लगता है जैसे ज़िन्दगी लगातार हड़बड़ी के लिए मिली है यहाँ सहेजो समेटो वहाँ जाओ, वहाँ भी वही करो। कुछ भी न स्थिर है न स्थाई। देश की दशा और मन की दशा एक सी है। मन भी उच नीच पहले और बाद की लड़ाई लड़ता रहता है। बस खून बहता है सफेद खून परिणाम कुछ नहीं निकलता। निकलेगा भी नहीं। इन दिनों लगातार मेरे मन में चलता रहता है कि कैसे.. कुछ नहीं।
चना काट रहा था सबकी बड़ी याद आई..पापा दीदी बच्ची सबको हरा चना भूनकर खाना पसंद है।
मुझे अजीब चिड़चिड़ाहट हो रही है। मन कर रहा है कहीं खड़े होकर चीख लूँ बस
― 18 मार्च 2025 / 7: 40 शाम
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