बहुत कुछ नहीं न सही, इतना तो कह ही सकता हूँ कि अब बहुत कुछ कहने की गुंजाइश नहीं बची। सवाल कर सकता है कोई की गुंजाइश कब थी ? तो भी जवाब यही होगा कि कभी नहीं। हम कभी नहीं और यह आखिरी है करते करते यहाँ तक पहुँचे हैं। जैसे जैसे आदमी जानता गया, नया ख़ोजता गया, औपचारिक, व्यवहारिक और प्रेमिल हुआ वैसे वैसे वह वास्तविक मनःस्थिति से भागना भी सीख गया, उसे कटना और काटना आ गया। झूठ उसका प्रमुख गहना हो गया, उसे सिर पर, जुबान पर, मन पर, सुहागन स्त्री के आभूषण की तरह सजा लिया, और चलने लगा, अब तो आदमी इस गहने का इतना आदी हो गया कि उसे उतार लेने पर आदमी पागल हो जाता है वह आव बाव बकने लगता उसी गाड़ी जीवन पटरी से उतरकर भागने लगती है।
मैं यह सब क्यूँ कह रहा हूँ ? शायद कहने की गुंजाइश बचाए रखने के लिए। मुझे इतना कहने की गुंजाइश है मुझसे आगे वालों को इससे भी कम होगी।
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सुबह मौसम सुंदर था। मन के लिए तो सुंदर था फसलों के लिए बिल्कुल बुरा। सरसों कटी पड़ी है खेत में, जौ और गेहूँ भी लगभग पक गए हैं, चना तो बेकार ही हो रहा है। मगर अब आगे बारिश न हो तो बच जाएगा सब। सुबह सुबह बर्फ गिरे, कुछ 2 या 3 मिनट। सारा छत खेत दुवार सफेद हो गया। फिर धूप भी निकल आई एयर ऐसी धूप की खड़ा न हो सको। झटका बादल की गड़गड़ाहट से इतना डरती हैं कि लगता है कहाँ घुस जाएं। मौसम थोड़ा खुला तो चारो तरफ घूम टहल कर देखा कहीं कोई फसल ज्यादा नुकसान तो नहीं हुई। रुशा के फूल चूसे बचपन में हम लोग इसी मौसम में दोपहर में स्कूल से लौटते हुए सड़क किनारे जहाँ वो मिल जाता एक एक फूल चूस जाते उसके फूल से मीठापन आता है जैसे शहद। शीशम के फूल देखे। तितलियों के बीच बैठा रहा हल्के भीगे मेड पर। मैं जब जब कोई फूल देखता हूँ मेरे मन में एक महक पैदा होती है। एक छवि बनती है। मैं उन फूलों को उसे ही चढ़ा आता हूँ। आज भी वही हुआ।
गांव पड़ोस से दिनभर लोग आते जाते रहे। हर आने वाले के वही दो चार सवाल । मेरे वही उत्तर। समाज तमाम तरह की निर्जीव औपचारिकताओं को ही सामाजिकता कहता है। शाम कुछ घड़ी फूल पौधों की साफ सफाई किया। सोना का खाना पीना देखा। कई कई लोगों के फोन आते रहे, मैं एक दो छोड़ सबसे बचता रहा। मुझसे बात नहीं हो पाती ज्यादा। क्या बोलूं क्या जवाब दूँ क्या समझाऊँ की क्यूँ है सब। बोलने से अच्छा और प्रभावी जवाब चुप रहकर ही दिया जा सकता है। वही कर रहा हूँ। कोई मुझसे करवा रहा है जैसे..
मम्मी भी अस्वस्थ हैं तो काम बहुत है। सिर फट रहा है। दवा खा कर लेट गयीं हैं। शाम डॉक्टर से बात करके दूसरी दवा लाया। घर में इतना सब है मगर जब खाना पीना ही नहीं है सही से तो क्या ही किया जा सकता है। मैं कहाँ कहाँ जाऊँ किस किस को समझाऊँ। पिताजी का फोन आया था सुबह सुबह बारिश का जानकर कहने लगा यहाँ तो धूप है, सब बताया कई तस्वीर भेजी फोन रखते हुए कहा 'ठीक है बेटा ख़्याल रखो' मन में वह सुख सा महसूस हुआ। इस बार सोच रहा हूँ पापा का डॉक्टर बदल दूँ। दो साल से एक ही जगह की दवा ठीक नहीं है, मेरा मन चाहता है कैसे करके बस ये अंग्रेजी दवा बन्द हो जाती पर हो ही नहीं पा रहा। अलग अलग लोगों से डॉक्टर से बातचीत करता रहता हूँ, फोन में किताबों में ख़ोजता रहता हूँ मन का इलाज़ ही नहीं मिलता। मुझे बड़ा डर लगता है।
रात एक तो नींद मुश्किल से बहुत जतन से आती है और आ जाती है तो अजीब अजीब सपने आते हैं अब क्या अटपटा होना बचा है.. महादेव देखना सब।
इन दिनों सब बीमार ही हैं जो जहाँ है झेल ही रहा है। मैं हर तरफ फोन कर करके बोलता बताता रहता हूँ डरता भी रहता हूँ फिर ..
खैर! छोड़ो
सब ठीक है।
― 17 मार्च 2025 / 9 : 40 शाम
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