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कुछ तो लोग कहेंगे.. लोगों का काम है कहना


पिछले 3 सालों से डायरी के पन्नों पर लगभग हिसाब ने जगह ले लिया है। कहीं किराने का हिसाब है कहीं फल सब्जी और मिठाइयों का कहीं किराए लिखे हैं कहीं मजदूरों का हिसाब है। दवाओं के नाम भरे हैं या तो हॉस्पिटल के बिलों कक जिक्र है। फोन का नोटपैड भी लगभग ऐसे ही है। 

मेरे आसपास के कई लोग जब मुझसे कहते हैं अरे वो तो तुम्हारे साथ ही रहता था उसका ये हो गया, तुम्हारा कैसे नहीं हुआ। मैं कुछ नहीं कहता, हँसकर कहता हूँ मैं बहैलपन करता हूँ, इधर उधर बेवजह घूमता रहता हूँ।  वो लोग घर के सदस्यों के मरने बीमार होने तक पर खड़े नहीं होते, उनके भीतर आत्मसम्मान नहीं है कहीं किसी से कुछ भी मांगकर खा लेते हैं रह लेते हैं मैं नहीं रह पाता। मुझे इज्जत का जीवन चाहिए या तो नहीं चाहिए। मेरे अकेलेपन और फेलियर होने पर सवाल उठाने वाले लोगों को पहले अपने गिरेबान में देखना चाहिए। वो जिस उम्र में खेल खा रहे थे मैं परिवार देख रहा हूँ, बहनों के लिए रिश्ता खोज रहा हूँ। वो जिसे सफलता और ऊँचाई समझते हैं उसे मैं लात मार आया हूँ, मैंने अलग राह चुनी है, मैं इसके दुखों संघर्षों को झेलने के लिए तैयार हूँ। मेरा जीवन मेरे लिए हुआ मैं इसे अपनी तरह ही जियूँगा। तनकर, खड़े रहकर। मेरी ऊब मेरा अकेलापन मेरा अपना है उसपर किसी का हक नहीं न कोई उसे बांट सकता है, वह बस मैं जानता हूँ। और मुझे ही जानना चाहिए। 

मैं बहुत सी चीजें भूल जाता हूँ अभी भी भूल गया हूँ कि मैं यह सब क्यूँ लिख रहा हूँ, मैं क्यूँ दे रहा हूँ सफाई, जबकि जानता हूँ सफाई सबसे हल्की चीज है।

यह मेरी प्रवृत्ति है अगर होंउँगा तो तन मन धन सबसे होंउँगा और अगर मेरे मन को ठेस पहुँची तो मैं हर तरह से हट जाऊँगा, मुझे लौटना नहीं आता। मैं हटा मतलब हटा। 

इतने सालों से फोन चला रहा हूँ बहुत से आयोजन किये कई लोगों के काम करवाए पर अपना काम होता है तो भूल जाता हूँ कैसे कर सकता हूँ हड़बड़ा जाता हूँ, एक डर हावी हो जाता है, कैसा डर पता नहीं, मैं ट्रेन पकड़ने में भी डर जाता हूँ। आज सुबह से एक नम्बर ख़ोजता रहा, भूल गया था किस नाम से सेव है और किस लिए सेव है, मुझे गुस्सा भी ऐसे आता है मैं भूल जाता हूँ बात क्या थी मुझे वह भावना याद रहती है जो मैंने भीतर महसूस किया था, मैं इसीलिए जवाब नहीं दे पाता, न तर्क कर पाता हूँ, मैं जीते हुए पूर्णतया ईमानदार होता हूँ बाद के लिए कुछ नहीं बचाता, शायद इसीलिए मुझे जी गयी बातों के शब्द भी याद नहीं रहते। 

दिन भर पेंचकस पिलास और तार बल्ब लिए चीजें ठीक करता रहा, दोपहर में पुआल कटवाया, धूल भर गई थी भीतर, पापा गए। मम्मी को बुखार तेज था दवा दिया है इस समय ठीक हैं। अभी खाना बनाकर बैठा हूँ। क्यारी सब खराब होती जा रही है मैं सहेज ही नहीं पाता, बहने चली गईं लगता है हाथ चला गया, घर एक तरफ साफ करता हूँ एक तरफ गन्दा हो जाता है, खेत देखता हूँ तो दुवार खराब, दुवार देखता हूँ तो खेत। जिंदगी भी ऐसी ही है। सब गड्डमड्ड है। मगर ठीक है ऐसे ही चलेगी। 

मन कई बार कुरेदा गया। मैं नहीं जानता क्या बोलना चाहिए क्या करना चाहिए। मन कई बार हुआ फफक कर रो लूँ फिर समझ नहीं आता क्या रोने से जीवन हल्का हो जाएगा ? उत्तर नकारात्मक ही मिला सो चलता रहा। 

किताब खोलने की तो बात न करो। आज कई दिन हुए। 

खाना अजीब उबला सा बनना होता है, बना रहा हूँ। शुक्रवार तक चलेगा यह। सब इकट्ठा हैं, मृत्यु पर भी राजनीति होती है। किसी एक पर नहीं यह सब पर इल्जाम है सबने मिलकर परिवार बर्बाद कर दिया।  ठीक है खैर.. मनुष्य होता ही कीड़ा हैं। मैं भी तो कहीं बहुत बुरा, और घटिया आदमी हूँ ..

तुम्हें याद करता रहा। पर कह नहीं सका। डर लगता है अब.. 

― 16 मार्च 2025 / 8 बजे शाम 

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