बहुत सी बातें जिन्हें हम सुख समझते हैं वह किसी के लिए दुःख हैं, और जिन्हें दुःख समझते हैं वही किसी के लिए सुख। यह वैसे ही है जैसे आम आदमी के लिए मौत कष्ट का विषय है पर डोम समुदाय के लिए उत्सव का। उनका जीवन ही लाशों पर टिका है। ऐसी बहुत सी परिस्थितियाँ हैं जिनपर बहुत सोचकर भी कुछ नहीं किया जा सकता है। उन्हें बस जो जाना ही विकल्प है। जिया ही जा सकता है। भविष्य की योजनाओं को पीठ पर बांधकर नहीं चलना है। जो नियति में होगा दर तक आएगा ही। जो सुख जो इच्छा जी पाने योग्य होंउँगा जी लूँगा मरने से पहले।
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जाने क्यूँ लगता है, हम धीरे धीरे ड्रेन होते जा रहे हैं। हमारी सामंजस्य क्षमता खत्म होती जा रही है। जीवन जिस स्तर पर उलझाऊ और अर्थ पर निर्भर हो गया है हम मिनिमम जगहों पर होना चाहते हैं, यह छोटे परिवार का ही नहीं छोटे परिवार में भी अकेले रहने का दौर है। हम ख़ुद को भी नहीं झेल पा रहे हैं। इसका कारण बड़ा विकट है मगर ठीक है.. समय के साथ ढल न जाने पर टूट जाने का डर रहता है बेहतर यही है की घास बनकर जीवन जिया जाए। पेड़ बनने का दौर गया। अब जड़ों में सामर्थ्य नहीं कि वो तने और शाखाएँ सहित खड़ा रह सके।
पता नहीं मैं किस मुद्दे की बात कर रहा हूँ या सब बेमुद्दा ही है।
सब ठीक है। जैसा है। न जाने क्यूँ मुझे अब लगता है चीजों को जानते जाना अपने सिर पर एक अनदेखा बोझ लादे रहना है। बौद्धिकता खुशी के अवसर छीन लेती है। शायद मैं गलत होऊं..
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वही जीवन, वैसा ही सब क्रमबद्ध। कुछ भी आगे पीछे नहीं। थोड़ा बहुत लिखना पढ़ना। पड़े रहना। धूप का आना जाना देखना। शाम कुछ लड़कों से मिला। वो बोले मैं बस सुना। मन नहीं था बोलने का। थोड़ा बहुत बोला ही पर क्या यह याद नहीं।
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कोई जब आपके लिए सोचता है तो यह कितना सुकून भरा होता है। महसूस हुआ बीते दिन। वह घटना सोचकर ही लगता है मैं कुछ तो बच गया..
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जो नहीं दिखता उसे ही क्यूँ देखना चाहते हैं हम? क्यूँ कैद करते हैं हवा, क्यूँ बनाते हैं ईश्वर , क्यूँ जानना चाहते हैं कि कोई कैसे करता है हमें प्रेम ?
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मैं जैसे किसी माड़ दिए कपड़े की तरह झड़ रहा हूँ। दोनों ओर से दोनों ओर देखा जा सकता है। मैं एक ऐसा व्यक्ति हूँ जिसमें बस एक व्यक्ति रहता है।
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परिवार.. खैर !
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सब एकदम मस्त जबरदस्त
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बहुत कुछ को बहुत कुछ कहकर नहीं 'कुछ नहीं' कहकर ही कहा जा सकता है।
― 11 मार्च 2025/ शाम 7: 40
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