आसपास अजीब सा माहौल है। लोग फिर से तैयारी में जुटे हैं, जिनके घर बच्चे हैं उनका उत्साह देखते बन रहा है, घरों पर नई जगमग लाइट लग गईं हैं, बाज़ार अपने साज सामान के साथ फिर तैयार हो गया है। लोग नए साल में जाने से पहले मन भर लूटेंगे। कई सवाल हैं, मगर करूँगा नहीं, उनका जवाब जानता हूँ, उस सवाल के बाद मेरी सोच पर उठे सवालों को भी जानता हूँ। जब उत्सव सा माहौल होता है, मुझे घर की बड़ी याद आती है..घर वो नहीं जो चार दीवारों का है, घर वो जो मुझे घर सा लगता है उसके बिना कुछ देखने का ही नहीं मन करता, न अच्छा ही लगता है, कल कैसे बीतेगा.. बीत जाएगा। बीता दिया जाएगा।
चोट लगने से जो घाव हुए थे वो भर रहें हैं। चोट लगने के दौरान जितनी असहजता नहीं हुई उससे ज्यादा अब हो रही है। घाव जब भरने लगते हैं तो उनमें इतनी कलबलाहट क्यूँ होती है ? दुविधा यह है कि हम उसे कुरेध भी नहीं सकते। धैर्य बड़ी मुश्किल सी बात है ।
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आज विद्यापति को पढ़ रहा था, बहुत कुछ नहीं तो इतना तो कहा ही जा सकता है कि शुद्ध रसिक आदमी थे। उन्हें कलावादी कहना कहाँ तक उचित है मुझे नहीं समझ आता ? अगर है भी तो ऐसी कला से कला को क्या फ़ायदा हो रहा है यह कैसे देखते हैं ? कुछ कुछ विद्वानों ने अपनी विद्वता से जो आतंक फैलाया है वह हमें आनंदित कम करती है डरा ज्यादा देती है। ग़ालिब , मोमिन और मीर भी काफ़ी हद था ऐसे ही हैं। आमजन जिन शब्दों को बमुश्किल ही बोलता होगा उन्हें साहित्य में जबरन लाने से क्या फ़ायदा होता है ? मीर का रशिक मन भी विधापति की ही तरह है। कोई जब उन्हें तुलनात्मक तौर पर पढ़ेगा तो पाएगा जो विद्यापति ने जो बात 14वीं शती में कही , मीर वही और उससे ही मिलती जुलती बात 17वीं शती में कही, अलग शब्दावली में बस..विधापति से अधिक क्रांतिकारी हैं मीर। लेकिन हर साहित्यकार में क्रांति के बीज खोजना भी कहाँ की बुद्धिमानी है। मैं भी पागल ही हूँ । ख़ैर ! यह यहीं छोड़ते हैं। वगरना मैं अभी और भटकूँगा। जो अब ठीक नहीं.. तनिक पाँव बने बनाए राह से हटे आप गड्ढे में गिरे, हर तरफ तो खुदाई हो रही है, समतल कुछ बचा ही नहीं है, समतल छोड़ा भी तो नही गया था।
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महीने भर से ज्यादा हुए शायद, वही सब चल रहा था, मैं खाने का बहुत शौकीन नहीं हूँ, पेट भर जाए बस, बस ठण्डा नहीं खा पाता, पर आज मेरा मन किया कुछ पकाने का , देर तक तैयारी की फिर सब्जी बनाई.. कई सब्जियों को मिलाकर, स्थिरता का स्वाद था। मुझे भोजन पकाना बड़ा अच्छा लगता है मगर अपने लिए नहीं, अपने घर वालों, प्रियजनों के लिए, खिलाने में जो आनंद है वो खाने में कहाँ है। जब अपना घर बनाऊंगा उसमें एक खुला रसोईघर रखूँगा, मिट्टी के चूल्हे वाला, मिट्टी के बर्तनों के साथ, जब पढ़ने लिखने और दुनिया से ऊब जाया करूँगा तो खाना बनाया करूँगा।
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खाना पकाते हुए परवीन शाकिर की एक ग़ज़ल सुन रहा था जिसे ताहिरा सईद ने गाया है, उसके मतले का पहला मिसरा ही इतना सुंदर है कि कई बातें एक साथ जैसे दौड़ के सीने से चिपक गईं । ताहिरा सईद अपनी मखमली आवाज़ में सुर पकड़ते हुए जब कहती हैं ' सुंदर कोमल सपनों की बारात गुज़र गई जानाँ ' आह ! लगता है बस ये आवाज़ अब खामोश न हो..
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कई दिनों से रात सुंदर सपनों की हो रही है, मैं अपने को गिरते हुए नहीं देख रहा, न ही चौंक के जग रहा हूँ, मन उम्मीद से भरा है, नींद आ जाती है। यह सब मैं जानता हूँ क्यूँ है कब तक है। अकेले तो मैं जी ही नहीं पाऊँगा। होने की उम्मीद भर बनी रही तो बचा रहूँगा।
साल ख़त्म हो रहा है। साल के शुरुआत की याद आ रही है। बुरा कहने की मेरी हैसियत नहीं है, अच्छा ही कह सकते हैं। इस साल के कई हासिल हैं जिनपर लिखना इस जन्म तो सम्भव न होगा.. एक आलिंगन एक स्पर्श कुछ आँसू कुछ फूल कुछ उम्मीद से यह साल विशेष की तरह दर्ज रहेगा।
― आशुतोष प्रसिद्ध
30 दिसम्बर 2024 / 8 :10 बजे


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