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ऐ दिल-ए-नादाँ न धड़क

'जा रही हूँ / रहा हूँ ' ,  'इंतज़ार' ,  'सब ठीक हो जाएगा' , इतना सुन लिया है कि अब किसी के होंठ से इन शब्दों की आहट भी महसूस होती है तो मन करता है उसे तेज से गले लगाऊं और कहूँ मत कहना जो अभी कहने जा रहे हो.. मेरी आत्मा अब 'आ रहीं हूँ' , 'हम साथ रहेंगे', 'आ जाओ ' जैसे शब्द सुनना चाहती है। 

मुझसे अकेले नहीं रहा जाता, अलग बात है मैं बहुत संवाद पसंद आदमी नहीं हूँ, मगर अपनों के होने की अनुभूति में जीना चाहता हूँ। 

परिवार में जितने सदस्य हैं उतनी जगह हैं, ज़िंदगी पहिए में बदल गयी है, पल भर को कहीं रहता हूँ अगले पल को कहीं.. थक हार कर जब बैठता हूँ तो लगता है कोई तो हो जो मुझसे मेरा मन पूछ ले, माँ के लिए पिताजी हैं, बहनों के लिए उनके पति, किसी के लिए कोई , मेरा न कोई भाई है न कोई दोस्त,  मैं भी कहीं हूँ या बस हूँ तो गिन लिया जाता हूँ। मैं हर दो लोगों के बीच अन्य की तरह जाकर खड़ा हो जाता हूँ, फिर थोड़ी देर में आभास होता हूँ मैं यहाँ नहीं हूँ तो हट जाता हूँ अकेले बैठा रहता हूँ कहीं। क्या मैं अकेले होता हूँ तो अकेले होता हूँ ? 

घर तो है ही नहीं। जहाँ जन्म हुआ उसे घर कैसे कहूँ, गांव जा रहा हूँ कह देता हूँ.. मेरा मन नहीं लगता वहाँ , मेरा मन कहाँ लगता है मैं नहीं जानता। पता नहीं क्यूँ आदित्य की टीस रह रहकर उभरती है भीतर, जबकी और जो भाई हैं वो पूछते तक नहीं ज़िंदा हो की मर गए, मैं अपनी तरफ से फोन न करूँ तो फोन न आए, मगर न जाने क्यूँ लगता है आदित्य होते तो मेरा संबल होता। शायद वो भी इन्हीं की तरह हो जाता, नहीं होता तो जबरन कर दिया जाता। खैर...परिवार में परिवार सा कुछ बचा नहीं है पर यह इच्छा की सब ठीक हो जाए ख़त्म नहीं होती। 



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रोना..चुप होना.. दिलासा देना..अकेले होना फिर रोना, जीवन यही बच गया है। 
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मैं धोबी का कुत्ता हो गया हूँ

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सब कह देने के बाद भीतर एक अजीब सा गिल्ट पैदा होता है, उस गिल्ट को खत्म करने के लिए जो कुछ कहता हूं उसके बाद फिर वही होता है यह बढ़ता जा रहा है। 
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कुछ करीबी नज़रंदाज़ करना सीख गए हैं, मुझे आभास होता है मगर क्या कर सकते हैं। न होने पर उन्हें ख़ुद आभास हो जाएगा। 

मैं अपने होने को होने की तरह नहीं, जीने की तरह जीना चाहता हूँ, मैं प्यार करते, अपना सब न्यौछावर करके समर्पित होकर ईमानदारी से जीना चाहता हूँ। मैं जियूँगा। 
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आज देर तक शमशान घाट पर बैठा रहा उतनी देर में दो देहों को इस नरक से फुरसत मिली, चिता से उठती हुई आग कितनी रसपूर्ण होती है, मन एकदम शांत कर देती है, लगता है यह ऊर्जा भीतर ही कहीं है। मुझे आग, सूखी पत्ती, सूखे पेड़ बहुत पसंद हैं। क्यूँ पसंद हैं नहीं पता बस पसंद हैं।

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कल रात खेत में था तबसे कैफ़ भोपाली की एक ग़ज़ल गुनगुना रहा हूं  ; 

" कौन आएगा यहाँ कोई न आया होगा
मेरा दरवाज़ा हवाओं ने हिलाया होगा

दिल-ए-नादाँ न धड़क ऐ दिल-ए-नादाँ न धड़क
कोई ख़त ले के पड़ोसी के घर आया होगा " 

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दिन भर ख़ूब बारिश हुई है लेकिन जमीन एकदम सूखी है, बारिश आसमान से नहीं, आँख से हो रही थी।

― आशुतोष प्रसिद्ध 
23 दिसम्बर 2024 
शाम 7 बजे 

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