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भावना की समझ और समझ की भावना


किसी से कितनी बात करके कहा जा सकता है फलां व्यक्ति को मैं समझ गया हूँ ? या कितनी बात करके यह तय किया जा सकता है की फलाँ व्यक्ति के साथ जीवन के बचे दिन गुजारे जा सकते हैं ? कोई ठीक ठीक मानक हो तो मैं उस मानक में ख़ुद को मापना चाहता हूँ, मैं देखना चाहता हूँ कि मैं किसी के साथ रहने योग्य हूँ या नहीं, मुझमें वह योग्यता है की नहीं जो किसी के साथ रहने के लिए चाहिए होती है। सवाल यह भी तो उठता है , जीवन के तमाम प्रश्न हैं, तमाम अनुभव, किस अनुभव और कितने प्रश्न से जाना जा सकता है ठीक ठीक, और पक्का होया जा सकता है कि नहीं यह व्यक्ति हमारे लिए सही है। मैं एक ही मुद्दे पर किसी के लिए सही हूँ , किसी के लिए बिल्कुल ग़लत। मेरे स्वभाव से कुछ लोग अत्यंत ख़ुश हैं वो जब जब मिलते हैं कहते हैं, आपसा होना मुश्किल है, आपको रिश्तों की कद्र आती है, आप भावनाओं को समझते हैं, कुछ मिलते हैं तो उनको मुझमें इस समाज में रहने योग्य व्यक्ति नहीं दिखता है, उनके अनुसार भावुकता और सुचिता के साथ रहने वालों का समय गया, कुछ लोग मुझे मध्यम मार्ग पर चलने की सलाह देते हैं। मैं किसी किसी क्षण इतना दिशाभ्रम हो जाता हूँ किसी ओर नहीं जा पाता वहीं खड़ा रह जाता हूँ। सोचता रहता हूँ अपने को, किसी पर आक्षेप करूँ की तुम मुझे समझते नहीं, तो पलटकर वह भी कह सकता है तुम मुझे नहीं समझते, 
समझना और समझा जाना बड़ा कठिन है। इस भागते युग में समझने भर की छुट्टी नहीं है किसी के पास, न बोलने और चुप रह जाने के पीछे का कारण पढ़ने भर का समय है। 

समझ बड़ी अजीबोगरीब चीज़ है, हम जिसको भी कहते हैं हम उन्हें समझते हैं हम सबसे कम उन्हें ही समझते हैं। हम सबसे ज्यादा अंडरइस्टीमेट उसे ही करते हैं जो हमारे प्रति सबसे ज्यादा सहज़ रहता है। किसी को समझने का कोई आसान तरीका ही नहीं है, समझना बड़ा जटिल है। कोई बात जिसे आप बहुत सरल मानते हैं उसे छेड़ दीजिये और उस व्यक्ति के जवाब बस सुनते रहिए, या कोई बात जिसे आप बेहद फूहड़ या क्लिष्ट समझते हैं उसपर उसके विचार लीजिए दोनों का मिलान कीजिए, सब बहुत उल्टा मिलेगा। 

सब किसी न किसी एजेंडे के तहत चल रहे हैं, जहाँ बात उनके एजेंडे के तहत फिट बैठती है वह बात समझ आ जाती है, और नहीं आती। नहीं आने में उनकी कोई गलती भी नहीं है, जिस समाज में सब कुछ पैसे से मिल जाता हो वहाँ भावुक हृदय को लेकर कोई क्यूँ चले, भावनाओं का भार बड़ा अधिक होता है, सबके वश में नहीं उसे उठा सके। किसी के लिए जगहें, खाना पीना, कपड़े भावना हैं किसी के लिए एक सामान्य वस्तु, उन्हें यह कभी समझ नहीं आएगा की मन होते हुए भी किसी के लिए रुके रहना, सामने होते हुए भी कुछ न खाना, अपने से पहले अपने प्रिय को सोचना मूर्खतापूर्ण भावुकता नहीं है, प्रेम है , जो नसीब नहीं किसी को, मगर यह इस जमाने के लिए तो मूर्खता ही है। बहुतों के लिए तो जल, जंगल, जमीन के लिए बोलना भी मूर्खता है, वो चीजों का और भावनाओं का बस उपभोग करना चाहते हैं, उनके लिए खर्च होना खड़े होना नहीं, नरेश सक्सेना की एक कविता है मुझे वह कविता पंक्ति ठीक ठीक तो नहीं याद पर उसका भाव याद है उसमें मछ्ली और पानी के प्रेम की बात है, मछली को लगता है जैसे हम पानी के लिए तड़पते हैं, पानी भी हमारे लिए तड़फता होगा, पर जब जाल ( संकट) आता है, हमें साथ की जरूरत होती है तो पानी हमें छोड़कर चला जाता है। 

जीवन दो देहों से एक मुश्त में लिया गया लोन है। समझ ईएमआई की तरह है, वह किस्तों में आता है। अनुभव उन्हीं किस्तों के साथ जुड़ा हुआ ब्याज़ है जो जुड़ता रहता है मगर दिखता नहीं है, दिखता तब है जब इकट्ठा होता है। इकट्ठा भी तब होता है जब जीवन का लोन समाप्ति की तरफ़ होता है, तब हमारे पास पछतावे के सिवा कोई विकल्प नहीं होता, तब समझ आता है अरे हमने तो इतना ज्यादा दे दिया। लिया तो आधा ही था। सहूलियत के लिए लिया गया सब कुछ बाद में दोगुना देना पड़ता है। यह तत्काल समझ नहीं आता, मगर आता है, तब जब तत्काल, बीता हुआ काल बन जाता है। 


यह दुनिया और इस दुनिया के लोग एक दिन बिलख कर ख़त्म होंगे, उनके पास सब कुछ होगा भावना नहीं होगी, उन्हें सुगंध महसूस नहीं होगी, लोग आज से दोगुना होंगे पर लोगों को प्रेम का मायने भूल जाएगा, उनका जीवन संसाधनों से भरा होगा पर सब कुछ बेरस होगा। तब समझ आएगा, समझना और समझा जाना कितना जरूरी है। प्रेम करते हृदय की कद्र कितनी जरूरी है। 

― आशुतोष प्रसिद्ध

Image source :- pinterest 

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