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स्मृति का अपना एक अलग देश है

शाम देर तक एक गली के मुहाने पर बैठा रहा। यही जगह है जहाँ मैं बिना ऊबे घण्टों बैठ सकता हूँ। यहाँ की सड़क किनारे मैंने अलसुबह दुकान लगने से पहले और रात दुकानों और लोगों के सो जाने तक प्रतीक्षा किया है। यहाँ जब जब आता हूँ मैं भूल जाता हूँ कि मेरी स्मृति से परे भी एक दुनिया है। जीवन के सुंदर होने की जो एक कल्पना जीने का कारण बनी हुई है, उसकी एक बारीक़ सी किरण यहीं चारों तरफ़ खड़े ऊँचे मकानों से छनकर आती है। यहीं वह कमरा है जिसकी हर दीवार से मुझे प्रेम है। ईश्वर ने सामर्थ्य दिया तो मैं जिंदगी भर के लिए उस कमरे को किराए पर ले लूँगा, और जब जब जीवन से जीवन कम होने लगेगा जाऊँगा वहाँ उसकी दीवार से पीठ टिकाकर बैठा रहूँगा, उसकी फर्श पर निर्वस्त्र हो लेट जाऊँगा और उस कोमल पांव को अपनी देह पर महसूस करूँगा जो यहाँ चला करते थे। उन आवाजों की प्रतिध्वनि सुनूँगा जो कभी मुझसे कहे नहीं गए।  

शहरीकरण में स्मृति से जुड़ी चीजें टूटती बनती रहती है, स्मृति तो कभी टूटती ही नहीं, वह एक बार जिस रूप रंग जिस साँचे में गढ़ दी जाती है फिर वैसी ही बनी रहती है, स्मृति वह इतिहास नहीं जो किसी के संवेदना से बदल जाए, स्मृति एकपक्षीय भी नहीं होती, स्मृति के सिक्के में हेड और टेल नहीं होता, स्मृति के सिक्के को उछाला तो जा सकता है मगर उससे चित्त और पट्ट आने की उम्मीद नहीं की जा सकती, स्मृति का सिक्का सीधा खड़ा रहता है, वह दोनों तरफ के लोगों को दोनों तरफ़ देखने की आज़ादी देता है। वह भारत का इतिहास नहीं जिसे मनमाने ढंग से 57, 47, 75 , 92 और 98 में लिखा जा सके। यह अड़िग है इसे न मंदिर से गिरा कर गुम्बद किया जा सकता है न गुम्बद को गिरा कर समतल किया जा सकता है, या मंदिरों और गुम्बदों से पहले की भूमि पर स्थिर है, इसे मिटाने वाले मिट जाते हैं यह नहीं मिटता।

सच कहता है कवि 'स्मृति का अपना अलग देश है' यहाँ अलग अलग वादों के चश्मे पहनकर इतिहास नहीं बदला जा सकता है। यहाँ कोई ऐसा पक्ष नहीं जो एक दूसरे पक्ष को क्रूर साबित कर अपने घड़ियाली आसूँ को मोती के भाव बेंच लेगा। यहाँ न कोई ऐसा है जो भूत में किए कब्जे को अपना कहकर कोर्ट में दबाए जाने का मुकदमा करे। यहाँ सब स्पष्ट है। यहाँ सब अपना अपना सच जानते हैं। 

बड़ी अजीब चीज़ है स्मृति भी, देखिए मैं 2 साल पहले बनी स्मृति के मोह में बोलता बड़बड़ाता 2000 साल पहले की सच्ची स्मृति तक चला गया। मैंने तो पहले ही कहा था स्मृति के सिक्के में हेड टेल नहीं होता, हेड टेल तो आपने हमने बनाया, यह सिक्का दोनों तरफ से सादा है और यह न दाएं गिरता है न बाएँ यह सीधा खड़ा रहता है।

मनुष्यों ने देर से रीढ़ पायी और जल्दी से खो दिया, स्मृति की रीढ़ मनुष्यों के यह जानने की रीढ़ भी कुछ होती है से पहले की है, उसे झुकना रेंगना या मचलना नहीं आता। 

मैं फिर कभी इस गली आउँगा तो भले ही यहाँ आसपास के मकान बदल जाएं, खुली नालियाँ बन्द कर दी जाए, बेतरतीब लगती सब्जी की दुकानों को तरतीब से लगा दिया जाए, सीमेंट के ईंटो से बनी सड़क गिट्टी और तारकोल की हो जाए, पर वह स्मृति नहीं बदलेगी, जो 2 साल पहले बनी, स्मृति पर कोई साज सज्जा का रंग नहीं चढ़ता। 

अलविदा स्मृति गली, फिर लौटूंगा, लौटने की तरह.. तुम्हें तुम्हारे सच्चे रूप में याद करते हुए। 

― आशुतोष प्रसिद्ध

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