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मार्च, 2025 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

घनी थी उलझन, बैरी अपना मन

कामनाओं की अति आदमी को आलसी कर देता है, वह एक ख़्याली दुनिया में रहने लगता है। वहाँ रहना घातक है। यूँ ही रचनात्मकता आदमी को मानसिक रूप से जितना चलायमान बनाता है, शारीरिक रूप से उससे कहीं अधिक आलसी बना देती है। मुझे जब जब घेरती हैं कामनाएं लिखता हूँ फाड़ देता हूँ। मैं इससे अधिक प्रतिरोध नहीं कर सकता अपने मन के प्रति। इच्छाओं को लिखकर फाड़ देना, खुद को थोड़ा थोड़ा फाड़ना है। यह भावनाएं नहीं है.. इच्छाएँ हैं। इच्छाएँ होंगी तो हम चाहेंगे उन्हें कोई या जिससे वह इच्छा है वह उसे पूरा करे। हम किसी पर हावी होंगे। या खुद बेचैन रहेंगे और जब खुद बेचैन रहेंगे तो खुद से जुड़े लोगों को सुकून कैसे देंगे भला। बेहतर है कम से कम इच्छाओं का प्रकटीकरण हो। उन्हें भीतर ही भीतर काटते छांटते रहिए। भावनाएं अति वैयक्तिक होती हैं। और बहुत निजी। यह जिसके लिए होतीं हैं उससे साफ सपाट कह देना चाहिए। यह बोझ नहीं बनता, न बनाता है। हाँ भावनाओं को कहना भर हो उसे थोपना नहीं। ज्यादातर तो हम उन्हें वैसे का वैसे बता या जता नहीं पाते जैसे वह होती हैं। भावुक आदमी के बोलने के दो ही साधन हैं या तो आँसू या चुप्पी। मेरे पास द...

खुशी का दुःख

अपनी ही लिखी चिट्ठी को पढ़ता रहा। कई कई बार पढ़ा। और सवाल करता रहा क्या .. ख़ैर !  न जाने क्यूँ मैं भीतर से किसी सीलन भरी दीवार की तरह हूँ, तनिक भी याद आती है, कोई स्मृति भीतर रेखा खिंचती है तो मैं बस रो पड़ता हूँ। मेरे हाथ पाँव काँपने लगते हैं। तुम्हारी याद आई.. मैं सह नहीं पाया न खुद को संभाल पाया। बस रोया। सोचा नहीं बस आँसू बहते रहे, सीने में अजीब ही हलचल होती रही। जीवन कितना कठिन है। कितना कठिन है वैसा जीवन न जीकर वह जीवन जीना जो आप नहीं चाहते। धीरे धीरे हम समझ पाते हैं कि धीरे धीरे कुछ नहीं होगा जीवन में हमें दौड़ना पड़ेगा। अभी नहीं दौड़े तो आगे दौड़ने भर का सामर्थ्य भी नहीं बचेगा।  आज मैं दौड़ा। थोड़ा सा दौड़ा।  आज जीवन की सबसे सुंदर चौपाई पढ़ी। जिसे फ्रेम करा लूँगा। आगामी भविष्य उस चौपाई के किस्से सुनेगा। पिता जब ख़ुश होते हैं तो दुनिया कितनी ख़ुश होती है।  * बहुत कुछ जान कर भी आप बहुत कुछ से अंजान रहते हैं। हर वो आदमी जो कह रहा है कि वह खुली किताब है उससे ज्यादा बन्द कोई किताब नहीं, बन्द किताब भी उतनी बन्द नहीं होती जितना खुली किताब बन्द होती है। एक एक अक्षर पर कई कई तह अक...

फिसलन

कितना और कब तक किया जा सकता है एफर्ट ? कोई तो सीमा होती होगी या बस जीवन एफर्ट करते बीत जाएगा। मुझे बहुत की इच्छा नहीं है पर जितनी है उतनी तो मिले उसमें भी कम कर दिया जाएगा तो फिर बचेगा क्या ? फिर तो चाहिए ही नहीं। मैं बिल्कुल उसी ख़्याल का हूँ कि 'हम तो पूरा का पूरा लेंगे जीवन' अगर चाहिए तो सही से चाहिए वगरना चाहिए ही नहीं। हर चीज की थोड़ी थोड़ी आवश्यकता है, थोड़ी मन की, थोड़ी देह की, थोड़ी ही आत्मा की, जीवन की भी बहुत थोड़ी ही, उसमें समझौता नहीं कर पाऊंगा मैं,  कह दो नहीं मिलेगा मैं छोड़ दूँगा, पर यह तनिक नहीं मानता मैं की थोड़ा सा ले लो, थोड़ा सा ही तो चाहिए, थोड़े का थोड़ा क्या होता है कुछ भी नहीं.. पता नहीं क्या चाहता हूँ मगर जो कुछ चाहता हूँ वैसा ही चाहता हूं जैसा सोचता हूँ। पूर्ण ईमानदारी, पूर्ण समर्पण और पूर्ण निष्ठा के साथ..  दिन इधर उधर करते, कुछ पढ़ते, कुछ लिखा हुआ ठीक करते बीता। सुबह से शाम तक एक बात नहीं लगातर बस चुप्पी। एक याद घेरे रही, मन करता रहा कि जाऊँ फिर सोचा नहीं, इंतज़ार कर लेते हैं, वो जब खुद आता है तो मन से आता है।  न जाने क्यूँ आज मुझे ख़ूब रोना आया। भीतर अजीब सा...

मन का मस्तिष्क

सुबह बहुत जल्दी उठ गया था। वही सब किया जो हर कोई रोज करता है। किताबें सही की और फिर दण्डी कृत दशकुमारचरित शुरू किया। कुल 80 पृष्ठ पढ़े। अभी 45 बचे हैं। कहते हैं संस्कृत गद्य अपने प्रारंभिक रूप में यजुर्वेद में ही मिलता है। उपनिषद और ब्राह्मण ग्रन्थों में भी उसकी परिपाटी चलती रही है। दशकुमारचरित में दस कुमारों के चरित्र का वर्णन है। जुआ चोरी व्यभिचार धोखा हत्या बेईमानी कामुकता अकाल अच्छा और बुरा राजा सब पर खुलकर और निर्मम होकर लिखा गया है। हर प्रेम कहानी का मूल यूँ लगता है कामाग्नि का भड़कना ही है। दण्डी यहाँ तक जाते हैं कि उनकी स्त्री पात्र खुद कहती हैं ' मुझसे संभोग करो,और मेरी काम पीड़ा मिटाओ'। मतलब यह की स्त्रियां अपनी हर इच्छा पर मुखर हैं कहीं दबी नहीं हैं। जो चाहती हैं कहती हैं। शास्त्रार्थ करती हैं। बहुपत्नी प्रथा है। लगभग समर्थन भी करता है कवि। विवाह से पहले पुरूष स्त्री को सम्भोग के लिए ले जाता है। सिद्धों की खूब चर्चा है, लगभग लोग अंध विश्वास में धंसे हुए हैं। देवता का कोई प्रत्यक्ष बात नहीं है पर उनकी आड़ ली जाती है। अजीब है सब। पर ठीक है.. अपने युग का नग्न यथार्थ कहती रच...

सो भी इक उम्र में हुआ मालूम

तरह तरह की बात है। हर मुद्दे पर, हर विचार पर विचार है। हर क्रिया के लिए है हमारे पास प्रतिक्रिया, मगर अपनी बात करनी हो तो सब विचार, सारा खुलापन, सारी कल्पना शक्ति वाक्पटुता सब न जाने कहाँ गुम हो जाता है। सब कुछ है मगर जैसे कुछ नहीं है, मन कहने से पहले सोचना पड़ता है इसे कहने के बाद क्या समझा जाऊँगा? यह सोचते ही यह भी सोचता हूँ कि क्या यह उचित है ? जवाब ही नहीं मिलता। एक संकोच लिए घूमता रहता हूँ, जो कहना चाहता हूँ कह नहीं पाता, मान लो कभी कह भी दिया तो क्या शर्त है कि वह पूरा होगा, उलट गलत समझ लिया गया तो। मैं यही सब सोचते हुए यह भी सोचता हूँ कि जिस भी रिश्ते में इतना सोचना पड़े उस रिश्ते की बुनियाद क्या मजबूत है ? जवाब नहीं में ही मिलता है। बुनियाद मजबूत कैसे होगी ? वैसे ही रहने से जैसे हम हैं, वही कहने, बोलने और दिखने से जो हम कहना चाहते हैं, समान्य रूप में बोलते हैं और जैसे असल रूप में दिखते हैं.. परिवार हो या प्यार अगर आप खुलकर मन नहीं कह पा रहे तो मन से वहाँ हैं ही नहीं.. * कितना कुछ अर्थपूर्ण दिखकर बे-अर्थ है और कितना कुछ बेअर्थ दिखकर है अर्थपूर्ण। सोचने की स...

लगभग तय

कल दिनभर दौड़भाग करने और खाना परोसने खिलाने में निकल गया। रात देर से आया यही कोई 12 के क़रीब। भीड़ में भीड़ की तरह मन दबाए दौड़ते रहने के बाद जब हम अकेले होते हैं तो सब दबाया फूट पड़ता है। अपने आप से सामना होता है। फिर बचता है समर्पित हो जाने के। जुड़े हर व्यक्ति की दिनचर्या है, उसमें हस्तक्षेप भी ठीक नहीं है। पिताजी न जाने क्यूँ बड़े हताश से थे। अपनों की भीड़ में भी जब गैरों से बात करना पड़े तो और क्या ही होगा। ख़ैर! .. डायरी खोलकर बैठा न जाने दिनभर का सोचा विचारा लिखा। नींद देर तक नहीं आई। बिस्तर पर कई तरफ से लेटकर देखा। थोड़ी देर जमीन पर लेटा रहा। सुबह देर से उठा। रात देर से लगभग सोने जैसा ही सोया भी था। देर से सोना और देर उठना कितना अपराधबोध भर देता है न हमारे भीतर ! फोन में तस्वीर देखता बिस्तर पर एक कोने कुछ घड़ी बैठा रहा। पिताजी की फटकार सुना तो वहाँ से उठा । कुछ घड़ी बालकनी में गमले देखा। कभी कभी सोचता हूँ हम कितने पापी हैं जिसकी पूरी पृथ्वी है उसे अंजुरी भर मिट्टी में समेट दिया है। अपने साथ भी तो हम यही कर रहे हैं। इधर उधर कुछ घड़ी किया, गुनगुना पानी पिया। नहाया। ब्रेड ले आया था उसे सेंक ल...
स्मृति की कचोट। झूठी हँसी की ओट ले छिपाता रहा आसूँ । जाने कैसा दिन बस बीत गया।  ― 24 मार्च 2025 / 9:15 रात

तुम अपने चरणों में रख लो मुझको

निर्वासन सा महसूस होता रहता है। कहाँ से ? यह पता नहीं। मगर लगता है कहीं हूँ ही नहीं। जिस परिवार के लिए जूझता रहा, अपने को खपा दिया, वहीं मुझसे कोई बातचीत ही नहीं है। सूचनाएं दुसरो से मिलती हैं। लगभग रोज फोन करूँ तो बात हो न करूं तो पलट के कोई पूछता तक नहीं। मैं देर तक निहारता रहता हूँ राह, कोई पुकारे , कोई कभी तो कहे कि .... ख़ैर.. यह स्वीकार करना कितना कष्टकारी है कि धीरे धीरे अपने भाई बहन भी पड़ोसी बन जाते हैं। अनन्तः आपका कौन है आपकी माँ और बीबी के सिवा.. ? वो भी एक दिन नहीं पूछें तो कोई अचरज नहीं होगा।   मेरे भीतर कल्पनाओं का एक संसार है, जहाँ मैं अपनी रचनात्मक उठापटक के साथ रहता हूँ। मुझमें घनघोर कामना है। वासना नहीं है। है भी तो वह उसी की है जिसके लिए होनी चाहिए। मैं घण्टों चुप रहता हूँ, कम बोलता हूं , बाहर लोगों से इंटरैक्ट नहीं हो पाता इसका यह मतलब बिल्कुल नहीं कि मैं आ अकेले रहना चाहता हूँ, मैं चाहता हूँ कि कोई है को महसूता रहूँ और रहूँ। मैं रहने की तरह रहना चाहता हूँ। अतिक्रमण की तरह नहीं। मैं जीने की तरह जीना चाहता हूँ मरते रहने की तरह नहीं।  *  ...

मन के द्वारे

कभी कभी हम बोलते हुए ऐसा कुछ बोल जाते हैं जो हम अपने भीतर इसलिए छिपाते रहते हैं की कोई हमारा वह असली रूप न देख ले और उसका ग़लत फायदा उठाए। हम अपने लिए नहीं अपनी उस भावना के लिए डरते हैं जो भीतर है। वह निरी भावुकता नहीं होती। वह शुद्ध भावना होती है। जिससे मुझे प्यार हुआ मैं उसके सामने बिल्कुल निर्वस्त्र होकर खड़ा हो गया। इस विचार को छोड़कर कि वह क्या सोचेगा क्या कहेगा। मन खोलना देह खोलने से ज्यादा कठिन है।मन देना देह देने से ज्यादा असुरक्षा भरा। मैं सब दे चुका।  'मेरा मुझमें कुछ नहीं.. ' * मेरा घर बीमार। मैं भी बीमार ही.. कोई कहीं दूर दिन भर पड़ा रहा मैं उसे सोचता विचारता खड़ा रहा।  * धूल,बालू ,तेज धूप, श्राद्ध, सूखता गला, साफ गाल, घण्टों की मशक्कत, महापात्रों का मान मनौवल। लौटना और बस लोट जाने सा मन। हल्का नाश्ता, ज्यादा उल्टी, थोड़ी देर बिटिया से खेलना। फिर पड़ जाना। * एक लंबी चिट्ठी लिखता हूँ, उसे बार बार पढ़ता हूँ और जब जब पढ़ता हूँ सोचता हूँ इसे अभी एक बार और पढूँगा अगर मैं नहीं रोया तो भेज दूँगा। * सर पर अपने ही कठोर हाथों से तेल मालिश कर रहा था, और आँख बंद कर महसूस ...

स्मृति

दिन !  एक के बाद अनेक दिन बीतते जाते हैं और हम सिकुड़ते जाते हैं। हम एक दिन इतना सिकुड़ जाते हैं कि थोड़ा और सिकुड़ने की इच्छा से टूट जाते हैं। हम आप टूटते हैं। आप ही जुड़ते हैं।  जब हम एक याद सहेजते हैं तो कई कई और यादों को भी एक साथ सहेज रहे होते हैं। उन्हीं कई कई यादों में से हम किसी एक याद के बने होते हैं। हमारी काया अनगिन यादों की कर्जदार है।  लिखा हुआ कुछ कितना अलौकिक होता है कितना सच्चा। कुछ शब्द छू रहा था और रो रहा था। कई बार वह बताया नहीं जा सकता जो महसूस होता है। ऐसा ही कुछ .. आज मन स्मृतियों में ही टहलता रहा।  गौरी और कृधा के साथ खेला कुछ देर..दोपहर बाद से स्मृतियों से दो दो हाथ कर रहा हूँ।  हिम्मत नहीं है कुछ अब । आज इतना ही। सब ठीक है।  मैं समझ नहीं पाता कभी कभी रो लेने के बाद जितना खालीपन और शांति लगती है, कभी कभी उससे उलट मन भारी हो जाता है। क्यूँ ..?  ― 21 मार्च 2025 / 8: 20 शाम 

जो कुछ मुझे दिया है वो लौटा रहा हूँ मैं

सुबह सुबह बारिश हुई। उठकर बाहर टहलता रहा। पेड़ पौधों पर जमी धूल साफ हुई। बौर धूल गए। हवा थोड़ी ठंडी हुई । मार्च ही में जो जून सा माहौल है कुछ हल्का हुआ। मैं देर तक बैठा रहा। राग रामकली सुनता रहा। मुझे बारिश बहुत पसंद है। न जाने क्यूँ  ख़ूब सूखे पत्ते गिरे हैं। अब उठता हूँ पर कोई है नहीं जिसे दे सकूँ। अपने आप को आप कुछ नहीं दे सकते सिवा दिलासा के।  एक कहानी पढ़ी अमरकांत की 'मौत का नगर' । जातीय हिंसा की पृष्ठभूमि पर है। कथ्य अच्छा है, शिल्प भी अच्छा है पर कहानी कमजोर है। कुहासा कहानी पढ़ी है अमरकांत जी की और भी बीसियों कहानी पढ़ी है। अमरकांत जी के भीतर के कहानीकार का फ्लेक्चुएशन  होता रहता है । कभी कभी यूँ लगता है वह लिखने कुछ और बैठे थे लिख गयी कहानी, या उन्हें लग गया यह कहानी है तो उसे जहाँ लगा कामभर का हो गया वही छोड़ दिया। इनकी कहानी इंटरव्यू,  गले की जंजीर, ज़िंदगी और जोंक, फ़र्क, कबड्डी, यह अलग टेस्ट की कहानी हैं। ख़ैर ! मैं ग़लत हो सकता हूँ। मगर यह मेरा अपना अनुभव है।  दिन भर इधर उधर न जाने क्या किया। कुछ काम किया कुछ पढ़ा। साहित्य इतिहास के लगभग 30 पन्ने प...

रौंदे हुए फूल

मुझे कहीं जाना हो या किसी करीबी को कहीं से आना हो मुझे नींद नहीं लगती। लाख जतन कर लूं नहीं आती नींद। अनगिन कल्पनाओं से भरा रहता है मन।  एक पल को स्थिर नहीं होता। भीतर कल्पनाओं के भवन बनते ढहते रहते हैं। मैं उसी कशमकश में जागता रहता हूँ। मैं धीरे धीरे करके बहुत कुछ टालना सीख गया मगर अपने भीतर का यह कशमकश नहीं टाल पाता। यूँ लगता है जैसे कल्पना कोई नदी है, तेज बहती नदी, जिसके किनारे पर ही मेरा चप्पू टूट जाता है और मैं फिर अनियंत्रित बहता रहता हूँ। बहता रहा रात भर। सुबह 4 बजे मम्मी नाश्ता बनाईं। कमरे में सब समेटा और निकल पड़ा। खाली हाथ गया था । फिर भी लौटते हुए सामान हो गया डिक्की भरकर। सोना का पैर छूने गया तो वो अपना मुँह फैला ली आगे पैर की सीध में.. उन्हें जब प्यार आता है तो ऐसे ही करती हैं बचपन से।  इन दिनों लगता है जैसे शरीर ऊर्जाहीन होती जा रही है। पहले बाइक चलाने पर थकान नहीं लगती थी अब लगती है। कन्धा और रीढ़ की हड्डी लग रहा था निकल जाएगी। पर ठीक है। पहुँचा सबसे हालचाल लिया। धूल झाड़े। पुराने पड़े कपड़े कुछ कागज़ कुछ और स्मृति सब जला दिया। पता नहीं क्यूँ भी...

फिर वही रात है

वही दिनचर्या। वैसा ही दिन । वैसी ही रात। दिनभर झकोर चलता रहा। मन हिलता रहा। कभी कभी लगता है जैसे ज़िन्दगी लगातार हड़बड़ी के लिए मिली है यहाँ सहेजो समेटो वहाँ जाओ, वहाँ भी वही करो। कुछ भी न स्थिर है न स्थाई। देश की दशा और मन की दशा एक सी है। मन भी उच नीच पहले और बाद की लड़ाई लड़ता रहता है। बस खून बहता है सफेद खून परिणाम कुछ नहीं निकलता। निकलेगा भी नहीं। इन दिनों लगातार मेरे मन में चलता रहता है कि कैसे.. कुछ नहीं।  चना काट रहा था सबकी बड़ी याद आई..पापा दीदी बच्ची सबको हरा चना भूनकर खाना पसंद है।  मुझे अजीब चिड़चिड़ाहट हो रही है। मन कर रहा है कहीं खड़े होकर चीख लूँ बस ― 18 मार्च  2025 / 7: 40 शाम 

कहीं बे-ख़्याल होकर यूँ ही छू लिया किसी ने

बहुत कुछ नहीं न सही, इतना तो कह ही सकता हूँ कि अब बहुत कुछ कहने की गुंजाइश नहीं बची। सवाल कर सकता है कोई की गुंजाइश कब थी ? तो भी जवाब यही होगा कि कभी नहीं। हम कभी नहीं और यह आखिरी है करते करते यहाँ तक पहुँचे हैं। जैसे जैसे आदमी जानता गया, नया ख़ोजता गया, औपचारिक, व्यवहारिक और प्रेमिल हुआ वैसे वैसे वह वास्तविक मनःस्थिति से भागना भी सीख गया, उसे कटना और काटना आ गया। झूठ उसका प्रमुख गहना हो गया, उसे सिर पर, जुबान पर, मन पर, सुहागन स्त्री के आभूषण की तरह सजा लिया, और चलने लगा, अब तो आदमी इस गहने का इतना आदी हो गया कि उसे उतार लेने पर आदमी पागल हो जाता है वह आव बाव बकने लगता उसी गाड़ी जीवन पटरी से उतरकर भागने लगती है।  मैं यह सब क्यूँ कह रहा हूँ ? शायद कहने की गुंजाइश बचाए रखने के लिए। मुझे इतना कहने की गुंजाइश है मुझसे आगे वालों को इससे भी कम होगी।  ***********  सुबह मौसम सुंदर था। मन के लिए तो सुंदर था फसलों के लिए बिल्कुल बुरा। सरसों कटी पड़ी है खेत में, जौ और गेहूँ भी लगभग पक गए हैं, चना तो बेकार ही हो रहा है। मगर अब आगे बारिश न हो तो बच जाएगा सब। सुबह सुबह बर्फ ...

कुछ तो लोग कहेंगे.. लोगों का काम है कहना

पिछले 3 सालों से डायरी के पन्नों पर लगभग हिसाब ने जगह ले लिया है। कहीं किराने का हिसाब है कहीं फल सब्जी और मिठाइयों का कहीं किराए लिखे हैं कहीं मजदूरों का हिसाब है। दवाओं के नाम भरे हैं या तो हॉस्पिटल के बिलों कक जिक्र है। फोन का नोटपैड भी लगभग ऐसे ही है।  मेरे आसपास के कई लोग जब मुझसे कहते हैं अरे वो तो तुम्हारे साथ ही रहता था उसका ये हो गया, तुम्हारा कैसे नहीं हुआ। मैं कुछ नहीं कहता, हँसकर कहता हूँ मैं बहैलपन करता हूँ, इधर उधर बेवजह घूमता रहता हूँ।  वो लोग घर के सदस्यों के मरने बीमार होने तक पर खड़े नहीं होते, उनके भीतर आत्मसम्मान नहीं है कहीं किसी से कुछ भी मांगकर खा लेते हैं रह लेते हैं मैं नहीं रह पाता। मुझे इज्जत का जीवन चाहिए या तो नहीं चाहिए। मेरे अकेलेपन और फेलियर होने पर सवाल उठाने वाले लोगों को पहले अपने गिरेबान में देखना चाहिए। वो जिस उम्र में खेल खा रहे थे मैं परिवार देख रहा हूँ, बहनों के लिए रिश्ता खोज रहा हूँ। वो जिसे सफलता और ऊँचाई समझते हैं उसे मैं लात मार आया हूँ, मैंने अलग राह चुनी है, मैं इसके दुखों संघर्षों को झेलने के लिए तैयार हूँ। मेरा जीवन म...

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कुछ विशेष नहीं। दौड़भाग भरा दिन। ऊब । थकन हावी है। परिवार के लगभग सब बीमारी में हैं। मैं हर तरफ भाग रहा हूँ कहीं भी नहीं पहुँच रहा।  सुकून का कोई एक कोना नहीं। किससे कहूँ मुझे छिपा लो। मैं थक गया हूँ। मैं इस जीवन से थक गया हूँ।  शायद नींद आ जाए। महादेव से एक ही विनती है या तो सब सामान्य कर दें या उठा ही लें।  ― 15 मार्च 2025 / 8:30 शाम 

बे-रंग का रंग

एक अनकही टीस । कोई टूटन। होने और न होने का भरम। कहीं होते हुए कहीं और होने की इच्छा और कहीं न हो पाने का दुःख। मन एक कन्धा ख़ोजता रहा। देह एक कोना। दोनों नसीब नहीं। सारे वातावरण में रंग उड़ रहे हैं, हमारे यहाँ रंग उड़ गया है। अब आगामी हर होली इस एक वाक्य से इस एक कमी से इस एक नमी से सामना होगा जो हर बार इसी रूप में होगा कि अभी वो होती तो कितना अच्छा होता। परिवार पूरा साथ आखिरी बार 2014 में दीदी की ही ( जो अब नहीं हैं)  शादी के समय होली में था। वह होली सच में रंग वाली होली थी। परिवार के साथ और प्यार के रंग वाली। और त्यौहार तो लगभग आधे अधूरे ही बीतते हैं। बीतेंगे आगे भी भविष्य में। हमारी चाहना ने हमारे जीवन से जीवन खींच कर निकाल दिया।  ऐसा क्यूँ है कि सुख और शांति साथ नहीं मिलती। समृद्धि आती है तो शान्ति गायब हो जाती है। शांति आती है तो समृद्धि गायब। माया का जाल कितने फर्द का बना है आदमी एक बार उलझता है तो खुलता ही नहीं।  ख़ैर ..! सैकड़ों रंगपर्व की शुभकामनाओं पर कुछ नहीं बोल सका।  सुबह से दाह के बाद की क्रियाओं में व्यस्त था। कल से अब तक जो किया जो सुना जो देखा मुझे यही सम...

कच्चा धागा

ज़िन्दगी की चादर कई सूत से मिलकर बुनी होती है। उस कई से कोई एक भी खींच लिया जाए तो सारे सूत ढीले हो जाते हैं। ईश्वर ने आज एक और सूत खींच लिया।  कलाई से एक राखी छीन ली ईश्वर ने। अब वह आवाज़ कभी नहीं सुनने को मिलेगी जो देखते ही कहती थी '..अरे दुर्गेश.. और लग जाती थीं सीने से जैसे छोटी बच्ची, जबकि थीं मुझसे 12 वर्ष बड़ी। बड़की दीदी सुन कितना ख़ुश होती थीं।  वो गिनती गड़बड़ हो गयी जिसके लिए बचपने में घमंड का भाव था मस्तिष्क में। कोई पूछता कितने भाई बहन हो तो कहता, 7 भाई 5 बहन । भाई 7 से 6 हो गए थे जब आदित्य गए थे और आज बहनें 4 रह गईं। भीतर से जैसे अपराधबोध से भरा हूँ जबसे पता चला है कि बीते दिनों बेड पर पड़े पड़े हर आते को मेरे नाम से पुकार ले रहीं हैं। 'दुर्गेश हैं , दुर्गेश कहाँ हैं..' मैं कहाँ हूँ ? मैं मर गया था दीदी। तुम्हारे लिए यहाँ जगह बन रहा था। तुम अब इस दैहिक कष्ट से मुक्त हुई। जबसे होश संभाला है मैंने कभी तुम्हें पूर्ण स्वस्थ नहीं देखा। एक मन कहता है तुम्हारे लिए बहुत अच्छा हूँ एक मन कहता है। मोह चाहती है हम कसे रहें। प्रेम कहता है उसे आज़ाद कर दो । पता नहीं क्या ठीक है। शिका...

उस तरफ जाने से पहले

हम भरे होते हैं कि अभी फलाँ व्यक्ति सामने पड़े तो बताऊं।  ढ़ेरों तर्क़ लगभग उतने ही सवाल जवाब लिए भीतर से बिल्कुल तने खड़े रहते हैं कि बस अबकी सब कह देंगे। अचानक उस चेहरे को देखते हैं जिसपर सिवा पसीजने के और कुछ किया ही नहीं जा सकता। हम बिल्कुल चौंक जाते हैं। हमें नहीं समझ आता यहाँ क्या करना है, कैसे पेश आना है। यह कितना अजीब है न कि हम दूर से कहीं की परिस्थितियों को बस सोच सकते हैं। किसी के मन को मनगढ़ंत सोच सकते हैं। सामने सब बिल्कुल अलग होता है। वास्तविकता से टकराते ही हमारे ख़्वाब के घर नींव सहित उखड़ जाते हैं। और हम असहाय हो खड़े हो जाते हैं। आम आदमी का हाल कुरुक्षेत्र में खड़े उस द्रोण की तरह है जो युधिष्ठिर के मुँह से 'नरो या कुंजरो' सुनकर अपना सब कहा सुना भूलकर हताश हो गया था। हम सब द्रोण ही हैं, हम सब एक अश्वत्थामा पाल रहें हैं।  ********** लगभग बातों पर मैं लगभग बचता रहता हूँ। जहाँ बहुत कुछ कहने की जरूरत होती है वहाँ कुछ कुछ कहकर बच लेता हूँ। रिश्तों को बचाए रखने के लिए कुछ घावों को रिसते रहने देना होता है और कुछ पर बकायदा मलहम पट्टी कर उसे ठीक कर देना होता है, यह...

लगता है बेकार गए हम

बहुत सी बातें जिन्हें हम सुख समझते हैं वह किसी के लिए दुःख हैं, और जिन्हें दुःख समझते हैं वही किसी के लिए सुख। यह वैसे ही है जैसे आम आदमी के लिए मौत कष्ट का विषय है पर डोम समुदाय के लिए उत्सव का। उनका जीवन ही लाशों पर टिका है। ऐसी बहुत सी परिस्थितियाँ हैं जिनपर बहुत सोचकर भी कुछ नहीं  किया जा सकता है। उन्हें बस जो जाना ही विकल्प है। जिया ही जा सकता है। भविष्य की योजनाओं को पीठ पर बांधकर नहीं चलना है। जो नियति में होगा दर तक आएगा ही। जो सुख जो इच्छा जी पाने योग्य होंउँगा जी लूँगा मरने से पहले।  ********* जाने क्यूँ लगता है, हम धीरे धीरे ड्रेन होते जा रहे हैं। हमारी सामंजस्य क्षमता खत्म होती जा रही है। जीवन जिस स्तर पर उलझाऊ और अर्थ पर निर्भर हो गया है हम मिनिमम जगहों पर होना चाहते हैं, यह छोटे परिवार का ही नहीं छोटे परिवार में भी अकेले रहने का दौर है। हम ख़ुद को भी नहीं झेल पा रहे हैं। इसका कारण बड़ा विकट है मगर ठीक है.. समय के साथ ढल न जाने पर टूट जाने का डर रहता है बेहतर यही है की घास बनकर जीवन जिया जाए। पेड़ बनने का दौर गया। अब जड़ों में सामर्थ्य नहीं कि वो तने और शाखाएँ सहित खड़...

बे-कायदे की बात कुछ कायदे से

कल का बुखार आज बासी हो गया है। कल दिन में घण्टों दवा के बोझ में अर्धनिद्रा में था। तो रात बमुश्किल नींद आयी थी। लगभग सुबह के पहर। जैसे नींद के द्वार तक गया लगा कोई पहरा दे रहा है। मैं बाहर खड़ा भीतर ताकने की कोशिश करता रहा। नींद की खोज में नींद नहीं सपने आए। सपने में दो साँढ़ आपस में भयंकर लड़ रहे थे। मैं उन्हें छुड़ाने के प्रयास कर रहा हूँ। एक काला है एक सफेद। कभी एक भारी पड़ता है कभी दूसरा। घर के सारे कुत्ते आसपास भौंक रहें हैं। साँढ़ के खुरों से धूल ही धूल उड़ रही थी। मेरा हृदय एकदम डरा हुआ था। गला सूख रहा था कहीं कोई मर न जाए। किसी किसी क्षण तो लगता अभी मेरे ऊपर ही आ जाएंगे। कुत्ते जब ज्यादा परेशान करने लगते तो वो भागते और जहाँ रुक पाते वहीं फिर लड़ने लगते। ऐसा पहली बार हुआ। जब मैं सपने में साँढों की ऐसी लड़ाई देख रहा था। नेपथ्य में तुम कहीं के लिए तैयार हो रही थी। मुझे बार बार पुकार रही थी चलो अब बहुत देर हो गयी है पहले ही.. उन्हें लड़ने दो। छोड़ देंगे थोड़ी देर में। मैं जैसे हटने का सोचता यह और भयंकर होने लगता। अनन्तः बड़ी दीदी आईं मुझे खींचकर ले गईं चलो यहाँ से नहीं तो इनकी लड़ाई में चोट तुम्...

नीली रौशनी आ रही है कहीं से

सोचता हूँ नहीं बताऊंगा। नहीं बताने का एक ही तरीका है सामने न पड़ना या बात न करना। पर जैसे ही बात होती है सब बक बक बोल जाता हूँ। भूल जाता हूँ दूर बैठा व्यक्ति मुझसे पहले भी तमाम बातों से जूझ रहा होगा। मन या तो कहीं खुलता नहीं या जहाँ खुलता है वहाँ फिर झूठ नहीं बोल पाता।मैं तुम्हारे सामने तुम्हारे लिए निरावरण हूँ। तुम तय करो तुम्हें कैसे देखना है। देखना भी है या नहीं। दिन लगभग बिस्तर पर, जमीन पर घुरचते बीता। ऐसी दैहिक पीड़ा दिनों बाद नसीब हुई। काश यह बीमारी इतनी बढ़ती की मेरे पास चली आती तुम.. कोई न कोई तो तुम्हें सूचना दे ही देता। मैं न बुलाता तो भी।  मैं बुलाने से डरता हूँ। नहीं आई तो .. ? ख़ैर ! एक स्कूल के दोस्त की बहन आईं थी। उन्हें बस तक छोड़ना पड़ा। आदर्श और बदर आए थे। कुछ इधर उधर की बातें हुई। चाय पिया गया। भईया आए थे दोपहर में तो खाना नसीब हो गया था। वो डाँट कर खिलाते हैं। कल रात से एक अजीब सी खलिस है सीने में उसके लिए शब्द नहीं है मगर है.. बहुत निजी है।  कुछ पढ़ लिख नहीं पाया। अभी बैठा था तो अनुवाद वाला काम देखने का प्रयास कर रहा था। मन नहीं किया। डायरी खोलकर सोचा...

जैसे आँसू की यमुना पर छोटा-सा खद्योत

तुमसे बात करने की तीव्र इच्छा है। ऐसा लग रहा है रह रह कर कोई काँटा चुभो रहा है भीतर। पर बात क्या करूँगा पता नहीं। तुम्हारे सवाल का जवाब दे पाउँगा यह भी नहीं पता। मैं तुम्हारी आवाज़ सुनना चाहता हूँ। वही जिसमें शांति है। स्थिरता है। कुछ करते रहने का भार है। किसी मजबूरी का बोझ है। कौन सी पता नहीं। मैं जब जब तुमसे बात करता हूँ लगता है तुम कहीं दबी सी बोल रही हो। तुम्हें क्या कौन सा डर खाए जा रहा है पता नहीं। मैं जब तुम्हारे करीब भी होता हूँ और तुमसे वैसा व्यवहार नहीं पाता जैसा चाहता हूँ तो मेरे भीतर वह व्यवहार न पाने का शोक नहीं होता, ऐसा क्यूँ नहीं है ? किस बात की कचोट कौन सा अनुभव छीन ले गया तुमसे ऐसा व्यवहार इसकी चिंता खाए जाती है। तुम पूछती हो क्या सोचते रहते हैं हमेशा ? यही। कैसे बताऊं इसे कि यह डर बना रहता है। मैं भीतर बन रही चोट से ज्यादा तुम्हारे भीतर बने घाव की पीड़ा से व्यथित हुआ रहता हूँ। मैं जानता हूँ हर दर्द, हर नकार, हर संकोच का एक अतीत होता है। और हर अतीत की अपनी पृष्ठभूमि उसे मिटाई नहीं जा सकती। उस पर और रंग तो चढ़ाए जा सकते हैं न ? जिससे वह दिखे न..  सुबह से न जाने क्या क...

मन दिमाग से नहीं चलता और न दिमाग मन से

दिमागी समझाइश पर इच्छाओं का भार इतना हो जाता है कि मन सारी सूझ बूझ सारी रोका टोकी भूल जाता है और मन उसी तरफ भागता है। वह फैंटसी नहीं है। वह वास्तविक जीवन है। जहाँ से फैंटसी का अर्थ है। रात बमुश्किल नींद आई। नींद आई तो सपने में अनगिनत साँप ने घेर लिया। तुम चीखती चिल्लाती रही। मुझे खींचती रही। मैं बचने का कोई जतन नहीं कर रहा है। मैं तुम्हारे भीतर अपने लिए प्रेम देखकर स्थिर हो गया था। मेरे भीतर से साँपों का डर चला गया था। अनन्तः तुम मुझे बचा ले गयी। साँप जैसे अचानक चलती राह में आए थे वैसे ही गायब हो गए। सब ख़ूब मोटे मोटे और खतरनाक थे। पर किसी ने काटा नहीं बस डराया, मैं डरा भी। तुममें अदम्य साहस है।  नींद खुल गयी। फिर घण्टे भर बिस्तर पर करवट बदलता रहा। फोन में कुछ तस्वीर देखी जो मन को तरल कर गए। एक चिट्ठी लिखी। भेजने की हिम्मत नहीं हुई। नहीं भेजा। 4 बजे बिस्तर छोड़ दिया। कुछ देर बालकनी में बैठा रहा। मच्छर टूट पड़े तो फिर लौट आया फ्रेश हुआ और किताब लेकर बैठ गया। 'टेबल लैम्प' पढ़कर खत्म किया। गीत चतुर्वेदी के गद्य में एक भीतरी लय है। जो और कम मिलती है। उनकी गद्य भाषा इतनी सरल...

होने और न होने के बीच की याद

बहुत कुछ पूरा होता है तब भी बहुत कुछ अधूरा रह जाता है। कई बरस पहले ही किसी कविता में कहा था 'नमी जब ज्यादा हो तो बीज उगते नहीं हैं सड़ जाते हैं' उसे फिर फिर महसूसने का दिन रहा। पिछले 24 घण्टों में कई बार डायरी खोले बैठा। बैठा ही रहा। एक शब्द नहीं लिख पाया। आत्माख्यान, आत्मलीन और आत्मरत होकर नहीं लिखा जा सकता। अपने से अलग होना पड़ता है। नहीं लिख पाया। एक शब्द भी नहीं। एक ख़ालिस डॉट या पूर्णविराम भी नहीं। कागज कोरा का कोरा रहा। हाँ, दो चार बूंद आँसू जरूर गिरे। फिर उस पर कुछ लिखा नहीं। तारीख़ डाल दिया अभी। और पन्ना बदल दिया। कोई कभी पढ़ पाया तो वही जान पाएगा वह जो उसपर सम्भावित था लिखा जाना। शायद नहीं जान पाएगा। नहीं जान पाएगा तो मेरा ही फायदा है। यूँ भी तो मेरा मन सबका मन रखने के लिए बना है। मेरा मन कहीं कोने में रख दिया गया था बरसों पहले। कौन जतन करेगा उसे उठाकर झाड़ पोंछ कर देखने की। मैं खुद भी नहीं करता।  अपने हाथ से बिछाए फूल अपने ही हाथ से समेटे। समेटते हुए वह मखमली नहीं लग रहे थे। कँटीले भी नहीं थे। सब वैसे का वैसे रख दिया। बिल्कुल यंत्रवत रहा। कपड़े निकाले सिरहाने रखी कुर्सी पर र...

चले जाने का चले जाना

'वो मिलकर चले गए' इस वाक्य में मिलने पर जोर दूँ या चले गए पर ? चले जाने से क्यूँ चला जाता है मिलने का सुख ? कौन छूटता है दो लोगों के मिलने पर और चले जाने पर ? मिलने आने वाला या मिलकर चले जाने वाला ? जो भी छूटता है वह कैसे रहता है अकेले ? मेरी तरह तो नहीं रहता, हर शय में उसे ही तलाशता हुआ। वही जो चला गया। जिसका जाना आने से पहले तय रहता है। जिसपर मेरा पूरा अधिकार है और कोई अधिकार नहीं। जिसे छू सकने का सामर्थ्य मुझमें आजतक नहीं, वो मुझे छुए इतना भाग्यशाली तो मैं हूँ नहीं। हम अधूरी इच्छा ही नहीं अधूरी छुवन से भी भरे हुए हैं। हम पर इतना दबाब है कि हम जब जब फटते हैं रो पड़ते हैं। हमारे ज्वालामुखी का केंद्र आँख है और लावा वह आसूँ जो उससे फूट पड़ता है। यह बेहद गर्म होते हैं। यह दुःख के आँसू होते हैं। दुःख के आँसू गर्म होते हैं। ग्लानि के ठण्डे।  इतने सालों में मैंने एक बात गौर की जब जब मुझे रोना आता है मेरी बाईं आँख से आसूँ पहले गिरता है दायीं आँख से बाद में। ऐसा क्यूँ पता नहीं । मगर ऐसा है। मेरे भीतर की स्त्री दाहिने क्यूँ नहीं होती। अब स्त्रियों को अपनी जगह बदल लेनी चाहिए व...

लगभग जीवन

मन किसी खंदक की खोह में घूमता रहा था सुबह से। रात की थकन पर अकेले पड़े रहने और अपने होने की व्यर्थता बोध ने परेशान रखा। एक याद सालती रही भीतर। दोपहर होते होते दिन खुला। मन ऐंठता रहा। यूनिवर्सिटी के गेट तक गया। लौट आया। मन कर रहा था बस कहीं पड़ा रहूँ। बाहर लईया चना खाता बैठा रहा। फिर कुछ दिन हुआ.. रौशनी लौटी। अब मेरी आँखों मे रौशनी है। ज़िंदा की तरह महसूस रहा हूँ। सब ठीक है। गीत चतुर्वेदी का 'लैम्प पोस्ट' पढ़ना शुरू किया है। 2 लेख पढ़ें हैं। अभी जीवन पढ़ रहा हूँ। पिताजी ऑफिस से थके हारे आएं थे। उन्हें माँ के स्वास्थ्य की चिंता है। मुझे दोनों की..  फिर आगे..  ― 3 मार्च 2025 / 9 : 15 शाम 

निरर्थक का अर्थ

यात्रा जारी है। यह मेरी यात्रा नहीं है। भविष्य के गर्त की ओर जाने की यात्रा है। मैं किसी गोल पिण्ड की तरह रफ़्तार में मौत नाम की खाई की तरफ लुढ़क रहा हूँ। तुम कहीं बीच में मिलोगी। फिर हम साथ लुढकेंगे। लुढ़कना रुकेगा नहीं ।  ************* बहुत ज्यादा सोचता हूँ पर बोलता हूँ बहुत कम। जब बहुत बोलता हूं तो बिल्कुल नहीं सोचता। बोलने के बाद सोचता हूँ ज्यादा तो नहीं बोल गया, फिर ख़ुद पर शर्मिंदा होता है , माफ़ी मांगता हूं। फिर तब तक चुप रहता हूँ जब तक अपने होने की याद बनी रहती है।  ************** सुबह उठते ही पाँव फोड़ लिया। हड़बड़ी मेरी मेरे लिए हर बार खतरनाक हुई। पिताजी को परेशान किया वो स्टेशन आकर खड़े थे। फिर बताया बस से आउंगा तो लौटकर गए। फिर आए घण्टे भर बाद। यह चोट से ज्यादा पीड़ादायक था। साथ जाने की बात थी अकेले गया। अकेले अकेले अकेले ही रहा। वर्तिका जी से मिला। कोई साहित्यिक बात नहीं हुई। पढ़ाई लिखाई नौकरी घर गाँव की चर्चा हुई। उनमें एक अजीब छटपटाहट है। न जाने कैसी। जैसे वह जानती नहीं उन्हें क्या करना चाहिए। लिखना ठीक है उनका। और ठीक हो सकता है। रवि के सत्कार ने मन मोह लिया। ...

उसके दो नाम हैं

यूँ नहीं है कि मैं कुछ सोचने से बचता हूँ। अजब बात है, सोचने से भी बचा जा सकता है भला ? प्रयास तो किया ही जा सकता है। करता हूँ। किया। न जाने क्यों कल रात से ही मुझे रह रहकर रुलाई फुट पैड रही है। लग रहा अजीब सा खालीपन है। कोई याद है। पेट में मरोड़ सी होती है। दो चार आँसू गिरते हैं, सर पर मारता हूँ, सीने पर हाथ रखे कहता हूँ सब ठीक है। और फिर कुछ देर ठीक होने सामान्य रहने का नाटक करता हूँ। नाटक कितना भी परिपूर्ण हो कुछ न कुछ तो बच ही जाता है। बच जाता है। खुल जाता हूँ। खुद से कतराता हूँ। न जाने क्यूँ ..  मैं वो हूँ जो इस डाल से उस डाल हो रहा हूँ और कहीं एक भी आम नहीं मिल रहा है। वहाँ था तो अकेले था 15 दिनों से बस दौड़ते बीता। अब यहाँ भी तो भी अकेले हूँ। क्या यही.. नहीं ! इतंजार की कोई सीमा होनी चाहिए। और न पूरे होने पर जब पूरा हो तो वह दुगुना होना चाहिए। कुछ नहीं ।  कुछ कुछ पढ़ा। मन खराब हुआ। अपनी ही कविताओं से उलझा रहा। समझ नहीं आता मेरी कौन सी कविता है जो अच्छी है जिसे पढ़ा जा सकता है। कल एक जगह कविता पढ़ने जाना है। मन नहीं है। सम्मान वश जा रहा हूँ। बसंत सर के कहे की लाज रखनी है। यूँ ...