आसपास अजीब सा माहौल है। लोग फिर से तैयारी में जुटे हैं, जिनके घर बच्चे हैं उनका उत्साह देखते बन रहा है, घरों पर नई जगमग लाइट लग गईं हैं, बाज़ार अपने साज सामान के साथ फिर तैयार हो गया है। लोग नए साल में जाने से पहले मन भर लूटेंगे। कई सवाल हैं, मगर करूँगा नहीं, उनका जवाब जानता हूँ, उस सवाल के बाद मेरी सोच पर उठे सवालों को भी जानता हूँ। जब उत्सव सा माहौल होता है, मुझे घर की बड़ी याद आती है..घर वो नहीं जो चार दीवारों का है, घर वो जो मुझे घर सा लगता है उसके बिना कुछ देखने का ही नहीं मन करता, न अच्छा ही लगता है, कल कैसे बीतेगा.. बीत जाएगा। बीता दिया जाएगा। ********** चोट लगने से जो घाव हुए थे वो भर रहें हैं। चोट लगने के दौरान जितनी असहजता नहीं हुई उससे ज्यादा अब हो रही है। घाव जब भरने लगते हैं तो उनमें इतनी कलबलाहट क्यूँ होती है ? दुविधा यह है कि हम उसे कुरेध भी नहीं सकते। धैर्य बड़ी मुश्किल सी बात है । ********** आज विद्यापति को पढ़ रहा था, बहुत कुछ नहीं तो इतना तो कहा ही जा सकता है कि शुद्ध रसिक आदमी थे। उन्हें कलावादी कहना कहाँ तक उचित है मुझे नहीं समझ आता ? अगर है भी तो ऐसी कला से कला क...