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कुछ कुछ में से कुछ जो बच जाता है



प्राकृतिक तरीके से होने की सम्भावना को अपने तरह से कर लेने की इच्छा और न हो पाने / कर पाने  के कारण जो टीस पैदा होती है, वही टीस भीतर बनी रही। एक और इच्छा पर पानी फिर गया। मैं देर तक सोच रहा था यह कैसे स्वीकार करूँ, अनन्तः भावनाओं को जज्ब कर लेना ही उचित लगा। कर लिया। क्योंकि सच ही कहा है, कि 'आपन सोचा कुछ नहीं हरि सोचा तत्काल' और उस तत्काल को जीने के अलावा हमारे पास कोई विकल्प भी नहीं है। गौर से देखो तो हर कहीं एक गहरी खाईं हैं, समतल, समतल में भी नहीं, वह भी खाईं ही है। 

जीवन खुली आंख से बन्द आंख की तरह चलना ही है। 

आज बहुत कुछ लिखा, कुछ चिठ्ठी, कुछ मन के द्वंद्व पर सब बकवास, उन्हें नहीं पढ़ा जाना चाहिए, क्योंकि सब मेरे मन के विकार हैं। डिलीट कर दिया। 

सुबह जब टहल के और व्यायाम करके लौटा तो एक तितली भी मेरे साथ कमरे में घुस आई थी, वो दिन भर यहीं फड़कती रही। जाने क्या खाई होगी, उसे भूख तो जरूर लगी होगी, मैं दाल चावल खा रहा था तो सोच रहा था वो भी खाती तो खिला लेता साथ.. मैं इतना कठोर तो नहीं कि तितली न पाल सकूँ। पर वो खाई नहीं, एक दो बार पकड़ने का प्रयास किया पर हाथ नहीं आई, उड़कर छत पर लटक गई, बाहर जाने के रास्ते थे पर वो गई नहीं, दो बार गई लौटकर फिर आ गई। ये पटाखे जलाने वाली मूर्ख जमात नरक मचाई हुई है। आज दोपहर में धोबी दादा को कपड़े देने गया था तो उन्हें त्योहारी दी हाल चाल लिया पूछा कब तक देंगे तो बोले कल दूँगा अब दोपहर तक शाम के बाद कुछ कर नहीं पाता इतना पटाखा फोड़ रहे हैं कि सारी गली में रोगन झड़ता, उनकी पत्नी भी बैठी थी वो बोल पड़ी बोरी भर भर पटाखालाए हैं भईया और अभी कह दो हमें भी कुछ पैसा बढ़ा दो त्यौहारी दे दो तो कहेंगे पैसा कहाँ है? धोबी दादा उन्हें बोले चुप रहो, तुम तो और.. वो कुछ धीरे धीरे बोलती रहीं मैं चला आया। 

दिन भर मैं इस शहर में रहते हुए भी यहाँ नहीं रहा। मन सरयू किनारे था देह यहाँ इस अनजान शहर में जहाँ कोई मेरा अपना नहीं है। 

कुछ कुछ पढ़ने का प्रयास करता रहा, फ़ैज़ की चिट्ठी पढ़कर कल ही रात खत्म कर दिया था नींद आ ही नहीं रही थी तो 3बजे तक पढ़ा वो किताब और खत्म हुई तो लेता। पढ़ने से पहले लगभग 2 घण्टे बिस्तर पर पड़ा पर, फोन पर बात किया, फोन कटा तो फफक कर रो पड़ा। ऐसी कसी हुई याद लगा सीना फाड़ दूँ अपना, काश ये हो सकता कि दिल को सीने से निकालो उसमें से कुछ इच्छाओं को पानी से धोकर उसे फिर लगा दो तो मैं हर घण्टे करता यही। शायद तब हल्का लगता। 

आज पिताजी का स्वास्थ्य कुछ ठीक था, सुबह से तीन बार फोन करके पूछा, क्या खाए हैं, बीपी चेक किये की नहीं, सिर कैसा है, शरीर झन्ना तो नहीं रही, आज वो ठीक थे, पर कुछ चिढ़े से थे, या शायद उनका तरीका ही यही है। मगर ठीक लग रहे थे। पापा घर हैं इन दिनों, दिनभर कुछ न कुछ करते रहते हैं। शाम को हमें ख़ूब ज्ञान दे रहे थे कि अकेले हो तो लापरवाही न करना खाना बनाना, सोचना नहीं ज्यादा, पढ़ना लिखना। खैर.. 

अज्ञेय की एक पुस्तक है, निबंध संग्रह है आत्मनेपद उसमें से कुछ निबंध पढे। फ़ैज़ की चिट्ठियों के खुमार से निकल नहीं पा रहा हूँ, अदभुत है वह संग्रह, कई कई द्वंद्व शांत होकर बैठ गए, कितने सवालों के जवाब मिल गए। चिट्ठी सबकी क्यूँ नहीं प्रकाशित की जाती ? उससे बड़ा और बेहतर साहित्य क्या होगा भला, आदमी का नंगा और सीधा सपाट चरित्र दिखता है, जीवन की बिल्कुल स्पष्ट तस्वीर। जिसके लिए चिट्ठी लिखी जाती होगी वो कितना पुण्य करता होगा.. सब छीन लेने वाले संसार में सब दे देने की चाह से भरा व्यक्ति कितना निरर्थक और अकेला जीवन जीता है यह देख रहा हूँ भोग रहा हूँ। 

एक थीसिस का काम लिया था, कई महीनों से वो अटका पड़ा है मन ही नहीं होता कि उसे उठाउँ, आज कुछ देर को उस पर लगा था पर मन नहीं लगा, अब सोच रहा हूँ कुछ दिन केंद्रित होकर उसे करके दे दूं कुछ पैसों का भी इंतजाम हो जाएगा, पापा के दवा की भी तारीख आ रही है अगले महीने और भी खर्चे होंगे, कुछ सोचा भी राम जाने क्या क्या कर पाऊंगा.. 

शाम से मन बहुत अजीब किस्म का हुआ है, इन दिनों मुझे जाने क्यूँ बहुत अजीब सपने आते हैं, कभी ऐसे सपने आते हैं जिसमें मैं इंटिमेट हो रहा होता हूँ, कभी ऐसे जिसमें मुझसे झूठ बोला जा रहा होता है और मैं पकड़ लेता हूँ, कभी मैं एक गहरे काले कमरे में अनगिनत बल्ब जलाकर उजाला करने का प्रयास कर रहा होता हूँ, यह सब क्या है पता नहीं। 

ख़ैर.. बात का अंत नहीं है। यहीं बन्द करते हैं। 

― 23 oct 2025 

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