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जीवन के इंद्रजाल में

इन दिनों में मन बासी भोजन की मानिंद हुआ रहता है। मिर्च मसाला पाक सब सही होने के बावजूद स्वाद गायब है, स्वाद उस भीतरी गर्मी से था जो भोजन में अब नहीं है। 

कल की शाम खुशनुमा थी। आलोक ही आलोक था चारो तरफ, पटाखों की गूंज थी और दीपों की रौशनी। पर यह आलोक मनुष्य की उपस्थिति से धूमिल हुआ जाता था, अब हर जगह आदमी इतने हो जाते हैं कि कितनी भी व्यवस्था हो वह अव्यवस्था में बदल जाती है। मुझे साथ सुंदर लगता है, लेकिन सबका नहीं, सबके साथ को साथ कहा भी तो नहीं जा सकता, साथ वही अच्छा है जहाँ दो मस्तिष्क एक तरह की जीवन शैली के आसपास के हों, उनके पैरामीटर लगभग एक जैसे हों। इन सबके बावजूद जो सबसे जरूरी सेतु है किसी साथ में वह है टॉलरेंस और अपने से ऊपर किसी को रख सकने की क्षमता। 

मौसम अब नम हो चला है, हवा न भी चल रही हो तो भी लगती है, ठण्ड अपने पांव पसार रहा है। मैं यूँ ही हल्की हवा और धूल से छींकने लगता हूँ, वही हुआ। 

कुछ क्षणों को ख़त्म नहीं होने देने का मन करता है। कुछ साथ बिल्कुल नहीं छोड़ने का मन करता है, पर.. 

कभी कभी सोचता हूँ क्या मैं सबको विदा कहने के लिए ही बना हूँ क्या ? मैं रोकने की इच्छा पर भी नहीं कह पाता कि रुक जाओ, डर लगता है नहीं रुका तो..

मैं ख़ुशी के क्षणों में उदास हो जाता हूँ जाने क्यूँ, भीतर मरघट सा सन्नाटा फैल जाता है। सोचता हूँ साथ वाला सोचता है कितना मनहूस आदमी हैं कहीं ख़ुश नहीं दिखता। मैं खुश होता भी हूँ तो दिखा नहीं पाता, छोटी छोटी चीज़ों के लिए मन इतना कल्पा हुआ है कि अब चुल्लू भर भी मिल जाए तो आत्मा तृप्त हो जाती है। 

इन दिनों की कोई और योजना थी। पर वह भी और तमाम योजना की तरह योजना ही रह गई। मैंने इतने दिनों में एक चीज़ महसूस की कि जो कुछ भी मैं योजनाओं में सोच लेता हूँ, जिसके लिए मैं अति प्रसन्न हो जाता हूँ वही नहीं होता है। 

मुझसे हर व्यक्ति हताश हो चुका है और सबसे ज्यादा मैं खुद से.. मैं बहुत प्रयास करके भी अब वैसे नहीं पढ़ लिख पाता जैसे सोचता हूँ, मेरी क्षमता जाने क्यूँ क्षीण होती जा रही है। भीतर ही भीतर जाने क्या टूटता रहता है, उसमें न कुछ कहने लायक है न बताने, हो सकता है यह केवल मेरा भ्रम हो और यह भ्रम मेरी आत्मा पर हावी हो गया है, मैं बेग़ैरत की तरह बस सोचता रह जाता हूँ, करने भर की हिम्मत ही नहीं जुटा पाता। एक अबूझ किस्म की शर्मिंदगी घेरे रहती है। मैं जाने कितना ढीठ हूँ कि मुझे मरने का भी मन नहीं करता.. 

इन दिनों वो लोग लौट रहे हैं, जिन्हें देख भर लेने से मेरी देह में आग सी लगती है, बीते दिनों एक ऐसा ही वाकिया हुआ था, आज फिर एक ऐसा ही व्यक्ति दिखा, जिसकी वजह से मैं कितना रोया हूँ। यूँ लगता है, एक पल को मेरे भीतर सब बोध शून्य हो जाता है। 

एक बात तो तय है, उदात्तता के छाँव तले ही अनुदात्ता भी पलती है, जैसे दीपक के ठीक नीचे ही अंधेरा होता है वैसे ही मनुष्य अपने ही घेरे में अंधा होता है उसकी आंख होते हुए भी वह कुछ देख नहीं पाता, चित्त होते हुए भी कुछ सोच नहीं पाता। 

हम सब भ्रामक सभ्यता और बौद्धिकता के शिकार हैं। 
आज दिन भर पुरानी पढ़ी किताबें पलटता रहा, उसमें से नया मिला जो उस पर गुनता रहा। 

काश! आदमी भी साँपो की भांति अपनी केंचुली उतार सकता 


― 6 नवंबर 2025 

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