छोटी छोटी इच्छाओं पर बड़ी बड़ी जिम्मेदारी आकर बैठ जाती हैं और मन मसोस कर सोचता हूँ चलो फिर कभी.. यही करते करते 28 का होने को आया।
मैं कभी अपने किए, वादों, इरादों, देखे हुए सपनों, न जी पाए हुए पलों को सोचता हूँ और भूल जाता हूँ कि मैं यह हूँ जो यह लिख रहा है।
भारतीय जीवन संस्कृति जिस तरह बनी है और हमारे भीतर जिस तरह के संस्कार भरे गए हैं वो हमें बचपन से भीरु बनाते हैं, हमें संशयी बनाते हैं कि हम अपने फैसले और अपने लिए फैसले तो ले ही न सकें। हमने तमाम दर्शन बनाए, ख़ूब नीतियां गढ़ी पर जब जमीन पर देखो तो सब बेकार है, वहाँ बनाने वाला ही वही कर रहा होता है जिसे वो करने को मना करने को लिखता कहता है। इतनी गुथमगुत्थी है कि कोई एक डोर पकड़ो तो उसे और कई डोर पकड़ कर कस लेतीं हैं, आप अकेले निकलना चाहें तो आपको निकलने नहीं दिया जाएगा। निकल भी गए तो नालायक, परिवार द्रोही, निर्मोही जाने क्या क्या कहा जाता है।
कल रातभर मन में यही सब चलता रहा। मैं उन तमाम बंधनो को सोचता रहा जो मैंने अपनी रुचि से नहीं बनाया लेकिन उस बंधन से और तमाम चेहरों पर जो हल्कापन है उससे मुझे शांति मिलती है लगता है जीवन का अर्थ सिद्ध हुआ, लेकिन क्या सच में ? भला क्या यह संभव है कि अपने को मारकर आप किसी का भला कर सकें। हो भी सकता है ऋषि दधीचि हमारे ही लोक के प्रचलित पात्र हैं, और उनसे सम्बंधित कथा हमारे ही लोक की प्रचलित कथा है। सम्भव है वो हमारी देह के किसी डीएनए में घूम रहे हों।
इन दिनों तन मन धन हर तरफ से बस कसाव है, दिन भर बस पड़े रहने का मन होता है, बुखार हुआ सा लगता रहता है। एक अजीब सी चिढ़ सी व्याप्त है, मौसम भी अजीब रूखा सा है, आसपास का संसार जैसे रुक गया है, न पेड़ पौधे बढ़ रहें हैं, न सूख रहें हैं, फूल भी कोई नया नहीं आ रहा, कचनार इन दिनों खिले हैं, सुबह आते जाते देखता हूँ, कुछ पल कभी कभी ठहर जाता हूँ, पारिजात ( हारश्रिंगार ) अब भी मुझे लुभाते हैं, बचपन में मैं फूलों के प्रति जितना लालायित रहता था, वो धीरे धीरे कम हो गया था, बीते कुछ सालों में फिर बढ़ा है, जीवन में अब बचा ही क्या है, किताबों फूलों दवा के पर्चों के बीच जीवन भटकता हुआ भूत हो गया है जिसे कहीं सुकून नहीं है कहीं कोई एक ग्लास पानी पूछने वाला नहीं कहीं कोई नहीं जिसे कह दूं तो मेरे पास चला आए, हर तरफ बस सवाल हैं जिनका जवाब देने पर भाव मर जाते हैं।
आज देर तक प्रेम पर भावुक हुआ बैठा रहा। अपनी ही नगरी जाने का टिकट देख रहा था और बस देखे जा रहा था आसूं बहे जा रहे थे। उस विषय में मैं कुछ कहना नहीं चाहता मगर मैं भीतर तक भीग गया हूँ।
दिन भर बस पड़ा रहा, पढ़ने का प्रयास किया पर पढ़ नहीं सका, पापा से बतियाता रहा, मां से, बच्ची से आज दिनों बाद बात हुई । दीदी लोग ठीक हैं, इन दिनों मैं महादेव का नाम जपता रहता हूँ कि आने वाले को सुगम राह देना और आने वाले को लाने वाली मेरी बहन को स्वस्थ रखना।
यह सब निपटे तो मैं सब बन्द करके कहीं जाऊंगा और कम से कम महीने से भर नहीं लौटूँगा। भाड़ में जाये एग्जाम पेपर तैयारी नौकरी
एक उपन्यास की पटकथा चल रही है, जाने इस बार लिख पाउँगा या पहले की ही तरह भूल जाऊँगा। भूलने का एक लंबा संस्मरण रहा है जीवन में
❤️
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