मैं फुरसतिया आदमी हूँ, मैं इतना फुरसतिया हूँ मैं सबको याद करता रहता हूँ, और सब इतने व्यस्त हैं कि उन्हें फुरसत ही नहीं मिलती। मैं एक दिन अपनी तमाम फुरसत को मौत के हाथ बेंच दूँगा जो हमेशा व्यस्त रहती है।
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मन कहाँ है यह तो मन भी नहीं जानता, हां इतना जरूर जानता हूँ कि जहाँ कहीं भी 'लेकिन' है वहाँ मन नहीं है।
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दिन भर बस दिन बीतने के इंतज़ार करता रहा। कुछ पढ़ा, ज्यादा सोचा, व्यस्तता के विषय में सोचता रहा।
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चिंघाड़े मार कर रोने का मन होता है, क्यूँ होता है पता नहीं, कोई दुःख नहीं, कोई उम्मीद नहीं है, न किसी से कुछ चाहिए, बस ऊब गया हूँ। किससे ऊब गया हूँ यह भी नहीं पता है।
मन नहीं कर रहा है कुछ लिखने का !
― 24 oct 2025
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