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जाने किस चीज की कमी है अभी



लिख देने से न तनिक भर कुछ घटता है न बढ़ता है, शायद बढ़ता है। क्योंकि और भारीपन लगता है, देर तक लगता रहता है अपना ही सिर अपने कंधे पर उठाए घूम रहा हूँ। ज्यादातर तो यही लगता है कि सिर का बोझ शरीर के बोझ से ज्यादा है। 

बीते दिन फिर न लौटने वाले दिन बनें यही कामना है। जहालत, मलामत, उदासी, आँसू, गरीबी, दबाव, अकेलापन, इन सबसे ऊपर फेलियर का टैग लिए चलता रहा और सबसे हँसते हुए मिलता रहा, कहीं किसी की दवा घटी है कहीं कोई टेस्ट करवा रहा है, कहीं कोई सब होते हुए भी नहीं खा रहा, कहीं कोई दिन भर में चार बार इस बात पर रो रहा है कि कोई है ही नहीं, मैं सब तरफ दौड़ता हूँ, और हर जगह अकेला हो जाता हूँ। सब तरफ शिकायत है, सब तरफ कोई न कोई चाहता है मैं वहाँ भी पहुँच जाऊँ, मैं कितना फैलाऊं अपने दो हाथ दो पाँव की सब जगह पहुँच जाऊँ ? मैं इन सभी में से किसी जगह नहीं रहना चाहता, मैं जहाँ रहना चाहता हूं, वहाँ दूर तक निर्जन है, मेरे कहे की ध्वनि है प्रतिक्रिया कोई नहीं। 

आज दिन भर में इतना बोला हूँ कि अब माथा सनसना रहा है। सिर दर्द से फटा जा रहा है, कमर अजीब सी ऐंठ रही है, कुछ खाने का मन नहीं हुआ। शहर लौटने पर जाने क्यूँ बहुत अजीब लगता है , इस शहर में सब बेकार लगता है अगर ... 

गाँव में भी न मैं इतनी बातचीत करता हूँ, न ही पापा मम्मी से ही बहुत बोलता हूं , वो बोलते बतियाते हैं मैं बस हामी भरता हूँ, फिर भी यहाँ चले आने पर लगता है सब काट रहा है। 

शाम से यूँ ही बिस्तर पर उलट पुलट रहा हूँ , दीपावली पर इस बार अपने लिए एक किताब आर्डर की थी, यह सोचकर कि यह मेरा अपने आप को तोहफा होगा, फ़ैज़ के खत हैं, वहीं पढ़ रहा हूँ, रफ़्ता रफ़्ता अपने भीतर उतरता जा रहा हूँ। 

बात करने को कुछ नहीं है मेरे पास फिर भी सबको फोन कर दे रहा हूँ... 
कभी कभी सोचता हूँ तो लगता है सब धीरे धीरे मुझे देख सुन कर उब जाएंगे और मैं फोन करता रहूंगा, कोई उठाएगा नहीं, मैं पुकारता रहूँगा और अनसुना हुआ रहूँगा। आदमी का जीवन कितना अजीब है न वह अपने आने पर हुआ उत्सव देख पाता है न जाने पर हुआ मातम, फिर भी वह लड़ता रहता है, दौड़ता रहता है। 

मैं पागल हूँ...मेरे मन में अजीब अजीब बातें चल रहीं हैं जिसे इस वक्त किसी से कह देने का मतलब है मुझे स्वार्थी या जलनखोर समझा जाएगा या कोई ऐसा जो अपने बारे में सोचता हूँ, या अतिप्रैक्टिकल जैसा कोई..

बीते दिन एक मित्र की आवाज महीनों बाद सुनी भीतर कुछ देर तक कांपता रहा। मैं जाने क्यों किस बात से नाराज़ हुआ हूँ या क्या बात बुरी लगी ये भुल जाता हूँ, फिर सोचता हूँ मैं कितना बेवकूफ हूँ, जब सिद्ध करने की बात आती है तो मैं भीतर से नरम हो जाता हूँ, मुझे लगता है छोड़ो कौन जवाब दे, 

मन कितना मकड़जाल में रहता है न ! हद है , धत्त.. सो जाओ भाई 

― 22 oct 2025

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