दिन भर बस पड़ा रहा, इस करवट से उस करवट, आँखे सूज आईं थीं जाने क्यूँ, भीतर लगातार घबराहट होती रही है कल से ही, वो रुकने का नाम नहीं ले रही है। मैं बिस्तर जमीन कोना कुर्सी सब छान चुका हूं यह कहीं शांत नहीं हो रही है। ऐसा कुछ सोच भी नहीं रहा हूँ। ऐसा कुछ क्या कुछ भी सोच नहीं रहा हूँ, न किसी बात से परेशान हूँ, न कोई इच्छा या उम्मीद है। बस एक उब है। जाने किस चीज की लेकिन है। मैं फोन फेंक देना चाहता हूँ। मुझे किसी से बात करने का मन नहीं करता। किसी मतलब किसी से नहीं..
दिन भर में चार बार कपड़े बदले, कुछ किताबें उठाई रखीं, कई भजन कीर्तन सुने, कुछ ग़ज़लें भी.. जाने क्यूँ संगीत में खासकर शास्त्रीय संगीत में मुझे अद्भुत शांति मिलती है। देर तक राग रामकली सुनता रहा और बिस्तर पर पड़ा रहा। शाम एक फोन से उठा। आज दिन भर में किसी का फोन नहीं उठाया, बोलने का मन नहीं कर रहा था। सोच रहा हूँ सप्ताह में एक दिन मौन व्रत रखना शुरू करूँ।
हम सब एक टूल हैं, जिसे हर दूसरा अपनी जरूरत अनुसार उपयोग में लेता है और फिर टूल बॉक्स में रख देता है। इस वाक्य का अर्थ क्या है मैं खुद नहीं जानता लेकिन लिख दिया क्योंकि चल रहा था।
*********
रोने का प्रयास करके नहीं रोया जा सकता है, रुलाई आ भी गई तो रोने के बाद जो खालीपन पैदा होता है उसे प्राप्त नहीं किया जा सकता। ऐसे ही हँसने, दुःखी होने , खुशहाल होने, प्रेम करने , घृणा करने, या क्रांतिकारी होने का प्रयास करके नहीं हुआ / किया जा सकता है, यह स्वतः स्फूर्त प्रक्रिया है। इस पर जोर देने या प्रयास करने से यह सिर्फ विकृत होती।
********
रास्ते हमेशा हमारे पास और हमारी दृष्टि में होते हैं हम चुनते नहीं है उन्हें और कहते हैं 'क्या कर सकते हैं '
― 17 अक्टूबर 2025
👏🏻
जवाब देंहटाएं