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अब यही रोज़गार है अपना

मैं बहुत खुशमिज़ाज किस्म का व्यक्ति नहीं हूँ। न ऐसा है कि मैं गंभीरता ओढ़े रहता हूँ। शांति ही मेरी प्रकृति है, मुझे तेज बोलना, तेज हँसना, बेवजह किसी को छूते रहना नहीं पसंद, ही हा हू भी मुझसे नहीं होता, मैं अपनी उपस्थिति में अनुपस्थित सा रहता हूँ, मुझे हर कहीं शामिल होने की भूख नहीं है। इन दिनों लोगों में जो एक स्वभाव पैदा हो गया है हर आदमी को पकड़कर फ़ोटो लेने लगना, बेवजह हर किसी को स्पर्श करते रहना, अनायास की बातों में झूठी हँसी खोज लेना, ये सब करते लोग मुझे निरे मूर्ख लगते हैं, मैं शामिल तभी होता हूँ जब कोई शामिल करे। बहुत संभावना है कि मैं प्रथम द्रष्टया पीड़ित या दुःखी सा कुछ अजीब लगूँ पर ऐसा है नहीं, मेरी नसों में बड़ी शीतलता है। मैं भीतर ही भीतर इन तमाम तरह की औपचारिकताओं में लहालोट लोगों को देखकर हँस लेता हूँ, मैं बोलने से अधिक करने वाले को बेहतर मानता हूँ, करता भी यही हूँ। यह सब क्यूँ लिख रहा हूँ पता नहीं। 

चित्त में तरह तरह के विचार आते जाते रहते हैं। उनके आने जाने से थका रहता हूँ। जब आप कोई इच्छा पाल लें और आपको लगे यह तो होगा ही जब वह नहीं होता तो त्वरित तो भले आप मैनेज कर लें बाद देर तक चुप्पी घेरे रहती है, न कहते बनता है कि बुरा लगा न अच्छा महसूस होता है। क्योंकि किसी ने खुद तो हमें कहा नहीं था ये इच्छा भर लो, उससे कहना भी अनुचित ही है। अकेले की उम्मीद, अकेले की इच्छा पर अकेले ही विलाप भी करना होता है। कर रहा हूँ।

मैं सपने बहुत देखता हूँ। उनमें से ज्यादातर तो भूल जाता हूँ। जो कुछ याद रह जाता है वो जीवन में नए ढंग से शामिल हो जाता है। आज रात मैं जाने कौन सा सपना देख रहा था जब नींद खुली तो मैं कुछ बोल रहा था, यह ऐसे इसलिए कह रहा हूँ क्योंकि मैं जागा ही अपनी आवाज़ से। 

दिन भर क्या किया हूँ इसका कोई ठीक उत्तर मेरे पास नहीं है। इलाहाबाद को याद करता रहा। मन में तरह तरह के सुख दुख के दृश्य उतर आए, भीतर एक अजीबोगरीब सी क्रेविंग होती है। 

साथ का सुख जान लेने के बाद अकेले रहना सबसे भारी काम है। 


कभी कभी सोचता हूँ देह होनी ही नहीं चाहिए थी। होती भी तो कोई बेडौल आकृति होती, जिसके लिए आसक्ति नहीं होती। दिल, दिमाग, मन सबको सुख देने के तमाम साधन है, देह को आज भी सुख देह ही दे पाती है। हम इतने पिछड़े क्यूँ हैं ?

एक महक की याद आती रही, मैं ओढ़ने वाला चद्दर देर तक मुँह पर डाले पड़ा रहा, सोचता हूँ यह सचमुच वह देह होती तो.. 

क्या हम कभी अपने साथी / प्रेमी से यह कह पाएंगे कि .... 

आज शाम देर तक नदी के किनारे बैठा रहा, मैं अकेले बैठा लोगों को देखता रहता हूँ, हँसते बोलते आते जाते लोग, परेशान लोग, खुशी लोग, उदासीन लोग , प्रेमी लोग, चोर लोग , छिनार लोग, तरह तरह के लोग। 

जाने क्यूँ मन हुआ मंडी में टहलते हैं, गाड़ी एक कोने खड़ी करके मैं आज मंडी की एक एक दुकान पर गया न कुछ पूछा,न कुछ लिया बस गया, मैं सबके चेहरे देख लेना चाहता था, सोचता हूँ जितनी दुकानें हैं इतने घर कहीं आबाद होंगे। बुजुर्गों को सब्जी फल लेते देखता हूँ, तो मैं अपने को बुजुर्ग की तरह देखने लगता हूँ। 

पापा आज याद से भरे हुए थे, दस मिनट तक लगातार बोलते रहे, कपड़े, स्कूटी, जीवन, घर की बात करते रहे, उन्होंने कहा आदमी की शान भरी जेब है, वो नहीं हो तो अपनी औलाद, पत्नी कोई इज्जत नहीं करता। और दुनिया का तो छोड़ दो। इसमें इतना कुछ सोचने के लिए था कि अभी तक मन में सब चले जा रहा है। 

कल जाने कैसा दिन होगा। मैं नहीं चाहता की दिन बस बीते मैं जीना चाहता हूं। 

ख़ैर.... 


16 oct 2025 

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