हर कोई समझा कर जा रहा है और मैं निरा मूर्ख कुछ नहीं समझ पा रहा हूँ। मेरी बुद्धि शायद घास चरने चली गई है, लेकिन घास भी तो इस सदी में मुश्किल चीज है तारकोल अधिक है और सहज भी। शायद वही चाटने गई है। यूँ भी मुँह सिलने से बेहतर है चिपक जाए, ऐसी ही किसी मूर्खता से.. मैं कभी कभी सोचता हूँ वो तमाम लोग जो सबके लिए बोलते परेशान होते रहते हैं क्यूँ नहीं पी लेते हैं एक ग्लास फेविकोल, क्योंकि उनकी बुद्धि में यह तो घुसने से रहा कि उनकी बातों का कोई महत्व है। यह मैं अपने लिए भी सोचता हूँ। मुझे भी पी लेना चाहिए ..
रोज ब रोज मैं अपनी इस अस्थि चर्म वाली देह पर उम्मीद का लबादा लपेटे अपनी ही इच्छा के चरणों में दण्डवत करता हूँ और रोज कहता हूं अब कोई इच्छा नहीं, अब यह उम्मीद का लबादा भी उतार कर दूंगा फेंक या जला दूँगा वैसे जैसे जलाई जाती है देह प्राण उड़ जाने के बाद, लेकिन अगले ही क्षण नया और पुराने लबादे से बेहतर खोजने निकल पड़ता है हूँ। मेरा घर ऐसे अनगिन लबादों से भरा हुआ है लेकिन फिर भी जब जब मैं देखता हूँ कोई नया लबादा मन होता है यह भी तो होना ही चाहिए। इच्छा कोने में खड़ी मुस्कुराती रहती है वो जानती है अनन्तः हर उम्मीद टूटनी है, हर लबादा मेरे ही हिस्से आना है। कभी कभी तो वो बहुत जोर से हँसती है, मैंने उसकी हँसी सुनी है। अभी भी वो हँस रही है। मुझे तेज आवाज़ पसंद नहीं.. फिर भी वो तेज तेज से हँस रही है..
इन दिनों जिंदगी थोड़ी थोड़ी पटरी पर आ रही है। आ रही है , आई नहीं है और संभावना तो यही है कि आएगी नहीं क्यों की आगे हर तरफ ब्रेकर ही ब्रेकर हैं।
हर नया दिन नए तरह की चुनौती के साथ आता है, मैं हर रोज बस इस कूड़े का बालू उस कूड़े और उस कूड़े का बालू इस कूड़े करता हूँ, बहुत कुछ सोचता हूँ तो कुछ कुछ कर पाता हूँ। आज पापा समझा रहे थे और मैं बस सुन रहा था उनका कहना गलत नहीं है लेकिन मैं चीजों को इतना हल्के में लेने का आदी नहीं हूं.. मैं कुछ भी तत्काल पकड़ता नहीं और तत्काल छोड़ता नहीं, हां अगर छोड़ देता हूँ तो पलटता नहीं।
आज दोपहर मैं यूँ ही पेट्रोल पंप तक गया था, लौटते हुए मेरे बगल से एक स्त्री पुरूष गुजरे, पुरूष घर वाले वेशभूषा में था और स्त्री कुछ तैयार थी पुरूष उसे जिस तरह की क्रूरता भरे चेहरे के साथ बाएं हाथ से मार रहा है चलती बाइक पर की मन खीझ और गुस्से से भर गया था, जाने किस आदमी के वीर्य का नाजायज हिस्सा रहा होगा वो आदमी..
आज दिन बहुत अजीब सा बीता, जाने किस बात पर बार बार गुस्सा आती रही, ऐसे ही गुस्सा मुझे दिन पहले भी आई थी जब हरियाणा का पेपर था। लोग इतने गैर जिम्मेदार हैं कि मुझसे बर्दाश्त नहीं होता। आदमी आनंद के नाम पर मूर्खता पूर्ण कृत्य करता है। और फिर अनहोनी होने पर बस हो हो करता रहता है.. इस दुनिया में कुत्तों से ज्यादा कुत्ते हैं, जिनके दो हाथ पाँव हैं, चार वालों से ज्यादा वही खतरनाक हैं।
इन दिनों ऐसी ऐसी घटनाएं सुनने को आती हैं कि कलेजा काँप जाता है। चोरी की घटना और सूचना जैसे रोज की बात हो गई है। राम जाने क्या लिखा इस समय की नियति में..
― 11 अक्टूबर 2025
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