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सच की नमी पर समझ की गर्माहट असर नहीं करती


आखिरी बार सम्भवतः 27 अगस्त को डायरी उठाई थी, तबसे सब भुला हुआ था। मैं अब लिखने से कतराने लगा हूँ, विचार आते हैं लेकिन एक अजीब किस्म का आलस्य घेरे रहता है, जाने क्यूँ अब मुझे डर लगता है अपने लिखे से। आज जो कुछ लिखता हूँ, या सोचकर जहाँ तक पहुँचा होता हूँ, तत्काल नहीं भी पता चले पर जब पता चलता है तो सब वैसे ही हुआ रहता है जैसे सोचा होता है, मैं बातों की परत समझ लेता हूँ। फिर मुझे छिपाई या न बताई गई बातों को पचाने में वक़्त लगता है। 

खैर..

दिन ठीक-ठाक बीता, कई दिनों बाद आज घण्टों किताबों के साथ बैठा, कुछ काम पूरे हुए, कुछ नए काम बनाए गए। किसी ने कुछ कहा भी नहीं जो चुभे, फिर भी शाम होते होते एक भारीपन उतर आया। यह भारीपन कहाँ से मेरे जहन में तारी होता है मैं समझ ही नहीं पाता। जैसे भीतर कहीं कुछ बुझता जा रहा है। पहले भी ऐसा ही था। अब और अधिक हो गया है। किताब खरीदकर, फूल देखकर, कोई गीत, ग़ज़ल, कविता पढ़ सुनकर वाह करने वाला मैं, अब चुप सा हो गया हूँ, कुछ भी भीतर उत्साह नहीं भरता, लगता है कंधो पर कोई बोझ है जो लगातार बढ़ता जा रहा है। अब कुछ भी करता हूँ पर भीतर कुछ नया किस्म का भाव नहीं पैदा होता जैसे मन का दरवाजा बंद हो और दरवाजे पर लगे ताले की चाभी खो गई हो। मन में वैसी कोई लहर नहीं उठती जैसे पहले उठती थी। बस सुनता हूँ, समझता हूँ, और आगे बढ़ जाता हूँ या शायद नहीं बढ़ पाता। 

मन निष्प्रभावी हो गया है। जैसे किसी लंबे अभिनय के बाद पर्दा गिर गया हो और दर्शक थककर उठ चुके हों, कोई अजनबी ऊब सी घेरे रहती है।

रिश्तों में भी कुछ वैसा नहीं दिखता जैसा पहले दिखता था। पहले कैसे दिखता था पता नहीं ? शायद मैं तब इस तरह देख नहीं पाता था, तो सब सुंदर लगता था। कभी-कभी लगता है, हर व्यक्ति अपने संवाद याद करके बोल रहा है, कोई कुछ भी स्वाभाविक नहीं कह रहा। हर बात में एक प्रदर्शन है। जिसे वह अपने को महत्वपूर्ण साबित करने के लिए कर रहा है/ कह रहा है।  

अभी बैठे बैठे सोच रहा हूँ कि यह सब मैं पहले क्यों नहीं देख पाता था? शायद तब देखने की आँखें नहीं थीं।

अब जब देखने की आदत पड़ी है, तो देखने का आनंद खो गया है। कभी सोचता हूँ, शायद समस्या मेरे भीतर ही है। कोई विशेष कष्ट नहीं, फिर भी दु:ख है, कमी भी नहीं, फिर भी शून्यता है। जैसे जीवन अब बस तर्क से संचालित हो रहा हो, अनुभूति से नहीं। अनुभूति ? क्या ऐसी कोई चीज़ बची हुई है ?

मुझे डर लगता है इस स्थिति से..  मुझे पता है यह कोई सामान्य ऊब नहीं है, यह मन के समुद्र का गहरा हिस्सा है जहाँ पहुँचकर आवाज़ भी डूब जाती है। स्वदेश दीपक ऐसी ही ऊब के समुद्र में डूबे थे जो आजतक न लौट सके। 

कभी-कभी लगता है, अब कुछ भी असली नहीं बचा।हर चेहरा जैसे किसी और चेहरे की नक़ल कर रहा है।हर शब्द किसी और शब्द का पुनरावर्तन है मैं खुद को बोलते हुए सुनता हूँ तो लगता है यह मैं नहीं हूँ, यह कोई और है जो मेरे रूप में अपना किरदार निभा रहा है। किसी-किसी रात कमरे में रखे हथेली भर के आईने में देखता हूँ तो चेहरा पहचान में आता है, पर आँखों में अजनबीपन दिखता है। अब मैं झूठा हो गया हूँ। 

मुझे लगता है अब चीज़ें सुंदर नहीं रहीं, क्योंकि मैंने उन्हें समझ लिया है। पहले जब फूल देखता था तो बस रंग दिखता था, अब उसमें क्षणभंगुरता दिखती है।पहले संगीत सुनता था तो स्वर लगता था, अब उसके पीछे की थकान सुनाई देती है। पहले प्रेम को प्रेम समझता था, अब देखता हूँ उसमें भी भय, असुरक्षा, स्वार्थ, और हिस्से की बातें हैं, प्रेम में भी परतें हैं। अपनी जान निकाल देने वाला भी खून से जुड़ा न हो तो एक रेखा बनी ही रहती है। और यह सब देखकर भीतर एक मौन फैलता है लंबा, ठंडा, लेकिन बहुत सच्चा मौन।

क्या जीवन की यह समझ ही दुख का कारण है?क्या हम जितना अधिक जानते जाते हैं, उतने ही कम जीवित रहते हैं ? मुझे लगता है, बचपन का सुख इसी अनजानपन में था, तब मुझे लगता था मैं 6 भाई हूँ कहीं कोई दिक्कत हुई सब खड़े होंगे, मेरे पास ख़ूब जमीन है, हर शहर में घर है, कई गाड़ियां हैं, हर पद पर कोई न कोई अपना बैठा है, पर धीरे धीरे जान पाया कि नहीं मैं अकेला हूँ, सबकी अपनी व्यस्तता है, परिवार लोग अपने माँ बाप बहन तक को ही समझते हैं, जमीन उतनी ही है जितनी पिता के नाम है और जिम्मेदारी में या मजबूरी में मेरे पास कोई खड़ा नहीं है, धन का भी एक अलग खेल समझ में आने लगा है। जिसके पास है। उसके लिए दुनिया के सारे दोष माफ हैं। उसकी गाली भी सुंदर लगती है, उसकी अशिष्टता भी आकर्षक है और जिसके पास नहीं, उसका प्रेम भी असहज लगता है। उसकी सच्चाई तकलीफ़ देती है, उसका अपनापन बोझ लगता है। शायद दोस्तोयेव्स्की ने कहा था कि धन ने मनुष्य को नहीं बनाया, मनुष्य ने धन को ऐसा बना दिया कि अब वह उसका देवता बन गया है। लगता है अब सब उसी देवता के भक्त हैं। दरअसल देर से समझ आया कि यह न जानना कि कौन अभिनय कर रहा है, यह न समझना कि सब अस्थायी है यही खुशी का कारण है, जानना केवल खोना है। 

मैं कभी-कभी सोचता हूँ, क्या यह सब थकान है या जीवन की वास्तविकता से पहला साक्षात्कार। शायद पहले जो सुख था, वह भी भ्रम था बस वह भ्रम सुहावना था। अब जो बचा है, वह सच है, पर यह सच बहुत सूखा है। यह जान लेना कि सब कुछ अंततः खोखला है, अपने आप में एक भारी अनुभव है।

अजीब यह है कि यह खालीपन भी पूरी तरह बुरा नहीं लगता है। इसमें कुछ शांत सा लगता है, कुछ साफ़ सा जैसे कोई भारी कोलाहल थम गया हो। अब जो बचा है, वह सिर्फ़ मौन है, पर इस मौन में कुछ गहराई है। शायद यही समझ है। स्वीकार ही समझ है शायद। खुशी नहीं है, पर व्यक्तित्व में पारदर्शिता का हल्कापन है। जैसे जीवन अब किसी बाहरी उत्तेजना से नहीं, किसी भीतरी स्वीकृति से चल रहा है। जैसे बारिश के बाद मिट्टी अपनी गंध को स्वीकार लेती है, वैसे ही यह मन भी एक दिन अपने खालीपन को स्वीकार लेगा। और तब शायद फिर कोई छोटी-सी बात भी भीतर को छू जाएगी बिना कारण, बिना अपेक्षा।

महीने हो गए, सोचा था अब रोऊंगा नहीं, दरअसल एक बात से दुःखी होकर सोचा था जब घर में यह स्पेस नहीं कि आपके आँसू का सम्मान हो तो क्यूँ ही सच्चा होना कहीं पर, इन दिनों ऐसे मन हुआ, ऐसी बातें हुई कि आँसू आते जाते रहे, इन दिनों मौसम ही तरह मन भी है। कभी तेज बारिश कभी तेज धूप 

किसी ने सच ही कहा है – अक्टूबर उदासियों का मौसम है। 

मुझे तो सितम्बर भी वैसा ही लगता है। 

― 10 अक्टूबर 2025 / शाम 7 बजे 

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