दिन भर में यह सब चलता रहा। मैं मन ही मन अपने मारे गए मन के विषय में सोचता रहा, उन तमाम बातों पर आँसू बहाता रहा जो बहुत मन होने के बाद भी सबका मन सोचकर नहीं किया। कितनी संभावना थी जो शून्य हो गईं। कितना जीवन था जो जीवन भर ताने झेलने के डर से जिया ही नहीं, जबकि पता ही नहीं की कब जीवन का आखिरी दिन हो..
सोचो अगर यह इस कलम से निकली आखिरी स्याही होती, सोचो यह आखिरी पन्ना होता जिसपर मैं लिख रहा हूँ, सोचो कल कोई खबर दे..आशुतोष नाम का एक आदमी था, लिखता था, पारिवारिक आदमी था, जीवन की मार झेल रहा था, सपने देख रहा था, पर अब जीवन की मार कसकर पड़ गयी..चला गया। तो हद से हद क्या होगा.. दो चार दिन का रोना, हर आदमी के पास अपने विकल्प हैं, वो उन विकल्पों के साथ जीवन खोज लेगा। किसी के न होने से जीवन थोड़ी न रुकेगा किसी का। माँ पिताजी, पत्नी , बहने, इनके अलावा कौन है आपके लिए सोचने इंतज़ार करने वाला..लेकिन फिर भी हम दिखावे के डर से खुद को मारे जा रहे हैं।
ख़ैर.. यह सब भी बिल्कुल वैसा ही है जैसे श्मशान घाट जाने पर क्षण भर हो हमें जीवन बेकार लगता है, और अगले ही पल हम कहीं जाना है, कुछ देर हो रहा है, कहकर भाग लेते हैं। माया ने हमें यूँ लपेट रखा है जैसे कोई धूर्त वैश्या धनवान पुरूष को अपने देह जाल में लपेटे रहती है।
बस अब ज्यादा बोल रहा हूँ मैं शायद। शायद क्या सच ही। इसे यही छोड़ते हैं।
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पिछले कई वर्षों से लगातार सोच रहा हूँ कहीं घूमने जाऊँ। पर जब जब मन बनाता हूँ या जेब साथ नहीं देती या घर के काम। अब बहुत हुआ। यह जून बीते बस। मैं निकलूँगा कहीं..नदी और पहाड़ के आसपास पैदल। जून के बाद कहीं कोई नौकरी मिली तो जॉइन कर लूँगा। थोड़ी परेशानी सही पर आगे जीवन की कुछ राह तो खुलेगी यहाँ तो रह तरफ से दरवाजे बंद हैं। अब मुझे अपना घर चाहिए।
सोचते विचारते हुए मैं समझ पाया कि हमारे दुःखों का मूल कारण हमारे भीतर की बने रहने, हर जगह ,हर तरह से स्वीकार्य होने की इच्छा है। हम न जाने क्यूँ आलू बन जाने पर आमादा हैं...
दिन में थोड़ी बहुत पढ़ाई हुई। सालों बाद कमार्स के कुछ नोट्स और क्लास देखे, लग रहा था दूसरी दुनिया की चीज है। चीजें छूट जाएं तो ऐसा ही होता है, बहुत दिनों तक किसी करीबी से संवाद न हो तो वो भी दूर का हो जाता है।
और सब ठीक है। घाव धीरे धीरे भर रहा है।
― 30 मई 2025 / शाम 8 बजे
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