मन बड़ा व्यसनी है। मन धूर्त है। मन बहानेबाज है। मन सहारा ख़ोजता है। मन बिल्कुल उस आदमी की तरह है जो बैठते ही आधा लेट जाने का प्रयास करता है। यह सब वाक्य मेरे नहीं हैं मेरे पिताजी के हैं। परसों की रात फोन करके रोने लगे। उन्हें मेरी याद आ रही थी। जैसे जैसे उनकी उम्र बढ़ रही है ( यह लिखते हुए मुझे इतना डर लग रहा है कि मेरी आँख भरी हुई है। बाईँ आँख ) वो और भावुक होते जा रहे हैं। मैं उनका सेम टू सेम कॉपी हूँ। लगभग वही स्वभाव है बस वो ज्यादा कामकाजी और दृढ़निश्चयी आदमी हैं, मैं नहीं, मैं आलसी हूँ। मैंने बिना बताए बस पकड़ा और उनके सामने खड़ा हो गया अगले कुछ घण्टे बाद, मुझे देखते ही भईया बोलकर सीने से कस लिया और रोने लगे, पूछ रहें हैं उसे क्यूँ नहीं लाए, मैंने कारण बताया, बैठे, मुझे ऐसे दुलारते रहे जैसे गाय अपने नवजात बच्चे को दुलारती हैं, मैंने फोन किया और पकड़ा दिया, पापा मुश्किल से दो शब्द बोले होंगे और फिर रो पड़े, उनकी आँखों में ऐसे आसूँ मैंने बाबा के मरने पर देखा था। जब वो दालान वाले कमरे के दरवाजे का एक पल्ला पकड़ कर बस फफक फफक कर रो रहे थे। आदित्य की मृत्यु पर तो जैसे पत्थर हो गए थे, महीने भर बाद एक दिन बाहर बैठे बैठे रोने लगे थे, दादी की मृत्यु पर भी... मैं उन्हें देखकर रोने लगा तो वो चुप हो गए, पुरुषों में यह अजीब ताकत होती है वो अपने प्रिय को कष्ट में देखकर अपना कष्ट भूल जाते हैं। थोड़ी देर में एकदम सामान्य हो गए, मेरे पहने कपड़ों की बुराई करने लगे, कि जबसे तुम खुद कपड़ा लेने लगे अच्छा नहीं लेते, बुजुर्गों जैसे रंग पहने हो, बढियां शुद्ध कॉटन पहना करो, पहनने और खाने में जितना अच्छा हो सके रहो, चलो कपड़ा खरीद देते हैं, हम मना किये की पापा है अभी, फिर कहे अच्छा चलो उसके लिए ले लो, फिर कहे नहीं, आएगी बिटिया मेरी तो साथ चलेंगे लेने..
बीते दिन उन्हीं के साथ रहा। उन्हें अभी भी लगता है मैंने हिंदी लेकर ठीक नहीं किया। लिखना मेरी जिंदगी की अस्थिरता का सबसे बड़ा कारण था। कह रहे थे तुम लोगों का उपकार करने में लगे रहे, जो जो तुम्हारे साथ रहे सब सेट हो गए तुम रह गए, तुम सबके बाप बन जाते हो, तुम जितने अच्छे थे पढ़ने में तुम्हारी सिटिंग कैप्सिटी पर मुझे घमंड होता था, पर सब बेकार कर लिया। आज कुछ कर रहे होते तो तुम्हारी शादी करता, मैं इस नौकरी से इस्तीफा देता सुकून से घर रहता परिवार के साथ.. 9वीं से बाहर बाहर ज़िंदगी बीत गयी, कभी गत्ते ढोते, दवा बेचते कभी कुछ करते, नौकरी भी वो लगी जो मैं कभी करना नहीं चाहता था। फिर चुप हो गए.. थोड़ी देर चुप रहकर बोले ठीक है सब, परेशान न हो, जो मन करे तुम लोग करो, मैं हूँ न, बस ख़ुश रहो।
मैं उनसे ऑपरेशन सिंदूर के बारे में बात करने लगा। उनकी बात से मुझे लगा वो बिल्कुल बुराई सुनने के मूड में नहीं हैं। उनके लिए बीजेपी ही एकमात्र पार्टी है जो ऐसा कर सकती है, मैंने कई उदाहरण दिए, कुछ बातें बताई तो अनन्तः माने तो बोले, हैं तो सब साले कुर्सी के भूखे खुद ही करवा दिए होंगे इनके लिए क्या अर्थ है ज़िंदगी का, फिर आ गए कि दलाल तो वो लोग भी थे जो बच गए जब आप किसी की इच्छा के विरुद्ध कुछ कर रहे हैं और आप उस आदमी के लिए बुरे न बनकर खास बनते जा रहे हैं, वो कैसे ? देश की आज़ादी के प्रयास में इतने लोग मरे, निर्दोष भी, यही कुछ लोग क्यूँ बचे रह गए ? युद्ध में विरोधी दल के वही सैनिक बचते हैं जो या तो समर्पण कर दें या मुखबिरी के लिए तैयार हों ? मैं कुछ नहीं बोला, मुझे पता है ऐसे तर्कों पर लम्बी बहस हो सकती है , मैं इतना बतकही करने वाला आदमी नहीं।
मैंने उनसे नक्सल आंदोलन के विषय में भी पूछा वहाँ उनकी राय बिल्कुल ठीक थी, उन्होंने कहा जो वर्ग अपने हक के लिए खड़ा हो जाता है वो व्यापार और राजनीति के लिए नक्सली हो जाता है, नक्सली के नाम पर आदिवासियों को खत्म कर जंगल कब्जाए जा रहे हैं, अंबानी के बेटे इतना बड़ा जू खोल लेते हैं कैसे, और यहाँ हम एक कुत्ता पाल ले तो नगर निगम में ब्यौरा देना पड़ता है।
पिता बनने की उम्र में आकर हमें पिता की वो बातें भी समझ आने लगती हैं जो हमें सबसे बेकार लगती रहीं थीं।
शाम फिर मैं चलने के लिए हुआ तो पापा बोले चलो बताशा ( पानी पूरी ) खा लेते हैं। हम बोले नुकसान करेगा, तो कहे नुकसान तो साँस लेने पर भी कर रहा है क्या करूँ और चल पड़े, खाए, दरअसल पापा हमारे थोड़ा मसालेदार खाने के शौकीन हैं, यह शायद आधी उम्र अकेले बनाते खाते रहने की वजह से है, बीमारी की वजह से बहुत कुछ छूट गया लेकिन अभी भी वो मन जब कर जाता है तो सब दरकिनार कर देते हैं।
अमीनाबाद में घूमकर मम्मी और दीदी के लिए सूती साड़ी लिए तब उनको सुकून मिला। हर रविवार की शाम अमीनाबाद घूमना और जबरन कुछ न कुछ लेना उनका शौक है।
लौटते हुए जिस रास्ते से लौटा वह मेरे लिए विशेष रास्ता है। थोड़ा याद थोड़े आँसू भरे बैठा रहा, ट्रेन धड़ धड़ धड़ धड़ चलती रही, मैं एक किताब आते जाते में पढ़ा गिरीश कर्नाड का जीवन संस्मरण। इतनी अद्भुत किताब की मन अजीब हो गया। जीवन का इतना अलग अलग बिम्ब की क्या बताएं उनके मां और बड़े भाई भालचंद्र से जुड़ी बातों से मन हिल गया। जातीय और नस्लीय भेदभाव, एक स्त्री का अकेले खड़े हो जाना, बच्चों की परवरिश के जुड़ी तमाम मार्मिक बातें.. इसे हर माता पिता बच्चे और बनने वाले माता पिता सबको पढ़नी चाहिए। अनुदित पुस्तक है पर गजब लय है। 'यह जीवन खेल में' यही नाम है किताब है।
जनरल डब्बा था तो सीट से ज्यादा लोग भरे थे, गर्मी इतनी की कुछ कहो नहीं, कहीं कोई बच्चा लगभग आधे घण्टे से रोये जा रहा था, सामने ही दो नई उम्र के लड़के बैठे थे उनकी बात और हरकत से मन क्रोध से भर रहा था, मगर क्या ही कहें... स्टेशन पर उतरा तो पहले उल्टियां हुईं, थोड़ी देर वहीं बैठा रहा, फिर आया। रात देर तक मुझे नींद नहीं आई। अपने बीते बरसों को उलटता पलटता रहा। कहीं लगता पापा ठीक कह रहे थे तो कहीं लगता नहीं। मैं अपने को ही काटता रहा अपने को ही जोड़ता रहा। शायद सुबह नींद आई.. कभी कभी देह देह का साथ चाहती है, मगर..
ख़ैर ... सब ठीक है।
― 26 मई 2025 / सुबह 5 :40
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