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सोच की दुनिया कितनी छोटी होती है


सुख असंगत दिनों में न जीने की इच्छा को जीने की इच्छा में बनाए रखने के लिए खोजा गया एक छली शब्द है। हम जीवन की लगभग क्रियाओं को दोहराते हैं, हम एक बार में कुछ नहीं कर पाते हैं, हम जन्म लेने के बाद एक बार फिर जन्म लेते हैं जब हमें पता चलता है कि मरना भी कुछ होता है, हम एक बार हँसने के बाद दुबारा हँसते है एक बार उस क्षण पर फिर उस क्षण में हँसी गयी हँसी पर हँसते हैं। हम दो बार रोते हैं एक बार उस बात पर जिससे रोना आता है दोबारा अपने रोने पर रोते हैं।रोने पर रोना सामान्य रूप में रोने से ज्यादा घातक है। हृदयविदारक है। हम प्यार भी दो बार करते हैं, एक बार तब हम उस भाव को शब्द देते हैं जो किसी को देखकर हमारे भीतर उपजा था दुबारा तब जब हम भूल जाते हैं कि हमने क्या शब्द दिया था। और इंतज़ार.. कई बार करते हैं इंतजार..

एक बात कही जाती है .. ' काहे खून जला रहे हो ' ऐसी ही एक बात और है 'क्यूँ माथा फोड़ रहे हो अपना' ये दोनों बातें हमेशा अपने लिए नहीं दूसरे के लिए समझ आतीं हैं। हम अपने मामले में महसूस ही नहीं पाते कि हम क्या कर क्या रहें हैं हम माथा फोड़ रहें हैं या खून जला रहें हैं, हम करते हैं जो करना ठीक लगता है। लेकिन जरूरी नहीं है न जो करना ठीक लगता है वो ठीक हो ही ? जैसे हर बार हम एक अंजान गली से यह अंदाजते नहीं निकल सकते कि जिस तरफ सब जा रहे हों उसी तरफ चलते हैं। 

मैं रह रह कर खुद को नोचना चाहता हूँ, हिंसक तरीके से नहीं अहिंसक तरीके से। बिल्कुल वैसे ही जैसे जब वो कहती है और क्या खाना है आपको.. और मैं तुम्हें कहता हूँ तुम्हें खाना है। कुछ शब्द कितने हिंसक होते हैं न, कि हम उन्हें अहिंसक अर्थ में भी प्रयोग करें तो वो हिंसक सी ही ध्वनि देते हैं। 

हर शब्द अपना अर्थ क्यूँ खोता जा रहा है ? 

हमारी उपयोगिता क्या है ? 

पिताजी को चोट लग गयी है, मैं छटपटा के रह गया। यूँ लगता है जैसे सीने में कोई हज़ार चाकू गोंद कर चला गया। मैं इन लोगों को कितना समझाता रहता हूँ कि न किया करें इतना काम की देह की हिम्मत न बचे आगे चलने की मगर सुनता कौन है आदत से मजबूर हैं ? 

मैं यहाँ .. 

मैं ऊब गया हूँ सबसे। शायद सब मुझसे भी। इसीलिए अब किसी को फर्क नहीं पड़ता कि मैं क्या करता होंउँगा। दिन बीत जाता है कोई पूछने वाला नहीं कि.. खैर ! 

मैं अपने बोए हुए बबूल के कांटों पर भीष्म की भांति पड़ा हूँ। मेरी जिंदगी में कोई अर्जुन नहीं जो मेरी प्यास बुझा सके। मैं जीने को विवश हूँ।  


― 14 मई 2025 / दोपहर 3 : 30 बजे 

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