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संदेश

वही जिसे कम सोचता हूँ ।

वो सभी लोग जिनके कई चेहरे थे, मैं उन सबको अपने एक चेहरे से देखने का आदी था। वो हर बार मुझे मूर्ख करार करते और निकल जाते। ज्यादातर उनके हर वाक्य के बाद मेरे पास विस्मयादिबोधक चिन्ह लगाने के अतिरिक्त कोई विकल्प न बचता। उसके बाद मैं ख़ोजता रहता, काश कोई ऐसा वाक्य पकड़ में आता जिसके बाद मैं पूर्णविराम लगा पाता और अपने को कुछ और सोचने में प्रवृत्त कर पाउँ .. पर यह सम्भव ही नहीं हो पाता। मैं हमेशा पूर्णविराम की खोज में रहा पर मुझे हमेशा मिला विस्मयादिबोधक चिन्ह ! ******** क्या मैं हर जगह बस फेल होने के लिए बना हूँ ? दिलासे के अतिरिक्त कोई लॉजिकल जवाब है जिसके बाद मैं बस स्थिर हो उस जवाब को क्रियान्वित करने की तरफ बढ़ता और कुछ समय बाद जवाब देने वाले को कह पाता.. 'शुक्रिया आपके जवाब ने मुझे ढ़ेरों सवालों से बचा लिया' दरअसल है ही ऐसा एक सही उत्तर हज़ारों प्रश्नों से हमें बचा लेता है। जैसे अभी मैं जिस प्रश्न का उत्तर खोज रहा हूँ वह ठीक ठीक नहीं मिल रहा है। जिस भी क्षण मिल जाएगा कलम ठहर जाएगी।  ******** हर दो लोग के बीच एक तीसरा आदमी है। जो पहले आदमी की असुरक्षा का कारण है। पहले आदमी की सोच मे...

आभास का अभ्यास

अकेले रहना हज़ार साँपों के बीच रहने जैसा है। सब कुछ है पर लगता है कुछ भी नहीं है। जिन चीजों के लिए उत्साह से भरा रहता था उनसब चीजों से विकर्षण और उब होती है। गुस्सा आता रहता है। सुबह उठकर घूमना शुरू कर दिया है। सही से खा पी रहा हूँ। सो भी जाता हूँ। पढ़ना भी हो रहा है। कुछ आर्थिक जरूरतों के लिए काम भी लिया है कर रहा हूँ। पर भीतर अजीब सी स्थिति रहती है। कुछ लिख नहीं पा रहा। दिन दिन भर कोई ऐसी आवाज से पाला नहीं पड़ता जिसके लिए जीवन जीना चाहता हूँ। सब मेरे लिए खड़े हैं। फिर भी न जाने क्या है जो बस है । शायद रचनात्मक बेचैनी इसे ही कहते हों। अगर मुझ जैसे कीड़े से आदमी में इतनी उथपुथल है तो जो रोज आदमियों को बना रहा, मार रहा है, दिन दिन अपना क्षरण देख कर भी सब दिए जा रहा है वह कितना बेचैन रहता होगा। ईश्वर बेचैनी का दूसरा नाम तो नहीं है ? उनकी पत्नियाँ उन्हें कैसे सही करती होंगी। उन्हें तो लगता हो न यह सब उनकी किसी कमी की वजह से है। यह सामान्य है हम जिससे प्यार करते हैं उसकी हर मानसिक स्थिति का दोषी खुद ही को मानने लगते हैं। हम बार बार पूछते हैं तुम ठीक तो हो न ? भले ही वो कुछ न बोले पर उस शांति को...

घनी थी उलझन, बैरी अपना मन

कामनाओं की अति आदमी को आलसी कर देता है, वह एक ख़्याली दुनिया में रहने लगता है। वहाँ रहना घातक है। यूँ ही रचनात्मकता आदमी को मानसिक रूप से जितना चलायमान बनाता है, शारीरिक रूप से उससे कहीं अधिक आलसी बना देती है। मुझे जब जब घेरती हैं कामनाएं लिखता हूँ फाड़ देता हूँ। मैं इससे अधिक प्रतिरोध नहीं कर सकता अपने मन के प्रति। इच्छाओं को लिखकर फाड़ देना, खुद को थोड़ा थोड़ा फाड़ना है। यह भावनाएं नहीं है.. इच्छाएँ हैं। इच्छाएँ होंगी तो हम चाहेंगे उन्हें कोई या जिससे वह इच्छा है वह उसे पूरा करे। हम किसी पर हावी होंगे। या खुद बेचैन रहेंगे और जब खुद बेचैन रहेंगे तो खुद से जुड़े लोगों को सुकून कैसे देंगे भला। बेहतर है कम से कम इच्छाओं का प्रकटीकरण हो। उन्हें भीतर ही भीतर काटते छांटते रहिए। भावनाएं अति वैयक्तिक होती हैं। और बहुत निजी। यह जिसके लिए होतीं हैं उससे साफ सपाट कह देना चाहिए। यह बोझ नहीं बनता, न बनाता है। हाँ भावनाओं को कहना भर हो उसे थोपना नहीं। ज्यादातर तो हम उन्हें वैसे का वैसे बता या जता नहीं पाते जैसे वह होती हैं। भावुक आदमी के बोलने के दो ही साधन हैं या तो आँसू या चुप्पी। मेरे पास द...

खुशी का दुःख

अपनी ही लिखी चिट्ठी को पढ़ता रहा। कई कई बार पढ़ा। और सवाल करता रहा क्या .. ख़ैर !  न जाने क्यूँ मैं भीतर से किसी सीलन भरी दीवार की तरह हूँ, तनिक भी याद आती है, कोई स्मृति भीतर रेखा खिंचती है तो मैं बस रो पड़ता हूँ। मेरे हाथ पाँव काँपने लगते हैं। तुम्हारी याद आई.. मैं सह नहीं पाया न खुद को संभाल पाया। बस रोया। सोचा नहीं बस आँसू बहते रहे, सीने में अजीब ही हलचल होती रही। जीवन कितना कठिन है। कितना कठिन है वैसा जीवन न जीकर वह जीवन जीना जो आप नहीं चाहते। धीरे धीरे हम समझ पाते हैं कि धीरे धीरे कुछ नहीं होगा जीवन में हमें दौड़ना पड़ेगा। अभी नहीं दौड़े तो आगे दौड़ने भर का सामर्थ्य भी नहीं बचेगा।  आज मैं दौड़ा। थोड़ा सा दौड़ा।  आज जीवन की सबसे सुंदर चौपाई पढ़ी। जिसे फ्रेम करा लूँगा। आगामी भविष्य उस चौपाई के किस्से सुनेगा। पिता जब ख़ुश होते हैं तो दुनिया कितनी ख़ुश होती है।  * बहुत कुछ जान कर भी आप बहुत कुछ से अंजान रहते हैं। हर वो आदमी जो कह रहा है कि वह खुली किताब है उससे ज्यादा बन्द कोई किताब नहीं, बन्द किताब भी उतनी बन्द नहीं होती जितना खुली किताब बन्द होती है। एक एक अक्षर पर कई कई तह अक...

फिसलन

कितना और कब तक किया जा सकता है एफर्ट ? कोई तो सीमा होती होगी या बस जीवन एफर्ट करते बीत जाएगा। मुझे बहुत की इच्छा नहीं है पर जितनी है उतनी तो मिले उसमें भी कम कर दिया जाएगा तो फिर बचेगा क्या ? फिर तो चाहिए ही नहीं। मैं बिल्कुल उसी ख़्याल का हूँ कि 'हम तो पूरा का पूरा लेंगे जीवन' अगर चाहिए तो सही से चाहिए वगरना चाहिए ही नहीं। हर चीज की थोड़ी थोड़ी आवश्यकता है, थोड़ी मन की, थोड़ी देह की, थोड़ी ही आत्मा की, जीवन की भी बहुत थोड़ी ही, उसमें समझौता नहीं कर पाऊंगा मैं,  कह दो नहीं मिलेगा मैं छोड़ दूँगा, पर यह तनिक नहीं मानता मैं की थोड़ा सा ले लो, थोड़ा सा ही तो चाहिए, थोड़े का थोड़ा क्या होता है कुछ भी नहीं.. पता नहीं क्या चाहता हूँ मगर जो कुछ चाहता हूँ वैसा ही चाहता हूं जैसा सोचता हूँ। पूर्ण ईमानदारी, पूर्ण समर्पण और पूर्ण निष्ठा के साथ..  दिन इधर उधर करते, कुछ पढ़ते, कुछ लिखा हुआ ठीक करते बीता। सुबह से शाम तक एक बात नहीं लगातर बस चुप्पी। एक याद घेरे रही, मन करता रहा कि जाऊँ फिर सोचा नहीं, इंतज़ार कर लेते हैं, वो जब खुद आता है तो मन से आता है।  न जाने क्यूँ आज मुझे ख़ूब रोना आया। भीतर अजीब सा...

मन का मस्तिष्क

सुबह बहुत जल्दी उठ गया था। वही सब किया जो हर कोई रोज करता है। किताबें सही की और फिर दण्डी कृत दशकुमारचरित शुरू किया। कुल 80 पृष्ठ पढ़े। अभी 45 बचे हैं। कहते हैं संस्कृत गद्य अपने प्रारंभिक रूप में यजुर्वेद में ही मिलता है। उपनिषद और ब्राह्मण ग्रन्थों में भी उसकी परिपाटी चलती रही है। दशकुमारचरित में दस कुमारों के चरित्र का वर्णन है। जुआ चोरी व्यभिचार धोखा हत्या बेईमानी कामुकता अकाल अच्छा और बुरा राजा सब पर खुलकर और निर्मम होकर लिखा गया है। हर प्रेम कहानी का मूल यूँ लगता है कामाग्नि का भड़कना ही है। दण्डी यहाँ तक जाते हैं कि उनकी स्त्री पात्र खुद कहती हैं ' मुझसे संभोग करो,और मेरी काम पीड़ा मिटाओ'। मतलब यह की स्त्रियां अपनी हर इच्छा पर मुखर हैं कहीं दबी नहीं हैं। जो चाहती हैं कहती हैं। शास्त्रार्थ करती हैं। बहुपत्नी प्रथा है। लगभग समर्थन भी करता है कवि। विवाह से पहले पुरूष स्त्री को सम्भोग के लिए ले जाता है। सिद्धों की खूब चर्चा है, लगभग लोग अंध विश्वास में धंसे हुए हैं। देवता का कोई प्रत्यक्ष बात नहीं है पर उनकी आड़ ली जाती है। अजीब है सब। पर ठीक है.. अपने युग का नग्न यथार्थ कहती रच...

सो भी इक उम्र में हुआ मालूम

तरह तरह की बात है। हर मुद्दे पर, हर विचार पर विचार है। हर क्रिया के लिए है हमारे पास प्रतिक्रिया, मगर अपनी बात करनी हो तो सब विचार, सारा खुलापन, सारी कल्पना शक्ति वाक्पटुता सब न जाने कहाँ गुम हो जाता है। सब कुछ है मगर जैसे कुछ नहीं है, मन कहने से पहले सोचना पड़ता है इसे कहने के बाद क्या समझा जाऊँगा? यह सोचते ही यह भी सोचता हूँ कि क्या यह उचित है ? जवाब ही नहीं मिलता। एक संकोच लिए घूमता रहता हूँ, जो कहना चाहता हूँ कह नहीं पाता, मान लो कभी कह भी दिया तो क्या शर्त है कि वह पूरा होगा, उलट गलत समझ लिया गया तो। मैं यही सब सोचते हुए यह भी सोचता हूँ कि जिस भी रिश्ते में इतना सोचना पड़े उस रिश्ते की बुनियाद क्या मजबूत है ? जवाब नहीं में ही मिलता है। बुनियाद मजबूत कैसे होगी ? वैसे ही रहने से जैसे हम हैं, वही कहने, बोलने और दिखने से जो हम कहना चाहते हैं, समान्य रूप में बोलते हैं और जैसे असल रूप में दिखते हैं.. परिवार हो या प्यार अगर आप खुलकर मन नहीं कह पा रहे तो मन से वहाँ हैं ही नहीं.. * कितना कुछ अर्थपूर्ण दिखकर बे-अर्थ है और कितना कुछ बेअर्थ दिखकर है अर्थपूर्ण। सोचने की स...