वो सभी लोग जिनके कई चेहरे थे, मैं उन सबको अपने एक चेहरे से देखने का आदी था। वो हर बार मुझे मूर्ख करार करते और निकल जाते। ज्यादातर उनके हर वाक्य के बाद मेरे पास विस्मयादिबोधक चिन्ह लगाने के अतिरिक्त कोई विकल्प न बचता। उसके बाद मैं ख़ोजता रहता, काश कोई ऐसा वाक्य पकड़ में आता जिसके बाद मैं पूर्णविराम लगा पाता और अपने को कुछ और सोचने में प्रवृत्त कर पाउँ .. पर यह सम्भव ही नहीं हो पाता। मैं हमेशा पूर्णविराम की खोज में रहा पर मुझे हमेशा मिला विस्मयादिबोधक चिन्ह ! ******** क्या मैं हर जगह बस फेल होने के लिए बना हूँ ? दिलासे के अतिरिक्त कोई लॉजिकल जवाब है जिसके बाद मैं बस स्थिर हो उस जवाब को क्रियान्वित करने की तरफ बढ़ता और कुछ समय बाद जवाब देने वाले को कह पाता.. 'शुक्रिया आपके जवाब ने मुझे ढ़ेरों सवालों से बचा लिया' दरअसल है ही ऐसा एक सही उत्तर हज़ारों प्रश्नों से हमें बचा लेता है। जैसे अभी मैं जिस प्रश्न का उत्तर खोज रहा हूँ वह ठीक ठीक नहीं मिल रहा है। जिस भी क्षण मिल जाएगा कलम ठहर जाएगी। ******** हर दो लोग के बीच एक तीसरा आदमी है। जो पहले आदमी की असुरक्षा का कारण है। पहले आदमी की सोच मे...