आज शारीरिक तौर पर लगभग स्थिर रहा। मन यात्रा में रहा सुबह 8:30 बजे से ही। अभी भी है। यूँ लगता है यात्रा ही नियति है। मगर विपरीत दिशा की ओर। शारीरिक तौर पर आज बहुत नहीं, हॉं हल्की फुल्की यात्रा की। मम्मी को लेने गया था। पापा भी सुबह ही आए 10 बजे के लगभग। आते ही खेत में जुट गए। इंतज़ार कर रहे थे कि मम्मी आएं। वहाँ गया तो सब फैला हुआ था उसे समेटने लगा और मम्मी तब तक अपने घर सबसे मिलने लगीं तो लेट होने लगा। पापा एकदम गुस्साए हुए फोन किये, यहीं आठ किलोमीटर से आने में कितना समय लगता है। ख़ैर! जब मम्मी को लेकर आ गया तो उनका गुस्सा गायब हो गया था। मैं पापा मम्मी की गतिविधि पर बस नज़र रखता हूँ और सीखता हूँ कैसे रहा जाता है। अदभुत सामंजस्य। उत्कट प्रेम। एक दूसरे से ज्यादा कोई महत्वपूर्ण नहीं.. अपनी औलाद भी नहीं। पति पत्नी का रिश्ता ऐसा ही होना चाहिए। वहाँ तीसरे की जगह होगी तो दिक्कत होगी। जीवन में कहीं तो सम्पूर्ण समर्पण चाहिए, हॉं वह व्यक्ति उस समपर्ण की कद्र करने वाला हो तो उससे सुंदर रिश्ता कोई हो नहीं सकता। न बोलकर भी बोलना सीखा जा सकता है। बिना छुए छू लेने सा प्रेम। आभास इतना गहरा की पीठ पीछे क...