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संदेश

इक याद बसर करती है मुझमें

चुप रहकर भी बहुत कुछ कहा जा सकता है और बहुत कुछ बोलकर भी चुप रहा जा सकता है, बोलने की तरह बोलना और चुप रहने की तरह चुप रहना एक कठिन योग है यह सबको नहीं सिद्ध होता। *************** कल रात मुझे ख़ुद पर खूब हँसी आयी। हँसा भी खूब। न जाने क्यूँ। मुझे चीजें इतनी स्पष्ट क्यूँ दिखती हैं। मुझे निकट दृष्टि दोष है। लेकिन मन के मामलों में यह उल्टा है मन की आँख को दूर दृष्टि दोष है, मुझे दूर का सब दिख जाता है नज़दीक का नहीं दिखता। मैं योजना अच्छी बनाता हूँ, हर कोई तीसरा उसमें अपनी बुद्धि न लगाए और जैसा कहा वैसे चले तो विफल नहीं हो सकता। पर अपने मामले में मेरी सब समझ खो जाती है। मैं डर जाता हूँ।  ख़ैर !  दिन भर दौड़भाग रही। नाना के घर भागवत है। नाना को बड़ा दावा रहता है मुझपर.. सबसे कहते फिरते हैं, ' हमका कौनो चिंता नाय न हमार बड़का नाती आय जाए बस सब होई जाए हमार'  न जाने क्यूँ उन्हें लगता है, मुझमें बड़ी सूझबूझ है, मुझे लोगों से पेश आना आता है, व्यवस्था कभी बिगड़ नहीं पाती। उन्हें अपने बेटे पर उतना भरोसा नहीं रहता। जाने क्यूँ.. पूरे परिवार के लिए रूढ़ी वादी और कट्टर आदमी मेरे नाना ...

छू रहा हूँ तुझे और पिघल रहा हूँ मैं

किसी से बात कर रहा होता हूँ तो उसकी बात का कोई एक सिरा मेरे मस्तिष्क में गड़ी हुई अनगिनत खूटियों में से किसी एक खूँटी में फँसता है फिर वह तब तक उधड़ता रहता है जब तक उस बात में एक भी रेशा बचता है। कई बार बातों के ऐसे हिस्से फँस जाते हैं जिससे मैं किसी व्यक्ति के पूरे व्यक्तित्व उसकी विचारधारा, वह आगे कैसे रहेगा, किन किन बातों पर कैसे प्रतिक्रिया देगा उसकी जीवन शैली और विचार से जुड़ा एक एक रेशा खोल लेता हूँ। मैं जान जाता हूँ आगे कब और किस बात पर यहाँ से मुझे रिश्ता समेट लेना पड़ेगा। संवाद बड़ी सुंदर और छली किस्म की रीति है जो आदमियों ने आदमियों को जानने के लिए शुरू किया।  ***************  उस हाथ का स्वाद दुनिया के सभी हाथों से ज्यादा मन को भाता है जिन हाथों से प्रेम होता है। इन दिनों न जाने क्यूँ मुझे गाड़ी चलाते, कुछ करते, यहाँ तक की चुपचाप बैठे रहने के दौरान भी अचानक से तुम्हारे हाथ का स्वाद मन में उतर आता है। फिर मुझपर एक अजीब किस्म की रुमानियत छा जाती है। जब जब सुनता हूँ तुम कुछ बना रही हो, मैं कल्पना कर लेता हूँ तुम कैसे खड़ी होगी रसोई में, तुम्हारे छोटे हाथ कैसे चल रह...

आशा हमें साँस देती है, उम्मीद ताकत

मन लगातार द्वंद्व से जूझता रहता है। क्या मन की निर्मित ही इसीलिए हुई की वह व्यक्ति को कभी स्थिर चित्त न रहने दे ? शायद इसीलिए लिए। स्थिर चित्त तो ज़िंदा लोगों का हो ही नहीं सकता ! वो संत हो या सामान्य आदमी।  मन का कह देने में अदभुत सुख है, लेकिन कह देने के बाद मनोनुकूल न सुन पाने का दुःख ? उसका क्या ? वह दुःख ही होता है न ? या अपने व्यक्तित्व पर जन्मा संदेह, सम्भवतः संदेह ही ! क्योंकि जब हम अपने करीबियों से वह नहीं सुन पाते जो सुनना चाहते हैं तो अपने व्यक्तित्व पर ही संदेह होता है कि कहीं मैं ही वह भावना व्यक्त करने में असमर्थ तो नहीं।  प्यार और आभार मन भर जताते रहिए। अपने प्रिय को कहते रहिए कि वह आपके लिए कितना महत्वपूर्ण है। यही एक राह है जिससे दुनिया से लगातार मिलते घावों को सहकर सुंदर जीवन जिया जा सकता है। पिछली बार कब ऐसा हुआ कि आपने अपने परिजन अपने प्रियजन से कहा कि ' मैं आपसे बहुत प्यार करता हूँ ' नहीं कहा तो कहिए ! कोई पता नहीं कौन सा संवाद आखिरी संवाद हो  जब जब कहीं कोई दुर्घटना होती है मैं तमाम हताहत चेहरे और शून्य पड़ चुकी देह में अपने को ही मरा हुआ औ...

क्या ये कम है मसीहा के रहने ही से मौत का भी इरादा बदल जाएगा

बहुत कुछ सोच विचार और जी लेने के बाद अंततः जब अपने साथ बैठता हूँ आँख बंद करता हूँ तो खुद से कहता हूँ ;  बक रहा हूँ जुनू में क्या क्या कुछ/ कुछ न समझे खुदा करे कोई   कोई यानि बाहरी कोई, वो एक समझे जिससे बकता हूँ, उसके समझने में बचे रहना महसूस होता है। मेरा ध्यान और योग सब लिखने से ही होता है, मैं सबसे ज्यादा बुरी मानसिक प्रताड़ना से तब गुजरता हूँ ,जब मैं लिख नहीं पाता और उससे बात नहीं कर पाता, बात करने जैसी बात, हाल चाल लेने वाली बात नहीं।  सुबह सुबह एक सवाल से जुझा कुल्ला भी बाद में किया जबसे उठा, वो किया जो नित करता हूँ, उसकी तस्वीर देखी, आवाज़ सुनी, और लग गया जमीन( फर्श ) पर बैठकर उन चीज़ों को खोजने और लिखने में जो करना था। किया। बहुत संतुष्ट नहीं हूँ। मगर ठीक है। यह सब करने के बाद.. देर तक अकेले अपना हाथ पाँव समेटे बैठा रहा, सोचता रहा मैं कितना दोहरा चरित्र व्यक्ति हूँ , जिस मुद्दे पर सारी दुनिया से बात कर रहा हूँ, उससे अपने ही सबसे करीबी साथी से बात नहीं करता, मैं तो करना चाहता हूँ, वह नहीं करती ? वही दबाव है जो हम सब पर होता है। मैंने उससे कभी यह तक नही...

फिर वही रात है... रात है ख़्वाब की...

किसी का शेर है कि ; रो रो के किस तरह से कटी रात क्या कहें / मर मर के कैसे की है सहर कुछ न पूछिए  बात कुछ कुछ यही है मगर ख़ैर..  रात सुंदर थी। वो रातें सुंदर होतीं हैं जिनमें साथी मन खुलकर कह दे। ऐसे अवसर कम ही होतें हैं। जब मन सच सच कहा जाता है। दुःख और सुख की अनुभूति एक ही क्षण में होती है। रोया। लेकिन रोने को सुबह तक भूल गया। वो साथ कभी नहीं टूटता जिनमें दोनों पक्षों में एक दूसरे को पकड़े रहने की ललक हो.. ज़िद हो पर इस साथ के लिए हो।  तुम्हारी आँख से गिरे एक एक बूंद आँसू पर मेरे होंठो का  हक है, भले मैं उस दिन नमक न खाऊं मगर तुम्हारे आँसू नहीं गिरने दूँगा। जब जब तुम्हारी आँखों से आसूँ आते हैं मुझे लगता मेरा कोई पाप तुम्हारे हिस्से गया, जो नहीं होना चाहिए। मुझे तुम्हारा सब दुःख सोख लेना है, मुझमें अथाह सामर्थ्य है। तुम हमारे प्रेम को गर्भ में रख सकती हो तो मैं तुम्हें.... हमें हमारे आँसू और क़रीब ले आते हैं। आँसू ही हैं जिनमें कोई तीसरा नहीं होता बस हम होते हैं। रात दो बजे से ही फोन में एक अलार्म बज रहा है, उसे मैं जान बूझ कर बन्द भी नहीं कर रहा हूँ। जब वो ब...

अरमानो के चंचल धारे ऐसे बहेंगे यहाँ

क्या तुम नहीं कहोगी कि तुम्हारी बाहों को मन है मुझे कस लेने का ? तुम्हारे होंठ फड़क रहें हैं मेरी त्वचा का स्वाद ले लेने को.. तुम क्यूँ नहीं कह रही हो कि तुम्हारे स्तनों में हो आया है कसाव वैसे जैसे माओं को हो आता अपने भूखे बच्चे की आँख देखकर,मैं तुम्हारा ही जन्मा तो हूँ न ? अच्छा तुम्हारे पेट में भी उड़ रहीं हैं तितलियां न ? क्योंकि तुम जानती हो मेरी पसंदीदा जगह है वह। क्या तुम्हारे पाँवों का मन नहीं कि मैं उन्हें अपने उन्हीं होठों से स्पर्श करूँ जिनसे तुम्हारा नाम तक उचारते काँपते हैं मेरे होंठ.? क्या तुम्हारे जीवनद्वार पर नहीं हो रही है मेरी प्रतीक्षा ?कहो न मेरी रतिसाथी, कहो ! कि तुम्हारी उंगलियां ऐंठी जा रहीं हैं मेरे बालों में चलने को उन्हें भींच कर अपने भीतर भर लेने को.. कहो न तुम्हें आ रहा है प्यार! वैसे जैसे मरने वाले को आ रही होती है मौत.... इस दुनियावी चिंता का बोझ झटक देने के लिए जरूरी है कि मैं और तुम हो जाएं हम, और मर जाएँ एक दूसरे में, पा लें वह सुख जिसपर हमारा अधिकार है। अन्यथा सांसारिक मौत हमें अलग कर देगी.. हम तुमसे अलग नहीं होना चाहता। मेरे पास तुम्हारे साथ...

भावनाएं गूँगी नहीं होतीं !

समझने समझाने और तमाम ज्ञान भरी दुनियावी औपचारिक बातों से परे जो मूलभूत बात है वह है साथ, मुझसे नहीं झेला जाता अकेले यह जीवन.. कितनी देर बिना अपने सबसे प्रिय की आवाज़ रहा जा सकता है, कुछ मिनट कुछ घण्टों बस.. यह हद है। अपनी पीड़ा अपनी पीड़ा लगती ही नहीं जब वो परेशान हो.. अपना दुःख न्यून हो जाता है। सब दे देने, सब सौंप देने की इच्छा होती है। कितना भी समर्पित कर दें खुद को,लगते रहता है कि थोड़ा और..ऐसा क्या करें कि उस में समा जाएं। आह ! प्रेम... फिर भीतर सवाल भी उपजता है कि मेरा है क्या ? मैं भी तो अपना नहीं हूं उसका हूँ.. खुद को तो कब का उसके हवाले कर चुका हूँ। फिर किस अधिकार से अपने को देने का दावा कर रहा हूँ। अपने को तो मैं दे चुका हूं तुमको, तुम क्यूँ नहीं रखती मुझे अपने पास.. क्या तुम्हारे पास रहने के लिए तुम्हारे कोख से जन्म लेना ही अनिवार्य शर्त है। अगर हो सके तो मुझे अभी भर लो अपने मन के गर्भ में और दे दो जन्म जिससे तुमसे रहा न जाए मुझसे दूर..  यह साल भी यूँ ही बीतेगा क्या ? तमाम इच्छाओं पर अंकुश सहते, मन के शब्दों पर नहीं की छपकी पड़ते।  अपनो से दूर रहकर अपने को स्थिर कैसे रख...