चुप रहकर भी बहुत कुछ कहा जा सकता है और बहुत कुछ बोलकर भी चुप रहा जा सकता है, बोलने की तरह बोलना और चुप रहने की तरह चुप रहना एक कठिन योग है यह सबको नहीं सिद्ध होता। *************** कल रात मुझे ख़ुद पर खूब हँसी आयी। हँसा भी खूब। न जाने क्यूँ। मुझे चीजें इतनी स्पष्ट क्यूँ दिखती हैं। मुझे निकट दृष्टि दोष है। लेकिन मन के मामलों में यह उल्टा है मन की आँख को दूर दृष्टि दोष है, मुझे दूर का सब दिख जाता है नज़दीक का नहीं दिखता। मैं योजना अच्छी बनाता हूँ, हर कोई तीसरा उसमें अपनी बुद्धि न लगाए और जैसा कहा वैसे चले तो विफल नहीं हो सकता। पर अपने मामले में मेरी सब समझ खो जाती है। मैं डर जाता हूँ। ख़ैर ! दिन भर दौड़भाग रही। नाना के घर भागवत है। नाना को बड़ा दावा रहता है मुझपर.. सबसे कहते फिरते हैं, ' हमका कौनो चिंता नाय न हमार बड़का नाती आय जाए बस सब होई जाए हमार' न जाने क्यूँ उन्हें लगता है, मुझमें बड़ी सूझबूझ है, मुझे लोगों से पेश आना आता है, व्यवस्था कभी बिगड़ नहीं पाती। उन्हें अपने बेटे पर उतना भरोसा नहीं रहता। जाने क्यूँ.. पूरे परिवार के लिए रूढ़ी वादी और कट्टर आदमी मेरे नाना ...