सीधे मुख्य सामग्री पर जाएं

वह जो करता रहा दिनभर

इधर कुछ दिनों से सुबह सुबह की तरह होती है, रात जल्दी आँख बन्द कर लेने का प्रयास करता हूँ, जो जो बन पड़ता है वो जतन करता हूँ कि सो जाए, और सो जाता हूँ। अपने और अपनों दोनों को रूटीन में लाने का प्रयास कर रहा हूँ। रात देर तक कुछ संवादों पर मन मस्तिष्क चल रहा था कुछ घटनाओं पर भी.. 

मन टूट जाता है कई बार जब बहुत करीबी व्यक्ति दो आँख करते दिखता है। कई बार संवाद से भी वह नहीं समझाया जा सकता है जो सच सच कहना चाहते हैं, कहे को अलग ढंग से इन्टरप्रेट कर लिया जाता है और वो तमाम बात बेअर्थ और बेमानी हो औसत बनकर रह जाती हैं जिनका अर्थ हो सकता था.. ख़ैर कवि कह गया है कि आदमी की नियति है न समझे जाना, यहाँ आदमी जेंडर विशेष के लिए नहीं, सम्पूर्ण मनुष्य जाति के लिए है। 

रोता हूँ और रोते हुए सोचता हूँ अब नहीं रोऊंगा। अब छिपकर रोता हूँ, पहले उसके सामने भी रो पड़ता था। 

दिन भर में कुछ विशेष किया नहीं, एक काम जिम्मे लिया है, धन के लालच वश उसका एक अध्याय आज पूरा हुआ। मैं कभी कभी सोचता हूँ जिस दिन दिमाग ठीक ठीक काम कर देता है उस दिन मैं दिन भर में कई पन्ने पढ़ लिख दोनों लेता हूँ , जिस दिन नहीं करता उस दिन एक शब्द नहीं लिख पाता, बलराम कांवट के उपन्यास पर एक लोग ने समीक्षा लिखवाई थी, अब अब प्रकाशन योग्य नहीं रही क्योंकि वो कई वर्ष पुरानी पुस्तक है, उसे ही पढ़ रहा था, कई बार अपनी ही लिखी बातों पर अचंभा होता है यह मुझे एक कविता संग्रह पर लिखते हुए हुआ था। ऐसे ऐसे वाक्य की समझ ही नहीं आता यह मुझसे ही हुआ है। न जाने किस जहनियत में था। एक लेख दो वर्ष पहले लिखा था स्वन्त्रता आंदोलन के दौरान निकलने वाली उर्दू पत्रिकाओं पर वो भी देख पढ़ काट रहा है, समय के साथ समझ और भाषा दोनों नयी होती हैं या शायद पुरानी पता नहीं, मगर कुछ तो है जो हमें आत्मावलोकन की तरफ जाने को कहता है, हम जाते भी हैं। 24 के अक्टूबर से लेकर अब तक हुई कोई कविता कहीं भेजा नहीं, जाने क्यूँ अब कहीं भेजने का मन नहीं करता , यह सारी प्रक्रिया इतनी मुफ़्त की है कि लगता है क्या अर्थ है इसका ? वैसे सच में क्या अर्थ है इसका ?

दिन भर में यही सब हुआ। आदर्श से दोपहर में देर तक बात हुई, शाम केशव दादा से बात हो रही थी, उन्होंने बड़ी सुंदर बातें कहीं, एक बात पर मैं देर तक सोचता रहा, उन्होंने कहा― 'आज के दस कवि की कविता एक साथ रख दो और सबका नाम हटा दो तो यह अलगाना और पहचान पाना मुश्किल होगा कि कौन किसकी है' 
मुझे जहाँ तक लगता है इसका मुख्य कारण से जमीन से कट जाना, अनुभव क्षेत्र का सीमित हो जाना है और अपनी दुनिया में इतना मशगूल रहना अपने बनाए एक आडम्बर में इतना व्यस्त दिखना की सामने कोई व्यक्ति खड़ा हो आप बोलेंगे नहीं, न जाने किस अभिमान में। 
कभी कभी मुझे लगता है लोग व्यवहारिकी भूल गए हैं अब सम्बंध गणित पर चलते हैं। चल रहे हैं। 

इधर कुछ दिनों से मुझे तो यह लगने लगा है जैसे हिन्दी पट्टी में सब सामान्य है, कत्ल, रेप , छेड़छाड़, सब एक प्रचार तंत्र का हिस्सा हो गया है। आरोपी और आरोपित दोनों चीजों को जितना जनरल कर देते हैं यह उतना होना चाहिए ? आरोपी फिर वैसे ही खुला घूम रहा है, इंटरव्यू दे रहा है,  किताब आने की योजना हो रही है, यह सब क्यूँ है ? और वह समाज जो नैतिक मूल्यों की इतनी बात लिखता है, नीति नियम की दुहाई देता है, उसे लाज तक नहीं आती है वह हर जगह लार टपकाते खड़ा रहता है। सब कुछ इतना नॉर्मल कैसे हो जाता है ? हम मशीन हो गए हैं क्या ?

शाम देर तक बाईक लेकर भटकता रहा, साथ दो लोग और भी दें हम मंदिर गए, नदी किनारे गए, प्रसाद खाए और देर तक नदी देखते खड़े रहे। दिन लगभग लगभग दिन जैसा बीत गया। 

एक डर एक आशंका हर जगह जैसे बनी रहती है। हम इतना कसा हुआ जीवन जीने को बाध्य हो गए हैं कि कहीं जब खुल जाते हैं तो इतना खुल जाते हैं कि लगता है बह गए हैं। अपनी तमाम पढ़े लिखे पर पानी फेरता सा महसूस करता, अज्ञानता पर लाज करता हुआ बैठा हूँ। यह एक ऐसी शर्म है जिसका अंत अब हो जाना चाहिए। 

― 20 अगस्त 2025

टिप्पणियाँ

एक टिप्पणी भेजें

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

होने और न होने के बीच की याद

बहुत कुछ पूरा होता है तब भी बहुत कुछ अधूरा रह जाता है। कई बरस पहले ही किसी कविता में कहा था 'नमी जब ज्यादा हो तो बीज उगते नहीं हैं सड़ जाते हैं' उसे फिर फिर महसूसने का दिन रहा। पिछले 24 घण्टों में कई बार डायरी खोले बैठा। बैठा ही रहा। एक शब्द नहीं लिख पाया। आत्माख्यान, आत्मलीन और आत्मरत होकर नहीं लिखा जा सकता। अपने से अलग होना पड़ता है। नहीं लिख पाया। एक शब्द भी नहीं। एक ख़ालिस डॉट या पूर्णविराम भी नहीं। कागज कोरा का कोरा रहा। हाँ, दो चार बूंद आँसू जरूर गिरे। फिर उस पर कुछ लिखा नहीं। तारीख़ डाल दिया अभी। और पन्ना बदल दिया। कोई कभी पढ़ पाया तो वही जान पाएगा वह जो उसपर सम्भावित था लिखा जाना। शायद नहीं जान पाएगा। नहीं जान पाएगा तो मेरा ही फायदा है। यूँ भी तो मेरा मन सबका मन रखने के लिए बना है। मेरा मन कहीं कोने में रख दिया गया था बरसों पहले। कौन जतन करेगा उसे उठाकर झाड़ पोंछ कर देखने की। मैं खुद भी नहीं करता।  अपने हाथ से बिछाए फूल अपने ही हाथ से समेटे। समेटते हुए वह मखमली नहीं लग रहे थे। कँटीले भी नहीं थे। सब वैसे का वैसे रख दिया। बिल्कुल यंत्रवत रहा। कपड़े निकाले सिरहाने रखी कुर्सी पर र...

इच्छाओं का समुच्चय

ऊपरी स्तर पर इच्छाएँ जितनी सुंदर और सपाट दिखती हैं इच्छाओं के तल में उतरने पर वह उतनी ही लिजलिजी और अजीब सी महसूस होती हैं। इच्छाएँ पानी और आग दोनों हैं वो न हों तो भी दिक्कत है हों और सीमा से अधिक हों तो भी दिक्कत है। जब दो लोग जुड़ते हैं तो उनके बीच इच्छाओं का संसार जुड़ता है, आत्मा जुड़ती है तो देह भी जुड़ने का रास्ता खोजती है। मगर क्या हो अगर एक को जो इच्छाएँ सुंदर लगतीं हों अगले को बिल्कुल बेकार ? क्या ऐसा संभव है ? या कोई भीतरी डर है जो हमारे भीतर की स्वाभाविक और मानवीय इच्छाओं पर हावी है ? यह प्रश्न सृष्टि के निर्माण से अभी तक यथावत है और रहेगा कि इच्छाओं का अगर जन्म मन में हो रहा है तो क्यूँ न आदमी उनकी पूर्ति के लिए भागे ? और अगर भाग रहा है तो इसमें गलती किसकी है इच्छाओं की या मनुष्य की ? मुझे इसका कोई ठीक उत्तर सूझता नहीं, हम मनुष्य को गलत ठहराकर इच्छाओं को दोषमुक्त नहीं कर सकते, फाँसी लगा लेने वाले से ज्यादा बड़ा दोषी उसे फाँसी लगा लेने को मजबूर करने वाला है। है कि नहीं ? तो फिर इसका क्या उत्तर हुआ ?  मन ऐसे तमाम सवालों से घिरा रहा। मगर जवाब कोई ऐसा नहीं मिला जिसस...

कभी फ़ुर्सत में कर लेना हिसाब आहिस्ता आहिस्ता

दिन भर एक पिल्ला अपनी मौत के लिए कलझता रहा। हुंकार भरता, रोता, पेट से जाने क्या निकाल देना चाह रहा था कि पूरी ताकत से बाहर साँस फेंकता रहा। मैं जो पिछले कई दिन से अपना जीवन समाप्त कर लेने का सोचता रहा था कि मेरे भीतर यह बात और गहरी हो गई कि न मौत आसान है न जीवन.. एक तीन महीने का पिल्ला मौत माँगते हुए पूरा दिन दौड़ता रहा अनन्तः रात में उसकी साँस रुकी। पापा और मैंने उसे मिट्टी में दफ़न किया। नहा खा के बैठा था। फिर से नहाया। दीदी रोने लगीं उन्होंने इधर कई दिन से दूध पिला पिला के जिंदा रखा था उसे।  अपने को कुचलने की इच्छा होती है। काश! हम अपनी परछाई पर नहीं खुद पर खड़े हो सकते मैं अब धीरे धीरे कठोर होता जा रहा हूँ, बहुत असमान्य सी घटनाओं पर भी सामान्य सा महसूस होता है बीते दिनों जो जो घटा, कितनी मौतें, कितने बलात्कार, कितनी जातीय हिंसा, कितना धार्मिक उन्माद, यह सब न जाने कैसे असर करता है मन हमेशा एक सा हुआ रहता है। ख़ुशी में बहुत कसकर हँस नहीं पाता। बहुत सी चीजें ऐसी हैं जिनसे मैं निकल नहीं पा रहा हूँ, तमाम दोमुहें लोगों को देखता हूँ, भीतर अजीब सा कष्ट होता है फिर समझा लेता हूँ...