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भागने से बचते हुए और और भागता हूँ


दिन भर ऊबते ऊँघते गुस्से से अपना ही होंठ खाते बीत गया। कभी कभी मुझे चिढ़ होती है, और वह क्यूँ शुरू होती है पता नहीं कर पाता। कोई विशेष और बड़ी वजह नहीं होती कोई छोटी मूर्खता बहुत होती है चिढ़ के लिए। कभी कभी तो मुझे इस बात पर क्रोध फूट पड़ता है कि कोई फूल क्यूँ तोड़ता है। कल ऐसा ही हुआ था। ऐसा क्रोध अपने भीतर मैंने कई साल पहले महसूस किया था, हैपी ( चचेरे भाई) तब छोटे थे, वो मेरे आस पास साइकिल दौड़ा रहे थे। मैं थका हारा स्कूल से आया था और गाय के चारे पानी के प्रबंध में लग गया था, भूख और थकन की वजह से मन पहले ही जल रहा था, उस बीच उसकी शैतानी और बार बार मेरे कहने के बावजूद न रुकने की वजह से मुझे ऐसा क्रोध आया था कि मैं खड़े खड़े काँप रहा था और उसी क्रोध में मैंने उसे इतना कसकर थप्पड़ मारा था कि साइकिल से गिर पड़ा। 

क्रोध शांत हुआ तो दिनों तक पछतावा रहा।

उस दिन भी ऐसा ही हुआ था, मैं मना कर रहा था कि फूल मत छुओ वो उसे मसल गए, मैं इतना क्रोध में था कि अगर वो मित्र न होते तो मेरी अंगुलियां उनके गाल पर छपी होतीं, उस क्रोध के बाद मुझे बहुत सी घटनाएं याद हो आईं, बहुत से दिन याद आए, अपने परिवार के ही कुछ कच्चे कान वाले लोगों पर किया क्रोध याद आया। अब सब पर दया आती है। सब नज़र से उतर गए। मैं भी गजब था सफाई देता था, बेवजह जूझता था कि सब बचा रहे, मैं भूल गया था कि जिसे निकलना होता है उसके लिए फिर कुछ मायने नहीं रखता, वो कल्पित घटनाएं कल्पित बातें गढ़कर निकल लेता है, सच्चाई की दुहाई देता है और सामने से संवाद करने के नाम पर किनारा खींचता है। 

अपने चेहरे पर कालिख़ पोतना देखा नहीं जाता न..

गज़ब है, लेकिन यह कटु सत्य है कि हम सब ने अपनी मूर्खताओं का अहंकार पाल रखा है। 

आज मैं देर तक कल लिखी बात सोचता रहा, और यह भी सोचता रहा कि किसी को बहुत समझाकर कहकर कोई फायदा नहीं होता है उसकी आंख तभी खुलती है जब खुद गड्ढे में गिरता है। 

गिर जाए ये दुनिया, मैं अब चुप रहूँगा। 

शाम एक चेहरे पर देर तक पगलाया घूमता रहा, बे अर्थ की बातों पर हँसता हँसाता रहा, एक छोटी सी चीज़ को याद रखने के लिए मन ही मन गदगद होता रहा है कि अब ठीक है। रुमाल बहुत छोटी चीज है लेकिन भावनाएं छोटी नहीं होती हैं। रात भर रतजगा हुआ। घर गुलज़ार रहा। मैं अतिप्रसन्न था कि घर भरा हुआ है। सब रजनीगंधा की तरह महकता रहा, सब सो गए तो मैं उन्हें सोते हुए देखते बैठा रहा, ड्राफ्ट में पड़ी कविताओं को फिर से पढ़ा, एक को काटा पहले आधा फिर निर्मोही की तरह डिलीट कर दिया। मर चुकी भावनाओं को बार बार कुरेदने से बस सड़न की बू आती है।

रात बैठे और पीठ सीधी करते बीत गई। सुबह अभी जब डायरी खोले बैठा हूँ मैं मान रहा हूँ कि मैं अभी कल की रात में हूँ, लेकिन ऐसा है नहीं, आसपास हँसी ठठे नहीं एक ख़ामोशी है। दिन की गर्मी के साथ आखों में जलन बढ़ रही है, आज जन्माष्टमी है व्रत हूं, ये व्रत मैं तबसे रह रहा हूँ जब मुझे पता नहीं था व्रत भी कुछ होता है शायद 6 साल की उम्र से.. फरीद अयाज़ की आवाज़ में कन्हैया को बुला रहा हूँ और पूछ रहा हूँ ― कन्हैया याद है कुछ भी हमारी.. 

शायद अब सो जाऊँ

― 16 अगस्त 2025 


कल सुबह की नींद रात तक की नींद खा गई थी। नींद आयी ही नहीं। चार बजे आसपास झपकी आई थी कुछ, सुबह सुबह ही घर मे तहलका मच गया तो मैं भला कैसे सो सकता था, सूचना मिली कि चोरी हो गई है। पापा सिर पर हाथ धरे काली माई के चौरा पर बैठे हैं, मम्मी की आवाज बदल गई थी, पापा बात करते हुए अधीर हुए जा रहे थे, पूछने पर पता चला, ट्यूबबेल का मोटर चोरी हो गया है, ये मेरे लिए सामान्य बात है कि गया तो गया फिर आ जाएगा पर पापा के लिए नहीं उनके लिए खेती से जुड़ा कुछ भी खोना मतलब सब खो जाना, गाय बछरू कुत्तों गिलहरी चिड़िया किसी को कुछ हो जाए वो जैसे रोने रोने को हो जाते हैं। नींद में ही आधे घंटे बात करके उन्हें कुछ ठीक किया कि जो हुआ अब जाने दीजिए चलिए नया ले आते हैं मोटर, पैसों का जुगाड़ किया और अंततः दोहपर से पहले मोटर आ गया और लग गया । तब जाकर कुछ ठीक हुए।

आज लखनऊ जाना था कल से ऑफिस खुली है पर नहीं गए कि मन ठीक नहीं है, सारी दुपहरी आसपास टहल डाले, कहीं कुछ नहीं मिला।

इस सब के बीच ही सूचना मिली कि सन्तोष सर के कविता संग्रह पर बातचीत है तो वहाँ भी पहुँचना था, वक्ताओं को सुना, पहली बार ऐसे किसी कार्यक्रम की रिपोर्ट लिखी, बाद में पता चला उसमें खामी है यहाँ भी उम्र और क्रम का ध्यान रखना होता है, एक नई चीज रिपोर्ट लिखना सीखने को मिला, एक क्यूँ तीन चीजें सीखने को मिली।

इधर पिछले नवंबर से मैं एक चीज़ देख रहा हूँ कि अब मैं पैनिक नहीं होता हूँ, भावनात्मक और परिस्थितिगत चीज़ों को संतुलन से सम्भाल लेता हूँ। यह शायद दोनों बहनों की शादी की जिम्मेदारी से आया जहाँ सुई से साड़ी तक और घर से लेकर बाहर तक अकेले देखा। कई बार उन दिनों पर रोना आता है पर अब समझ आता है अच्छा हुआ, मैं जीवन जीने का तरीका सीख गया। सामंजस्यपूर्ण जीवन जीने के चक्कर में आदमी जो पिसता है मैं वैसे पिसता हूँ लेकिन इसमें कष्ट नहीं है बस कसाव लगता है। इन सबसे निकल पाने का विकल्प नहीं दिखता कहीं। निकलना भी नहीं है मरने तक, जीना है सबके लिए जीते हुए। 


पूरा दिन फोन ताकते और गाड़ी चलाते सिर दर्द की गोली खाते बीत गया। अभी तक यह चल रहा था। आज बच्ची गई, मन अजीब तरह से ऐंठ रहा है, घबराहट सी हो रही है, आते ही थकन से पड़ गया था। परिवार जाता है तो लगता है ताकत चली गई। फिर नहीं रह सका तो उठा, अब मेज के सामने बैठा हूँ, कुछ तस्वीरों कुछ आवाज़ों के सहारे अपनी पीठ पर ख़ुद की थपकी देकर सुलाना है सुला लूँगा। 

मैं ख़ुद को धोखा देने का आदी हो गया हूँ।

― 17 अगस्त 2025 

टिप्पणियाँ

  1. मेरे घर भी खेत का मोटर चोरी हो गया कुछ दिन पहले। पापा बेचैन रहें। नया मोटर का ख़ासा security था। एक मजबूत बक्से में बंद और cctv कैमरा बक्से के अंदर और बाहर भी। चुराने वाले बड़े जालिम होते हैं।

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