रात नींद नहीं आई। बीता सब पढ़ता रहा। तस्वीरों और आवाज़ों में खोया रहा। एक आवाज़ मुझसे कहती रही 'छाया मत छूना मन' लेकिन मन छाया में ही घूमता रहा। इन दिनों धूप बहुत तेज है। मेरी त्वचा जल गयी है। खुद के कहे, लिखे शब्दों को पढ़ते हुए मैंने पाया कि मैं अब अपनी माँ का बेटा नहीं बचा हूँ। मैं अब उसकी औलाद हूँ। वो जिसने मुझे नया जन्म दिया। मैं बचपन में जितना क्रोधी ज़िद्दी और अकड़ से भरा हुआ आदमी था अब उतना ही शांत और सामंजस्य वादी हो गया हूँ। मैं परिवार का आदमी हो गया हूँ। पिछले कई वर्ष से मैं अपने परिवार में साम्य बनाने का प्रयास करता रहा, वो सब किया जो शायद आगे 40 की उम्र के बाद करना पड़ता। लचक और समझ यूँ नहीं मिलती बोझ और जिम्मेदारी हमें वो सीखा बना देता है जो हमने बचपन में सोचा था कभी नहीं होंगे। देखे सपने और मिले आश्वासनों पर नए आश्वासन की चकती लगाता रहा। मेरी कथरी में अनगिनत छेद हो गए हैं। मैं उसपर सुंदर रंगीन चद्दर बिछाकर छिपाने में लगा हूँ। अपने लिखे को पलट पलटकर पढ़ा। कुछ योजना जो सालों पहले बनायी थी वो आज तक अपने किसी रूप में नहीं पहुँची। आज हम सब जिस दशा में हैं वहाँ तक...