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जो कुछ हो सकता था

बहुत लंबी कविता हो या कहानी बोझिल हो जाती है, भावनाओं को ज्ञान से पाट देना किसी विद्या में सत्यापित नहीं हो सकता। अगर ज्ञान देना है या कोई तर्कसंगत बात करनी है तो निबंध या या लेख रूप है कविता कहने या कहानी कहने की जरूरत क्या है ?   मैं नहीं स्वीकार पाता। भावनाओं में तर्क कभी नहीं फिट हो सकता है। जहाँ होगा वहाँ भावना पीड़ित दमित होगी।  ********* मर्द बर्फ का पहाड़ है जिसे प्रेम की गर्मी से ही पिघलाकर जल किया जा सकता है और किसी से नहीं।  ******** दिन भर निगाह बार बार फोन पर ही रही। जाने क्या देखता अगोरता रहा। एक बात तो है.. इंतजार करने वाले को समय जितना बेहतर पता होता है उतना किसी को नहीं।  आज ख़ूब सोया हूँ, दोपहर में भी सो ही रहा था, आज व्रत था तो कुछ खाने पीने की चिंता थी नहीं, बस सोकर दिन काटने का जतन किया। कमरे के सामान  इधर उधर किया। कुछ पढ़ा। आज सातवें दिन बाहर कुछ दूर बाइक लेकर निकला।  गमले में लगाये हुए पौधों में फूल आ रहे हैं, इन दिनों अडेनियम और गुलाब खिल रहा है, रातरानी का पौधा बहुत छोटा सा है फिर भी दो चार फूल रोज रहता है। आज हरश्रिंगार में कुछ न...

बीत चुके की याद

जब मन अस्थिर हो तो कलम भी स्थिर नहीं होती, शायद नहीं हो पाती, हिलती हुई मेज पर सीधा अक्षर नहीं लिखा जा सकता। अजीब सी खीझ गुस्सा प्रेम सब भीतर दौड़ते रहे, मैं कुछ न कह सकने की अवस्था में हूँ न कर सकने के, मैंने पुकार कर देख लिया, मेरी पुकार एक दो वाक्य भर है या उसके भी नहीं।  कुछ नहीं किया सिवा बिस्तर पर पड़े रहने के अपनी इच्छाओं से जूझते रहने के क्या मैं यूँ ही झेलने और रोने के लिए पैदा हुआ हूँ ..  ― 27 oct 2025

जो कुछ कहा जा सकता है

छोटी छोटी इच्छाओं पर बड़ी बड़ी जिम्मेदारी आकर बैठ जाती हैं और मन मसोस कर सोचता हूँ चलो फिर कभी.. यही करते करते 28 का होने को आया।  मैं कभी अपने किए, वादों, इरादों, देखे हुए सपनों, न जी पाए हुए पलों को सोचता हूँ और भूल जाता हूँ कि मैं यह हूँ जो यह लिख रहा है।  कहता हूँ और अपने कहे पर एक उदासीन भाव देखकर सोचता हूँ, काश !  यह कहा हुआ, अनकहा हो सकता या इस कहे की और उसपर न हुए अमल की स्मृति को मिटाया जा सकता तो मिटा देता, पर यह कहाँ सम्भव है। हम धीरे धीरे यह महसूस करते हैं कि हमारी ताकत, हमारा चार्म मिट रहा है और हम उसे मिटते देखते हैं।  भारतीय जीवन संस्कृति जिस तरह बनी है और हमारे भीतर जिस तरह के संस्कार भरे गए हैं वो हमें बचपन से भीरु बनाते हैं, हमें संशयी बनाते हैं कि हम अपने फैसले और अपने लिए फैसले तो ले ही न सकें। हमने तमाम दर्शन बनाए, ख़ूब नीतियां गढ़ी पर जब जमीन पर देखो तो सब बेकार है, वहाँ बनाने वाला ही वही कर रहा होता है जिसे वो करने को मना करने को लिखता कहता है। इतनी गुथमगुत्थी है कि कोई एक डोर पकड़ो तो उसे और कई डोर पकड़ कर कस लेतीं हैं, आप अकेले निकलना चाहें तो आपको...

किसको फुरसत है जो थामे...

मैं फुरसतिया आदमी हूँ, मैं इतना फुरसतिया हूँ मैं सबको याद करता रहता हूँ, और सब इतने व्यस्त हैं कि उन्हें फुरसत ही नहीं मिलती। मैं एक दिन अपनी तमाम फुरसत को मौत के हाथ बेंच दूँगा जो हमेशा व्यस्त रहती है।  ******* मन कहाँ है यह तो मन भी नहीं जानता, हां इतना जरूर जानता हूँ कि जहाँ कहीं भी 'लेकिन' है वहाँ मन नहीं है।  ******** दिन भर बस दिन बीतने के इंतज़ार करता रहा। कुछ पढ़ा, ज्यादा सोचा, व्यस्तता के विषय में सोचता रहा।  ********* चिंघाड़े मार कर रोने का मन होता है, क्यूँ होता है पता नहीं, कोई दुःख नहीं, कोई उम्मीद नहीं है, न किसी से कुछ चाहिए, बस ऊब गया हूँ। किससे ऊब गया हूँ यह भी नहीं पता है।  मन नहीं कर रहा है कुछ लिखने का ! ―  24 oct 2025 

कुछ कुछ में से कुछ जो बच जाता है

प्राकृतिक तरीके से होने की सम्भावना को अपने तरह से कर लेने की इच्छा और न हो पाने / कर पाने  के कारण जो टीस पैदा होती है, वही टीस भीतर बनी रही। एक और इच्छा पर पानी फिर गया। मैं देर तक सोच रहा था यह कैसे स्वीकार करूँ, अनन्तः भावनाओं को जज्ब कर लेना ही उचित लगा। कर लिया। क्योंकि सच ही कहा है, कि 'आपन सोचा कुछ नहीं हरि सोचा तत्काल' और उस तत्काल को जीने के अलावा हमारे पास कोई विकल्प भी नहीं है। गौर से देखो तो हर कहीं एक गहरी खाईं हैं, समतल, समतल में भी नहीं, वह भी खाईं ही है।  जीवन खुली आंख से बन्द आंख की तरह चलना ही है।  आज बहुत कुछ लिखा, कुछ चिठ्ठी, कुछ मन के द्वंद्व पर सब बकवास, उन्हें नहीं पढ़ा जाना चाहिए, क्योंकि सब मेरे मन के विकार हैं। डिलीट कर दिया।  सुबह जब टहल के और व्यायाम करके लौटा तो एक तितली भी मेरे साथ कमरे में घुस आई थी, वो दिन भर यहीं फड़कती रही। जाने क्या खाई होगी, उसे भूख तो जरूर लगी होगी, मैं दाल चावल खा रहा था तो सोच रहा था वो भी खाती तो खिला लेता साथ.. मैं इतना कठोर तो नहीं कि तितली न पाल सकूँ। पर वो खाई नहीं, एक दो बार पकड़ने का प्रयास किया...

जाने किस चीज की कमी है अभी

लिख देने से न तनिक भर कुछ घटता है न बढ़ता है, शायद बढ़ता है। क्योंकि और भारीपन लगता है, देर तक लगता रहता है अपना ही सिर अपने कंधे पर उठाए घूम रहा हूँ। ज्यादातर तो यही लगता है कि सिर का बोझ शरीर के बोझ से ज्यादा है।  बीते दिन फिर न लौटने वाले दिन बनें यही कामना है। जहालत, मलामत, उदासी, आँसू, गरीबी, दबाव, अकेलापन, इन सबसे ऊपर फेलियर का टैग लिए चलता रहा और सबसे हँसते हुए मिलता रहा, कहीं किसी की दवा घटी है कहीं कोई टेस्ट करवा रहा है, कहीं कोई सब होते हुए भी नहीं खा रहा, कहीं कोई दिन भर में चार बार इस बात पर रो रहा है कि कोई है ही नहीं, मैं सब तरफ दौड़ता हूँ, और हर जगह अकेला हो जाता हूँ। सब तरफ शिकायत है, सब तरफ कोई न कोई चाहता है मैं वहाँ भी पहुँच जाऊँ, मैं कितना फैलाऊं अपने दो हाथ दो पाँव की सब जगह पहुँच जाऊँ ? मैं इन सभी में से किसी जगह नहीं रहना चाहता, मैं जहाँ रहना चाहता हूं, वहाँ दूर तक निर्जन है, मेरे कहे की ध्वनि है प्रतिक्रिया कोई नहीं।  आज दिन भर में इतना बोला हूँ कि अब माथा सनसना रहा है। सिर दर्द से फटा जा रहा है, कमर अजीब सी ऐंठ रही है, कुछ खाने का मन नहीं हुआ।...

रियाज़

दिन भर बस पड़ा रहा, इस करवट से उस करवट, आँखे सूज आईं थीं जाने क्यूँ, भीतर लगातार घबराहट होती रही है कल से ही, वो रुकने का नाम नहीं ले रही है। मैं बिस्तर जमीन कोना कुर्सी सब छान चुका हूं यह कहीं शांत नहीं हो रही है। ऐसा कुछ सोच भी नहीं रहा हूँ। ऐसा कुछ क्या कुछ भी सोच नहीं रहा हूँ, न किसी बात से परेशान हूँ, न कोई इच्छा या उम्मीद है। बस एक उब है। जाने किस चीज की लेकिन है। मैं फोन फेंक देना चाहता हूँ। मुझे किसी से बात करने का मन नहीं करता। किसी मतलब किसी से नहीं..  दिन भर में चार बार कपड़े बदले, कुछ किताबें उठाई रखीं, कई भजन कीर्तन सुने, कुछ ग़ज़लें भी.. जाने क्यूँ संगीत में खासकर शास्त्रीय संगीत में मुझे अद्भुत शांति मिलती है। देर तक राग रामकली सुनता रहा और बिस्तर पर पड़ा रहा। शाम एक फोन से उठा। आज दिन भर में किसी का फोन नहीं उठाया, बोलने का मन नहीं कर रहा था। सोच रहा हूँ सप्ताह में एक दिन मौन व्रत रखना शुरू करूँ।  हम सब एक टूल हैं, जिसे हर दूसरा अपनी जरूरत अनुसार उपयोग में लेता है और फिर टूल बॉक्स में रख देता है। इस वाक्य का अर्थ क्या है मैं खुद नहीं जानता लेकिन लिख दिया क्योंकि चल ...

अब यही रोज़गार है अपना

मैं बहुत खुशमिज़ाज किस्म का व्यक्ति नहीं हूँ। न ऐसा है कि मैं गंभीरता ओढ़े रहता हूँ। शांति ही मेरी प्रकृति है, मुझे तेज बोलना, तेज हँसना, बेवजह किसी को छूते रहना नहीं पसंद, ही हा हू भी मुझसे नहीं होता, मैं अपनी उपस्थिति में अनुपस्थित सा रहता हूँ, मुझे हर कहीं शामिल होने की भूख नहीं है। इन दिनों लोगों में जो एक स्वभाव पैदा हो गया है हर आदमी को पकड़कर फ़ोटो लेने लगना, बेवजह हर किसी को स्पर्श करते रहना, अनायास की बातों में झूठी हँसी खोज लेना, ये सब करते लोग मुझे निरे मूर्ख लगते हैं, मैं शामिल तभी होता हूँ जब कोई शामिल करे। बहुत संभावना है कि मैं प्रथम द्रष्टया पीड़ित या दुःखी सा कुछ अजीब लगूँ पर ऐसा है नहीं, मेरी नसों में बड़ी शीतलता है। मैं भीतर ही भीतर इन तमाम तरह की औपचारिकताओं में लहालोट लोगों को देखकर हँस लेता हूँ, मैं बोलने से अधिक करने वाले को बेहतर मानता हूँ, करता भी यही हूँ। यह सब क्यूँ लिख रहा हूँ पता नहीं।  चित्त में तरह तरह के विचार आते जाते रहते हैं। उनके आने जाने से थका रहता हूँ। जब आप कोई इच्छा पाल लें और आपको लगे यह तो होगा ही जब वह नहीं होता तो त्वरित तो भले आप मैनेज कर लें...

ताक रहा है भीष्म शरों की कठिन सेज पर

सुबह 4बजे के आसपास एक सपने से नींद खुली, फिर नींद नहीं आई, देर तक इधर उधर टहलता रहा। कुछ नहीं सूझा तो सब सफेद कपड़े धूल डाले, हिंदी साहित्य का इतिहास पढ़ा कुछ पन्ने, समास पत्रिका का 26वां अंक पढ़ा, 2 घण्टे लगभग योग व्यायाम किया,  निराला की पुण्यतिथि थी आज तो उनका स्मरण किया। उनकी दो कहानी दुबारा पढ़ी, जो व्यक्तिगत तौर पर मुझे पसंद है, एक है सखी, दूसरी है ज्योतिर्मयी। नए तरह से मन की पड़ताल है। सुबह की खुशी धीरे धीरे ख़त्म हुई। सूचना दर सूचना मन सिकुड़ता गया, अनन्तः शाम होते होते सिकुड़ कर न बराबर हो गया।  एक कोरियन ड्रामा का अनुवाद का काम मिला है, एक एपिसोड उसका काम करता रहा और घड़ी देखता रहा।  मैं गुब्बारे की तरह जीवन जीता हूँ, मेरा फूलना और मेरा पिचकना दोनों कहीं और से निर्धारित होता है, न हवा मेरी है जो मुझे फुलाती है, न कांटा मेरा है जिससे मैं पिचकता हूँ। मैं बस इंतज़ार करता हूँ, सपने देखता हूँ, और समय समाज और क्या करूँ ? नाम के कांटे से मेरे फूले रूप को पिचका देता है।  किसने बनाया ये नियम की कह दी गई बात वापस नहीं होगी ? देख लिया गया सपना भुलाया नहीं जा सकेगा ...

'अन' उपसर्ग की तरह है सब

जैसे छुए हुए में है बहुत कुछ अन-छुआ, देखे हुए में अन-देखा, वैसे ही जिए हुए में बहुत कुछ अन-जिया है। जीवन अन उपसर्गों से बने शब्दों का समुच्चय है। हम जीते हुए भी बहुत कुछ जीना छोड़ते जाते हैं, और फिर हम जब कहते हैं सम्पूर्ण जीवन जी चुकने की तरफ हैं, तो उसी क्षण सोचते हैं, सम्पूर्ण में कितना पूर्ण रूप से जी सका ? गिनने के लिए हमारे हाथ की उंगलियां भी ज्यादा प्रतीत होती हैं। हम जितना पकड़ते हैं उसका कई कई गुना छोड़ देते हैं।  बीते दिनों के जिए को बार बार याद कर रहा हूँ, जिए हुए के बीच बचे हुए अनजिए पर रीझ रहा हूँ , भीतर की लालसा से बार बार दो चार हो रहा हूँ, और अकेला बच जा रहा हूँ।  जिंदगी की गणित सामान्य गणित से अलग है। यहाँ परिवार से कोई एक घटे तो सब अकेले हो जाते हैं। भटकते हुए शून्य की तरह। हम दो होते हैं, पांच होते हैं, छः होते हैं, दस होते हैं, फिर अकेले हो जाते हैं। सबके परिवार के बीच अपने परिवार को खोजना अब रिवाज़ है। हम एकाकीपन खोजते हैं फिर कहते हैं कि हम अकेले हैं।  बहुत सी भावनाओं के लिए मैंने एक बहुत सुंदर बात सोची आज, बात ये कि अगर जिये हुए को फिर फिर ज...

रात्रिदग्ध एकालाप

जाने क्यूँ कल से लगातार मैं दो चीजें कर रहा हूँ, एक तो एक गाने को लगातार गाए जा रहा हूँ वो भी ऐसे गाने को जिसको सुना नहीं है शायद सालों से, जो मुझे पसंद भी नहीं है। यह अजीब लग सकता है कि पसंद नहीं है तो याद कैसे है और गा कैसे रहा हूँ, लेकिन यही सच है।  दूसरा यह कि मुझे बार बार जाने क्यूँ जड़त्व का नियम याद आ रहा है। पिछले दो साल से मैं महसूस कर रहा हूँ कि मैं स्मृति में घूमता रहता हूँ, भौतिकी पढ़े मुझे 8 साल हो गए होंगे या ज्यादा पर अब मुझे उसके एक सिद्धांत सूत्र और परिभाषा याद आते हैं। इसका क्या अर्थ है पता नहीं ! जड़त्व का नियम याद करते रहना चाहिए। जीवन का नियम भी यही है।  *********** मैं समझ नहीं पाता हूँ समय तेजी से गुजर रहा है या घटनाएं तेजी से घट रहीं हैं। मन लगातार भावनात्मक उठापटक का मैदान बना रहता है, एक पल को मन खुश होता है, एक पल को सशंकित, एक पल को चिड़चिड़ा, एक पल को रोमांटिक, एक पल को भयभीत, एक पल को अकेला, एक पल को बिल्कुल बुद्धू, एक पल को विशुद्ध वैचारिक, एक पल को आशंका से भरा हुआ, एक पल को बच्चा, एक पल को बड़ा, एक पल को भाई, एक पल को प्रेमी, एक पल को बेट...

जाने कौन दिशा को बही पुरवईया

हर कोई समझा कर जा रहा है और मैं निरा मूर्ख कुछ नहीं समझ पा रहा हूँ। मेरी बुद्धि शायद घास चरने चली गई है, लेकिन घास भी तो इस सदी में मुश्किल चीज है तारकोल अधिक है और सहज भी। शायद वही चाटने गई है। यूँ भी मुँह सिलने से बेहतर है चिपक जाए, ऐसी ही किसी मूर्खता से.. मैं कभी कभी सोचता हूँ वो तमाम लोग जो सबके लिए बोलते परेशान होते रहते हैं क्यूँ नहीं पी लेते हैं एक ग्लास फेविकोल, क्योंकि उनकी बुद्धि में यह तो घुसने से रहा कि उनकी बातों का कोई महत्व है। यह मैं अपने लिए भी सोचता हूँ। मुझे भी पी लेना चाहिए ..   रोज ब रोज मैं अपनी इस अस्थि चर्म वाली देह पर उम्मीद का लबादा लपेटे अपनी ही इच्छा के चरणों में दण्डवत करता हूँ और रोज कहता हूं अब कोई इच्छा नहीं, अब यह उम्मीद का लबादा भी उतार कर दूंगा फेंक या जला दूँगा वैसे जैसे जलाई जाती है देह प्राण उड़ जाने के बाद, लेकिन अगले ही क्षण नया और पुराने लबादे से बेहतर खोजने निकल पड़ता है हूँ। मेरा घर ऐसे अनगिन लबादों से भरा हुआ है लेकिन फिर भी जब जब मैं देखता हूँ कोई नया लबादा मन होता है यह भी तो होना ही चाहिए। इच्छा कोने में खड़ी मुस्कुराती ...

सच की नमी पर समझ की गर्माहट असर नहीं करती

आखिरी बार सम्भवतः 27 अगस्त को डायरी उठाई थी, तबसे सब भुला हुआ था। मैं अब लिखने से कतराने लगा हूँ, विचार आते हैं लेकिन एक अजीब किस्म का आलस्य घेरे रहता है, जाने क्यूँ अब मुझे डर लगता है अपने लिखे से। आज जो कुछ लिखता हूँ, या सोचकर जहाँ तक पहुँचा होता हूँ, तत्काल नहीं भी पता चले पर जब पता चलता है तो सब वैसे ही हुआ रहता है जैसे सोचा होता है, मैं बातों की परत समझ लेता हूँ। फिर मुझे छिपाई या न बताई गई बातों को पचाने में वक़्त लगता है।  खैर.. दिन ठीक-ठाक बीता, कई दिनों बाद आज घण्टों किताबों के साथ बैठा, कुछ काम पूरे हुए, कुछ नए काम बनाए गए। किसी ने कुछ कहा भी नहीं जो चुभे, फिर भी शाम होते होते एक भारीपन उतर आया। यह भारीपन कहाँ से मेरे जहन में तारी होता है मैं समझ ही नहीं पाता। जैसे भीतर कहीं कुछ बुझता जा रहा है। पहले भी ऐसा ही था। अब और अधिक हो गया है। किताब खरीदकर, फूल देखकर, कोई गीत, ग़ज़ल, कविता पढ़ सुनकर वाह करने वाला मैं, अब चुप सा हो गया हूँ, कुछ भी भीतर उत्साह नहीं भरता, लगता है कंधो पर कोई बोझ है जो लगातार बढ़ता जा रहा है। अब कुछ भी करता हूँ पर भीतर कुछ नया किस्म का भाव नही...