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अन-कथ

रात नींद नहीं आई। बीता सब पढ़ता रहा। तस्वीरों और आवाज़ों में खोया रहा। एक आवाज़ मुझसे कहती रही 'छाया मत छूना मन' लेकिन मन छाया में ही घूमता रहा। इन दिनों धूप बहुत तेज है। मेरी त्वचा जल गयी है। खुद के कहे, लिखे शब्दों को पढ़ते हुए मैंने पाया कि मैं अब अपनी माँ का बेटा नहीं बचा हूँ। मैं अब उसकी औलाद हूँ। वो जिसने मुझे नया जन्म दिया। 

मैं बचपन में जितना क्रोधी ज़िद्दी और अकड़ से भरा हुआ आदमी था अब उतना ही शांत और सामंजस्य वादी हो गया हूँ। मैं परिवार का आदमी हो गया हूँ। पिछले कई वर्ष से मैं अपने परिवार में साम्य बनाने का प्रयास करता रहा, वो सब किया जो शायद आगे 40 की उम्र के बाद करना पड़ता। लचक और समझ यूँ नहीं मिलती बोझ और जिम्मेदारी हमें वो सीखा बना देता है जो हमने बचपन में सोचा था कभी नहीं होंगे। देखे सपने और मिले आश्वासनों पर नए आश्वासन की चकती लगाता रहा। मेरी कथरी में अनगिनत छेद हो गए हैं। मैं उसपर सुंदर रंगीन चद्दर बिछाकर छिपाने में लगा हूँ।

अपने लिखे को पलट पलटकर पढ़ा। कुछ योजना जो सालों पहले बनायी थी वो आज तक अपने किसी रूप में नहीं पहुँची। आज हम सब जिस दशा में हैं वहाँ तक आने में जाने क्या क्या लगा है। देखा जाए तो जीवन में कुछ हासिल नहीं है न किसी दूसरी धरती का स्पर्श है कि वहाँ का ही कुछ जानता होउँ, टहलने की योजनाएं बनीं पर आज तक कहीं न जा पाया, मैं क्या जाऊँ मेरा बाप नहीं गया कहीं । जो कुछ है बस इतना ही कुछ किताबें पढ़ ली हैं, परिवार देख लेता हूँ। किताबों से भी कुछ हासिल न हुआ। परिवार से कुछ हासिल करना नहीं है। मेरी प्राथमिकता में हमेशा परिवार रहा। प्यार होने के बाद भी मैंने पाया कि मैं प्रेमी कम हूँ परिवारिक ज्यादा। इसमें सुख है। मैं और दुनिया के तमाम दंद फंद से बिल्कुल कटा हुआ रहा। दोस्त के नाम पर कोई एक दो लोग हैं और जो रहे भी सब ने किसी न किसी रूप में मुझे मनमुताबिक इस्तेमाल किया। मैं हुआ। उसका मुझे कोई गम नहीं। 

ये सब क्या मैं कहने लगता हूँ .. 

ईमानदारी बहुत दोधारी राह है, इसमें आप अपनों से तो कटते ही हैं और बाहरी लोगों से भी कटते हैं और आपके ज़ख्म पर मरहम रखने वाला कोई नहीं होता।

बीते दिनों पैर में असहनीय दर्द रहा। चोट लगते ही नहीं थोड़ी देर बाद दर्द देती है। घाव भरते हुए दर्द और चुनचुनाहट और बढ़ती है। जैसे आप जब सब सही होने लगो तो समाज उकसाता है कुछ ग़लत कर देने को वैसे मन उकसाता है वहाँ नाखून लगा देने को.. पर मैं रोक लेना जानता हूँ खुद को। 

कल माँ को उन तमाम घटनाओं के बारे में बताता रहा जो भीतर चलती रहीं थीं। माँ एकदम परेशान हो गईं थीं कि ऐसे भी होता है क्या.. कोई माँ कैसे..भाई और चाचा कैसे 

सुबह से पापा के आगे पीछे चलता रहा, सारे बाग बगीचे आम अमोले सब देख लिया तोड़ लिया। कद्दू लौकी करेला लोबिया, आम केला बेल और करौंदा ख़ूब हुआ है उसे गांव में बांटा। 

दोपहर से यूँ ही बैठा रहा। पढ़ने का प्रयास करने पर मन में अजीब अजीब संवाद घूमते रहे, मैं मन में जो कुछ सोचता हूँ सब उसका उल्टा पुल्टा हो जाता है। सोचा था 5 को.. पर फिर से इंतज़ार ही हिस्से है। इसमें दोष किसी का नहीं है। जो मेरी नियति में लिखा है मिल रहा है।

शाम एक फोन कॉल से मन कुछ देर को अच्छा हुआ। थोड़ी सी हँसी फूटी, चेहरे पर जीवन का रंग दिखा। फिर वह धीरे धीरे लोप हो गया। 

बहुत सोचता हूँ कुछ नहीं कहूंगा फिर भी सबसे कहता रहा ये रख लेना, ये कर लेना .. फिर बाद में सोचा भी की क्या सोच रहे होंगे सब। इसे मुझे सही करना है। चुप्पी और कुछ दो चार शब्दों में समेट लेना है खुद को, क्योंकि न मैं बोलकर मन वैसा कह पाता हूँ न लिखकर जैसा सोच रहा होता हूँ.. 

एक पैर की स्मृति मुझे घेरे रही.. एक आँख में अपने को देखने की इच्छा होती रही, एक आवाज़ में खुद को ख़ोजता रहा। दिन बीत गया। 

कल से फिर आगे दिन गिनने के दिन होंगे। जाने कब ...

ख़ैर! सब ठीक है। 



― 7 जून 2025 / रात 10 :40 


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