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अपनी मर्ज़ी से कहाँ अपने सफर के हैं हम

भीतर अजीब सी उथलपुथल है। मन एक पल को सामान्य नहीं है। कल एक परीक्षा थी। उसके एक दिन पहले से ही मन जैसे बस बैठा जा रहा है। कहने को इतना कुछ है मगर उन्हें कह देना ठीक नहीं है। कल रात मैं देर तक सोच रहा था कि आख़िरी बार कब किसने मुझसे मेरी मर्जी पूछी, शायद किसी ने नहीं, हम योजना में होते होते कब बाहर हो जाता हूँ मुझे खुद पता नहीं चलता। खैर !.. छोड़ देते हैं जैसे सबके बीच मैं छूट जाता हूँ।

सुबह बहुत जल्दी उठ गया था कहूँ या कहूँ रातभर नींद ही नहीं आई। सेंटर बगल ही था तो थोड़ा आराम से निकला, बाइक आधे रास्ते में बन्द हो गई, मैं लगातार प्रयास करता रहा मगर स्टार्ट न हुई, न जाने क्यूँ पहले कभी ऐसा होता नहीं था.. थोड़ी दूर पैदल लेकर चला, पैर की चोट से चला नहीं जा रहा था, खून आने लगा तो पसीने से लथपथ हुए वहीं रुक गया, बगल एक दुकान दिखी मगर सुबह 8 बजे कौन मोटरसाइकिल बनाता है, मैं निरीह सा खड़ा रहा, बगल एक बुजुर्ग ने पान की दुकान खोली थी, मुझसे पूछे क्या हुआ बच्चा ? मैं बोला, गाड़ी बन्द हो गई है बाबा चल नहीं रही है परीक्षा देने जाना था, तो बोले चाभी मुझे दे दो, चले जाओ , मैं मिस्त्री को दिखा दूँगा, पेपर खत्म हो तो आकर ले लेना। मैं गाड़ी खड़ी किया किनारे तो बोले जल्दी आना चाहिए न.. मैं बताया निकला तो घण्टे भर पहले ही था, सेंटर के अंदर जाकर बाहर आया था, एडमिट कार्ड उन्हें 2 प्रति चाहिए था तो प्रिंट की दुकान खोज रहा था, पूछे, हुआ प्रिंट, मैं बोला हां, चाभी उन्हें दिया, गोरे गोरे थे बाल कम कम मुँह में पान भर रखा था, त्वचा बिल्कुल वैसी ही हुई थी, जैसे मेरे बचपन में मेरे परनाना की हुई थी जिससे हम खेलते थे बिल्कुल लटकी हुई। सेंटर वहाँ से 1 किलोमीटर था लगभग आधी दूरी पैदल आधी में एक ई रिक्शा के साथ गया। पहुँचा। जो कक्ष निरीक्षक मैंम थीं उन्हें एडमिट कार्ड की एक प्रति दी, कॉपी पेपर दे रहीं थी वो, बिल्कुल सीधी सी एकदम माँ की तरह लग रहीं थी, कॉटन का सफेद सूट पहना था उन्होंने उसपर लाल और काले ब्लॉक् छाप की कढ़ाई बनी थी। उनकी उम्र भी 50 के ऊपर रही होगी। आगे की तीन सीट पर बच्चे उपस्थित थे चौथी पर नहीं था, उन्हें वहां कॉपी नहीं रखी, आगे से फिर पूरा क्रम गड़बड़ हो गया, सबकी ओएमआर और बुकलेट के नम्बर अलग अलग हो गए। नाटक शुरू हुआ, क्लास में एक दूसरी मैडम थी,वो उन्हें चिल्लाकर बोलीं आपको ध्यान नहीं देना चाहिए, फिर ख़ूब नाटक हुआ परीक्षा टीम आई , सबसे लिखवाया, यह सब 20 मिनट चला, इसमें भी गलती उनकी ही नहीं थी बच्चे भी जागरूक कहाँ होते हैं मिलते ही बस भरने लगते हैं देखते ही नहीं सब ठीक है कि नहीं, मैं तीसरी रो में था, मैं बैठा सब देख रहा था, उनकी आंख में डर भर गया था, परीक्षा शुरू हुई, लोगों का आना जाना लगा रहा, उनकी साथी मैंम उनपर हावी होती गयीं, जैसे वो कुछ बोलतीं वो भड़क कर कहती, आप चुप रहिए अब मैंम, एक घण्टे के बाद उन्हें नीचे ऑफिस में आने को कहा गया, फिर वो घण्टे भर में लौटीं तो उनकी नाक लाल हुई थी, आंख भी अजीब पनीली सी, वो उस सीट के पास आकर खड़ी हुईं, उस नेम स्लिप पर हाथ रखकर उसे छुआ, फिर चली गईं आगे, फिर कुछ देर रोना दबाते रहीं , मैं जब जब सिर उठाता उनका चेहरा देखता मुझे मेरी माता याद आती, उनका भी चेहरा ऐसे ही हो जाता है जब उनसे कुछ चूक हो जाती है तो.. उनके गले में जो परिचय पत्र लटका था उसे ध्यान से देखती हुई वो बैठीं रहीं, फिर उन्होंने कुछ नहीं बोला, कॉपी जमा हुई, जब कहा गया अब आप जा सकते हैं, सब निकलने लगे तो फिर वो उसी सीट के पास आकर खड़ी हो गईं, मैं उनके पास खड़ा हो गया, बहुत सँकोच हो रहा था मगर मैंने पूछा, आप ठीक हैं न मैंम..?उन्होंने मुझे देखा, ऐसी दृष्टि कातर एकदम..कुछ नहीं बोलीं.. मैंने कहा मन मत खराब कीजिए मैंम , हो जाती है चूक, उसे धूल की तरह झाड़ दीजिए, वो मुस्कुरा कर बोलीं ठीक हूँ बेटा, बिल्कुल पतली सी आवाज, जैसे ये बहुत तेज भी बोलती होगी तो वो धीमा ही होता होगा, मैंने आगे सोचा कुछ कहूँ, पर आसपास कई लोग देखने लगे तो बस 'अपना ख़्याल रखिए कह सका' , उन्होंने रूमाल से चेहरा पोछा और निकलर गैलरी में आ गईं, मैं दो कदम आगे चला गया तो उन्होंने कहा, धन्यवाद बेटा, मैंने कहा या तो बेटा कहिए या धन्यवाद.. वो हँस पड़ीं, मैं चला आया। 

बुकलेट पर जहाँ कक्ष निरीक्षक का सिग्नेचर होता है वहाँ उन्होंने इंदु दुबे लिखा था। 

मैं निकला, गाड़ी तक पैदल जाते जाते सोच रहा था कि लोग इतने क्रोध में क्यूँ रहते हैं, हो गई चूक ठीक है तो ये कहाँ भला है कि आप किसी को रूला दें? उसे कहिए आगे ख़्याल रखिए और बस। वो चूक लौट तो नहीं सकता, नहीं, पर किसी को पीड़ित करने का क्या फायदा..

पहुँचा तो बाबा अपनी गुमटी से निकलकर खड़े थे, देखकर मुस्कुरा दिए, बगल ही गाड़ी बनकर खड़ी थी, उन्होंने चाभी देकर कहाँ गाड़ी ले लो, मिस्त्री से पूछा तो बताया, बस प्लग में कार्बन था । 20 रुपये दे दो। दिया। बाबा को 50 रुपये देने लगा वो लिए ही नहीं उल्टा बस कहे जाओ कुछ खाओ पिओ मुँह लटक गया है। 

मैं चला आया, कुछ घड़ी कमरे पर बैठा रहा। अजीब सी एंजाइटी हो रही थी तो निकलकर चल पड़ा, नदी किनारे बैठा रहा, मीठे पानी को खारा पानी देता रहा। एक छोटा बच्चा दिखा घुंघराले बाल वाला, छोटा सा एकदम अपने माँ पापा के साथ खेलता हुआ। मैंने उन्हें कैमरे में कैद किया। उनके पिताजी से बात हुई, कुछ साहित्यिक किताब के नाम उन्होंने बताए कुछ हमने भी साहित्यिक रुचि के आदमी थे, नाम बताने पर उन्होंने मेरे नाम का पिछला हिस्सा जोड़ते हुए मुझसे कहा आपकी कोई रचना मैंने कहीं तो पढ़ी है किसी पत्रिका या ऑनलाइन, फिर थोड़ी खोज बीन के बाद उन्होंने 'बहन की विदाई' वाली कविता दिखाते हुए कहा ये देखिए यही पढ़ा था, मेरी भी बहन की शादी पिछले साल हुई। हमसे 6 साल छोटी थी। फिर मैने आगे से कहा अच्छा मैं चलता हूँ आप लो आनंद लीजिए, मुझे दो लोगों में घुसना या हमारे बीच घुसते लोग पसंद नहीं। चला आया। कुछ देर बैठा रहा। एक गली में खड़ा रहा। थोड़ी देर में मन हुआ कि अब यहाँ कुछ नहीं है। तो बस चला आया घर..

बीतते समय के साथ मैं अपने भीतर एक अजीब बदलाव देख रहा हूँ जो पहले नहीं था, मैं अब नापसंद चीज़ों या बातों पर भी चुप रह लेता हूँ। 

इंतज़ार करते रहना तो मेरी जैसे नियति है.. मैं पृथ्वी का वो हिस्सा हूँ जहाँ  सूर्य अगर एक दिन गलती से निकल आए तो फिर हफ़्तों वहाँ अंधेरा रहता है। 

ख़ैर ! सब ठीक है। मैं ठीक हूँ। अलग अलग स्टेटस लोगों की अलग अलग यात्राओं से भरे हुए हैं। परीक्षा एक बड़ा कारण है कि मध्यमवर्गीय लोग भी घूमने निकल लेते हैं, वरना तो जो जीवन है आदमी को फुरसत कहाँ है। मेरी यात्रा उस शहर से यहाँ के खेत तक ही है। मैं यहीं इस जेल में खुला हुआ हूँ। 

― 1 जून 2025 / रात 1: 40 बजे 


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