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मई, 2025 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

समझाइश

मैं जब जब अपने आप को आश्वासन देकर खड़ा करने का प्रयास करता हूँ, तभी कुछ ऐसा घटता है की मैं फिर भरभरा कर गिर पड़ता हूँ। जीवन की क्षणभंगुरता के रोज नए नए प्रतिमान देखने को मिल रहें हैं। हर तरफ जैसे अजीब सी कोई छाया टहल रही है थोड़ा सख़्त होकर कहें तो दौड़ रही है, जैसे हम बचपन में खो खो खेलते थे बिल्कुल वैसे कब किसपर धप्पा देकर उठने बोल दें पता नहीं, दोपहर एक परिचित से बात हुई, हमारी कस्बाई बाज़ार में उनकी दुकान है, पिताजी अच्छे डॉक्टर हैं, मगर उन्होंने अंतरजातीय विवाह किया तो 2019 से ही परिवार से सम्बंध खत्म है। जिस लड़की से शाक़  दी किये थे उसे हमने दो चोटी बांधे पढ़ने जाते देखा था, उनका स्कूल के दिनों का प्यार था। साथ बीटेक किया और फिर साथ ही रहने लगने, प्रेम के लिए लड़े, परिवार छूट गया। और अब पता चला है कि उसे ब्लड कैंसर है। वो बेचारा जो उस लड़की के फोन ऑफ हो जाने पर रोने लगता था, अब कैसे और क्या क्या सोच रहा होगा, उन्होंने जीवन के कितने सपने देखे रहें होंगे, सब अब कुछ महीनों में खत्म हो जाएगा, उसके जाने के बाद उस लड़की का क्या होगा यह सोचकर मेरी आत्मा सिहर जाती है, परिवार से दूर ...

अनुस्यूत

आह और कराह के स्वरों में ध्वनि नहीं होती है। ये बिना ध्वनि के एक अदृश्य तरंग की तरह कम्पित करते चलते हैं। यह जहाँ टकराते हैं गहरा घाव करते हैं, गहरा इस अर्थ में कि इनका कोई रूप तो होता नहीं कि कहा जा सके फलाँ व्यक्ति की आह से इतनी चोट लगी, या उसकी कराह की तीव्रता इतनी थी कि मेरा दिल फलाँ इंच या फलाँ सेंटीमीटर पसीज गया।  हमारी संवेदना व्यक्ति बद्ध होती है। उसे चोट बीमारी या कोई तकलीफ से फ़र्क तभी पड़ता है जब वह किसी ऐसे व्यक्ति को हो जिसकी वजह से हमारी दिनचर्या प्रभावित होती है।  ********* न जाने किसने कहाँ कहा है कि ' जो हमारे बिना रह सकते हैं, उन्हें हमारे बिना ही रहना चाहिए ' ये वाक्य बीते महीने में मुझे लगातार रह रह कर याद आता रहा।  ******** हम सबसे सच्चे प्रेम में होते हैं, और झूठ भी प्रेम में ही प्रेम के लिए बोलते हैं। मैंने बहुत झूठ बोले हैं। मुझे उसपर कोई पछतावा नहीं होता, मौका मिला तो भविष्य में और बोलूँगा बोलता रहूँगा। मगर अपने प्रिय से नहीं, प्रिय के साथ रहने के लिए और तमाम दुनिया से... झूठी दुनिया से झूठ बोलने के क्या ही दिक्कत है।  ********** अगर आप यह देखन...

इच्छाओं का समुच्चय

ऊपरी स्तर पर इच्छाएँ जितनी सुंदर और सपाट दिखती हैं इच्छाओं के तल में उतरने पर वह उतनी ही लिजलिजी और अजीब सी महसूस होती हैं। इच्छाएँ पानी और आग दोनों हैं वो न हों तो भी दिक्कत है हों और सीमा से अधिक हों तो भी दिक्कत है। जब दो लोग जुड़ते हैं तो उनके बीच इच्छाओं का संसार जुड़ता है, आत्मा जुड़ती है तो देह भी जुड़ने का रास्ता खोजती है। मगर क्या हो अगर एक को जो इच्छाएँ सुंदर लगतीं हों अगले को बिल्कुल बेकार ? क्या ऐसा संभव है ? या कोई भीतरी डर है जो हमारे भीतर की स्वाभाविक और मानवीय इच्छाओं पर हावी है ? यह प्रश्न सृष्टि के निर्माण से अभी तक यथावत है और रहेगा कि इच्छाओं का अगर जन्म मन में हो रहा है तो क्यूँ न आदमी उनकी पूर्ति के लिए भागे ? और अगर भाग रहा है तो इसमें गलती किसकी है इच्छाओं की या मनुष्य की ? मुझे इसका कोई ठीक उत्तर सूझता नहीं, हम मनुष्य को गलत ठहराकर इच्छाओं को दोषमुक्त नहीं कर सकते, फाँसी लगा लेने वाले से ज्यादा बड़ा दोषी उसे फाँसी लगा लेने को मजबूर करने वाला है। है कि नहीं ? तो फिर इसका क्या उत्तर हुआ ?  मन ऐसे तमाम सवालों से घिरा रहा। मगर जवाब कोई ऐसा नहीं मिला जिसस...

द्वंद्व ही द्वंद्व का उत्तर है।

मन बड़ा व्यसनी है। मन धूर्त है। मन बहानेबाज है। मन सहारा ख़ोजता है। मन बिल्कुल उस आदमी की तरह है जो बैठते ही आधा लेट जाने का प्रयास करता है। यह सब वाक्य मेरे नहीं हैं मेरे पिताजी के हैं। परसों की रात फोन करके रोने लगे। उन्हें मेरी याद आ रही थी। जैसे जैसे उनकी उम्र बढ़ रही है ( यह लिखते हुए मुझे इतना डर लग रहा है कि मेरी आँख भरी हुई है। बाईँ आँख ) वो और भावुक होते जा रहे हैं। मैं उनका सेम टू सेम कॉपी हूँ। लगभग वही स्वभाव है बस वो ज्यादा कामकाजी और दृढ़निश्चयी आदमी हैं, मैं नहीं, मैं आलसी हूँ। मैंने बिना बताए बस पकड़ा और उनके सामने खड़ा हो गया अगले कुछ घण्टे बाद, मुझे देखते ही भईया बोलकर सीने से कस लिया और रोने लगे, पूछ रहें हैं उसे क्यूँ नहीं लाए, मैंने कारण बताया, बैठे, मुझे ऐसे दुलारते रहे जैसे गाय अपने नवजात बच्चे को दुलारती हैं, मैंने फोन किया और पकड़ा दिया, पापा मुश्किल से दो शब्द बोले होंगे और फिर रो पड़े, उनकी आँखों में ऐसे आसूँ मैंने बाबा के मरने पर देखा था। जब वो दालान वाले कमरे के दरवाजे का एक पल्ला पकड़ कर बस फफक फफक कर रो रहे थे। आदित्य की मृत्यु पर तो जैसे पत्थर हो गए थे...

सोच की दुनिया कितनी छोटी होती है

सुख असंगत दिनों में न जीने की इच्छा को जीने की इच्छा में बनाए रखने के लिए खोजा गया एक छली शब्द है। हम जीवन की लगभग क्रियाओं को दोहराते हैं, हम एक बार में कुछ नहीं कर पाते हैं, हम जन्म लेने के बाद एक बार फिर जन्म लेते हैं जब हमें पता चलता है कि मरना भी कुछ होता है, हम एक बार हँसने के बाद दुबारा हँसते है एक बार उस क्षण पर फिर उस क्षण में हँसी गयी हँसी पर हँसते हैं। हम दो बार रोते हैं एक बार उस बात पर जिससे रोना आता है दोबारा अपने रोने पर रोते हैं।रोने पर रोना सामान्य रूप में रोने से ज्यादा घातक है। हृदयविदारक है। हम प्यार भी दो बार करते हैं, एक बार तब हम उस भाव को शब्द देते हैं जो किसी को देखकर हमारे भीतर उपजा था दुबारा तब जब हम भूल जाते हैं कि हमने क्या शब्द दिया था। और इंतज़ार.. कई बार करते हैं इंतजार.. एक बात कही जाती है .. ' काहे खून जला रहे हो ' ऐसी ही एक बात और है 'क्यूँ माथा फोड़ रहे हो अपना' ये दोनों बातें हमेशा अपने लिए नहीं दूसरे के लिए समझ आतीं हैं। हम अपने मामले में महसूस ही नहीं पाते कि हम क्या कर क्या रहें हैं हम माथा फोड़ रहें हैं या खून जला रहें ह...

बीते दिन की बात

बीते हुए दिनों को बीते हुए दिनों की तरह याद करता हूँ और सोचता हूँ क्या बीतते दिनों के साथ भी ऐसे ही याद कर पाउँगा बीते दिनों को.. देख पाऊँगा की पिछले, उसके पिछले और उसके पिछले साल क्या क्या कहा और किया था आज के दिन। अगर मिटाए और डिलीट न किए जाए तो अब किसी की जीवनी लिखना पहले से ज्यादा आसान काम है। चैट उसकी डायरी है जहाँ वो निर्वस्त्र भी है और सजा धजा भी, वहीं उसकी पनीली आँख भी है और गर्व से चमकदार भी, वो वहीं किसी से रोया गिड़गिड़ाया है, किसी को धमकाया भी है।  लगभग बीत चुके की याद बीत चुके की तरह नहीं ग्लानि की तरह आती है।  आज का दिन भी किसी दिन के लिए बीता हुआ दिन हो गया। ऊबते ऊँघते और पसीना पोछते बीता दिन। कुछ रचनात्कम नहीं, कुछ विशेष नहीं, बस बीत गया। भीतर कोई इंतज़ार चलता रहा और ख़ुद से ही सवाल करते जवाब देते समझते समझाते बीत गया। बीत जाना ही था।  ढ़ेर सारी किताबें देख रखी थीं इकट्ठा कर रखी थी ये ले लूँगा पर सब... अब जो कुछ कहीं से जुड़ता जुहाता है, घर में या घर के लिए हो जाता है। एक चश्मा बनवाना है जो जनवरी में हुए एक्सीडेंट में टूट गया था, तबसे यूँ ही टालते हुए टल रहा है,...

बुद्ध विषयक

बुद्ध को सच ही लाइट ऑफ एशिया कहा गया है। वह उन सभी काम की कुछ बेकाम की चीजों को जलाकर अकेले खड़े हुए थे जो नष्ट होने की कगार पर थे।  बुद्ध राख को भस्म नहीं, भस्म को राख कहने वाले थे।  गौर से देखा जाए तो उनका पथ कहीं से इतना नया नहीं था कि समझ से परे हो, उनके जन्म के समय के चमत्कार और भविष्यवाणी बिल्कुल वैसे ही है जैसे अन्य गढ़े और स्वीकारे गए देव पुरुषों के हैं।  बुद्ध इस भीषण संसार में ऐसा कोना हैं जो आपको भागने की जगह देते हैं और अपने भागने को उचित ठहराकर लौट आने का भी। बुद्ध छली हैं और डरे हुए भी। वो जिससे जन्में उम्र भर उसी से भागते रहे। उनकी तमाम शिक्षाएं भागने के बेहतर और लोक स्वीकार के तरीके हैं।  बुद्ध भारतीय संस्कृति में चारो ओर जड़ बना चुके बूढ़े पेड़ों के बीच खड़े अकेले बेल क्राफ्टेड पेड़ थे। उन्होंने पुराने पेड़ की शाखा काट दी जड़ वही रखी, एक पुरानी जड़ में उन्होंने एक नए पौधे की कलम दी और वह चल निकला। बुद्ध मरघट की जीवटता वाले हैं। बुद्ध हैं क्योंकि हम जन्मना बुद्धु हैं।  बुध्द हमारी बन्द आँख की दोनों पलकों को अपने हाथ की उंगलियों से जबरन फैलाकर क...

सूखे दिए की रौशनी में

कोई एक आवाज, कोई एक तस्वीर, कोई आँख, जिसमें अपने को देखा जा सके, कोई मन जहाँ हम दुनिया की हर शय से पहले हों, कोई एक शब्द, कोई एक सरल सा शब्द, या पुकार जिससे आप पुकारे जाना चाहते हों आपके दिनभर की या शायद हफ्ते या महीने भर की ताकत होता है, हम उसी अनुगूँज को बार बार सुनते हैं, कान के पास धीरे से सँकोचित आवाज में दो होंठो से निकली ध्वनि में नाचते रहते हैं। जैसे ढिबरी की बाती के रेशों से चढ़ते तेल से ज्योतिर्मय रहती है ढेबरी बिल्कुल वैसे आदमी अपनी पसंदीदा आवाज़ और स्पर्श में .. जैसे जैसे वह तेल कम होता है पहले कपड़ा जलता है, फिर ढिबरी बुझ जाती है, दुबारा जलाने के लिए हमें कपड़ा बदलना पड़ता है। कपड़ा बचा रहे इसके लिए जरूरी है तेल मिलता रहे, कपड़ा आदमी की शक्ल है। तेल उसके साथी का प्रेम। ****** मैं महीने भर से लगभग माचिस खरीदने की सोच रहा हूँ, लगभग हर तीसरे या चौथे दिन सोचता हूँ आज तो माँग ही लूँगा पर नहीं माँग पाता, हर मंगलवार जब नहा कर खड़ा होता हूँ तो अपने को कोसता हूँ, और हर दिन दूध लेकर लौटते सोचता हूँ, माँग लेना चाहिए था। पर न जाने कौन सा संकोच बैठा है, मैं माँग ही नहीं पाता, घर के...