सीधे मुख्य सामग्री पर जाएं

संदेश

मेरे कानों में ग्लूमी सन्डे गाने की धुन गूँज रही है

आँख की निचली पलक काट लेने तक रोया गया। मैं रोना चाहता नहीं हूँ. मजबूर होता हूँ। इन दिनों लगातार मन एक अजीब सी हताशा और ऊब से भरा रहा जिससे पिछले कई बरसों से भरा रहता है। सपने ध्वस्त हो गए। जीवन फिर उसी लीक पर जाता हुआ दिख रहा है जैसे अब तक बीता है। मैं न आत्मिक रूप से संतुष्ट हूँ न दैहिक न मानसिक हर जगह एक समझौता सा कर रहा हूँ और जी रहा हूँ, वो समझौता किसके लिए और क्यूँ कर रहा हूँ पता नहीं, बस कर रहा हूँ। भीतर एक ग्लानि मिश्रित क्रोध ने डेरा जमा लिया है। मैंने मरने के सपने देखे, भाग जाने की इच्छा बनाई पर हर जगह असफल रहा।  मैं अपने को जहाँ भी खपाता हूँ वहीं से मैं बहिष्कृत सा बाहर निकल आता हूँ । कहीं भी मेरे अस्तित्व का मूल मुझे मिलता नहीं है। मेरी भावनाओं पर मेरा परिवार भी वैसा ही रिएक्शन देता है जैसे दूसरे बाहरी लोग देते हैं।  इधर आँख से दिखना थोड़ा और कम हुआ है, बीपी इतनी बढ़ी रहती है कि लगता है हमेशा भीतर एक नहीं कई दिल धड़क रहें हैं। नींद कई कई जतन करके भी नहीं आती। ये आर्थिक रूप से बहुत बेकार महीना गुजरा, उन सब ने हाथ खड़े कर दिए जिन जिन के लिए मैंने काम किया है। ...
हाल की पोस्ट

ये सिलसिले पुराने हैं

अब निकले प्राण की तब निकले की तरह दिन अजीब सी उलझन में बीता। क्या किया, क्या खाया , क्या पिया कुछ पता नहीं। बस दिन भर फोन की घण्टी का इंतज़ार करता रहा, नोटिफिकेशन की आवाज भी आती तो देर तक साँस बढ़ जाती। मन जैसे सड़ी हुई लकड़ी की तरह पट पट टूटता रहा। प्रतीक्षा करते हुए व्यक्ति के चेहरे पर दिख जाता है कि वो प्रतीक्षा में है। जैसे ऑपरेशन थियेटर के बाहर बाप नाचता है आशंका से भरा हुआ वैसा ही कुछ कुछ हाल रहा। मैं कभी कभी सोचता हूँ मैं कितना गिड़गिड़ाता हूँ ! यह छोड़ देना चाहता हूं। मगर छोड़ नहीं पा रहा हूँ.. जैसे यह देह छोड़ देना चाहता हूं छोड़ नहीं पा रहा।  सुबह देवव्रत का फोन आ गया था तो उनसे देर तक अकेलेपन, बेचैनी, ऊब, रचनात्मक उलझन के विषय में बात होती रही। बात करते करते ही मुझे ख़्याल आया कि अन्ततः जो कुछ हम सारी दुनिया को धता बताकर चाहते हैं वही हमसे दुनिया की तरह व्यवहार करने लगता है।  मन कसना, मन मारकर हँसना, और फिर वही वही करना जिससे कोफ़्त होती है इन दिनों यही जीवन है पिछले कई सालों से। बोलने में ख़ैर बढ़ता जा रहा है।  अन्तोगत्वा दिन वैसा ही बीता जैसा नहीं चाहता था कि बीते, आज का द...

नए में नया कुछ भी नहीं

हर आम दिन की ही तरह रहा आज का दिन भी और कल की रात भी, रात में और आंख तर होती रही थी। भागकर घर चले जाने का मन होता रहा पर भागना कहाँ हो पाता जब एक बार जीवन जाल में फंस जाओ तो..  अकेले थे। बिल्कुल अकेले। जो मुझे बिल्कुल पसंद नहीं। किताबें पढ़ने का प्रयास किया, असफल रहा। उसके बात करने का प्रयास किया, असफल रहा। नींद नहीं आई। सोचा हुआ न हो तो भीतर की सारी ऊर्जा देर तक मेरे साथ तो कई दिनों तक हिली सी रहती है, मैं बता भी नहीं पाता कि मुझे बुरा लग रहा है या मुझे ये चाहिए, दरअसल मुझे क्या चाहिए यह मैं जान ही नहीं पाता। सुबह पैदल दूर तक चलता रहा। सर्द इन दिनों बढ़ी हुई है। गलन से लगता है, नाक कान अँगुलियां कट जाएंगी। पर ऐसी सर्द सुबह में टहलना मुझे बहुत पसंद है, बड़ी नीरवता रहती है, आसपास धुंध के अलावा कुछ नहीं होते, इन दिनों कुत्ते के छोटे छोटे बच्चे टहलते रहते हैं, उनके साथ खेल लेता हूँ, एक ही तरह से बना हुआ मुँह कुछ पल को इधर उधर हो लेता है।  दोपहर तक सोचता रहा कोई तो नए वर्ष पर फोन कर दे, नहीं आया तो खुद ही कर दिया। उसे ही जिसे कर सकता हूँ बिना झिझक।  आज दिनों बाद मुझे लगा कि मैं ...

न चाहने की चाह में

जैसे कुछ अटक गया हो हलक में और मैं उसे कई जतन करके भी उगल नहीं पा रहा हूँ। कई कई दिनों की चुप्पी मुझपर इतनी चिपक गयी है कि मैं अब मुँह खोल रहा हूँ तब भी नहीं बोल पा रहा हूँ। सब कुछ उसी ढर्रे पर चल रहा है जैसे पिछले कई वर्षों से चलता चला आता है। रो कर सुख गई आँख आसुओं के खारेपन से कर्राए गाल पर एक पतली रेख सी खींच गई है। मैं उसे अपने फोन का फ्रंट कैमरा ऑन करके देख रहा हूँ और सोच रहा हूँ सरस्वती नदी ऐसे ही सूखी होगी।  जाने क्या है मेरी नियति में जहाँ जहाँ मैं अधिक जुड़ जाता हूँ वहीं पराए की तरह अपने को महसूस करने लगता हूँ, एक दिन यूँ ही बात करते हुए देवव्रत ने कहा " अब आपके पास अपनी भाषा है अपने बिम्ब है गहरी संवेदना है अब आप कुछ बड़ा लिखिए कुछ ऐसा जो बस आप लिख सकते हैं, आपके तरह की भावुकता और वैचैरिकी समकालीन किसी गद्यकार के गद्य में नहीं दिखती"  उस दिन से अपने से सवाल करता रहा, मैं क्या लिखना चाहता हूं ? और मुझे कोई जवाब ही नहीं मिलता, मैं उस दिन से एक शब्द नहीं लिख पाया, कहाँ मैं रोज लिखता था कमसे कम दो हज़ार शब्द तो रोज, वो इन दिनों दो सौ भी नहीं हो सके, मैं प्रयास करता तो शब्...

चक्कर ही चक्कर है दुनिया में

जीवन आवृत्ति के सिवा क्या है? हम जहाँ से ऊबकर थककर परेशान होकर भागते हैं फिर वहीं लौट आते हैं न चाहते हुए भी,  इस आवृत्ति में ही सब शामिल होता जाता है और हम भारी होते जाते हैं। हल्के हम मृत्यु से भी नहीं होते, मृत्यु हमें हल्कापन नहीं देती, आवृत्ति का बोझ उठाए चलते रहने से थकी देह को आराम देती है कि लो बैठ लो आगे फिर चलना है, इस आवृत्ति में मिला बोझ उठाकर ही..  अनन्त का जो चिन्ह है उसे कभी करीब से देखो तो कितना भयावह है वह, कोई ओर छोर ही नहीं..  कुछ शब्द बार बार मन में घूमते हैं, उन्हें लिख चुका हूँ, फिर उन्हें लिखना नहीं चाहता, अब उन्हें सोचना भी नहीं चाहता, फिर भी वो मेरा पीछा नहीं छोड़ते.. काश छोड़ देते !  कई सालों के कैलेंडर उठाकर देख लिया है, उसमें कोई ऐसी तारीख नहीं जिसमें मैं पूरा दिन सुख से जिया होउँ, चिंता, अपमान, ग्लानि, नाम की कोई रस्सी हर दिन मेरा गला कसती गई है। कसती गई है। धीरे धीरे मैं कसाव का आदी हो गया। अब मुझे कसाव और जकड़न में ही चलने की आदत है, स्वतंत्रता में चलने में बड़ा अजीब महसूस होता है।  जीवन के बीतते हर दिन के साथ मैं यह महसूस करता जा रहा ...

टूटने पे आए तो कोई ऐसे टूटे

हर दिन एक नए टुकड़े में टूटते हैं और देखते हैं कि कोई उसमें देख रहा है खुद को फिर उस टुकड़े को जोड़ते नहीं कि उसकी छवि न बिगड़े, हम अपने को बिगाड़ लेते हैं, इस सिलसिले में एक टुकड़े भर भी नहीं बचे हैं। जैसे एक बड़ा सा आईना टूटे तो कई छोटे छोटे आईने हो जाते हैं वैसे ही एक जीवन टूटे तो वह भी कई जीवनों को जीवन देखने भर की सहजता दे देता है। हम वैसे ही हो गए हैं। मन की तरह मेरी कलम की इन दिनों हताश है लगभग टूटी हुई सी, सोचता कुछ हूँ लिखता कुछ हूँ। चाहता हूँ कुछ कहता हूं कुछ, स्वीकार कुछ और करता हूँ  कुछ आने की आहट में जो उत्सुकता और आकुलता जन्मती है, वो उसके जाने के बाद एक गहरी वीरानी के रूप में उभरकर हृदय पर छा जाती है। मन कहीं का होकर भी कहीं का नहीं होता। हँसने हँसाने के हर जतन बोझिल लगते हैं। चाह की राह पर मन न होते हुए भी डाइवर्जन का साइन बोर्ड लगाना पड़ता है। आप देखते हैं कि वो रास्ते और लोग अंजान से हो गए हैं जिन्हें आप जानने का दावा करते रहे हैं। भरी भीड़ में आप अकेले खड़े हैं अपने किए कर्मों की डायरी लिए हुए जो आपने औरों के लिए किए थे। जिसके आप भी हकदार थे, लेकिन आया आपके हिस्से कुछ न...

फिर वही रात है

आज मेरा जन्मदिन था। लगभग और दिनों की तरह ही बीता , कुछ प्रिय जनों ने विशेष महसूस करवाया। विशेष होने की अनुभूति से बचते हुए भी विशेष होने की अनुभूति घेर ही लेती है। यह अनुभूति भीतर अजीब सी चुभन पैदा करती है तब और ज्यादा जब आप जानते हों कि आपने साल दर साल असफलता की एक ऊँची इमारत खड़ी करने के अलावा कुछ विशेष नहीं किया है। सुबह से कई सारे फोन आए कुछ उठा सका कुछ नहीं। सैकड़ों मैसेज, और स्टोरीज के जवाब अब भी बचे हुए हैं। सबने याद रखा। सबने प्यार दिया। फिर भी पूरा दिन एक अजीब-सी खाली जगह बनी रही, जैसे कोई मेरे सीने में बड़ा-सा छेद कर गया हो और उसे कोई देख ही न पाए। सुबह देर से सोकर उठा, लगभग दोपहर में, फिर और सो गया तो चार बज गए, दिन बिल्कुल सुखद रहा, दिनों बाद सुख की नींद नसीब हुई। शाम को रोहित लोग आए तो बाहर गया, सब किताबें लेकर आए थे, मैं उन सबका प्यार देख भावुक हो गया, अभी सब बेरोजगार हैं और इतना प्रेम..मैं कुछ नहीं कर सका आजतक उन लोगों के लिए।  केक कट किया गया, तस्वीरे ली गईं, हँसी हुई और फिर सब अपनी अपनी दुनिया में। अब कमरे में मैं अकेला बैठा हूँ। केक का आधा हिस्सा फ्रिज में पड़ा है...