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बिल्कुल खाली उदास और डर से भरा हुआ दिन.. कल रात नींद नहीं आई उसका बोझ अभी तक माथे पर लदा हुआ है।आज देखते हैं ― 20 नवंबर 2025

मैं किस दरवाजे से आया था

बीते तीन दिन बिस्तर पकड़े बीत गया, बुखार और सर्दी ने जो हाल किया है कि पूछो मत। आज गले से कुछ आवाज निकल रही थी, इन दिनों में बस एक मौन स्वर में पुकारता रहा कि काश कोई तो कुछ घड़ी बैठे मेरे सिरहाने, पर यहाँ इस शहर में अकेले पड़ा हूँ, कभी कभी सोचता हूँ, कहीं किसी दिन ऐसे मर गया तो लोगों को पता भी बड़ा देर से ही चलेगा। कहने को इतना.. ख़ैर  सारे जतन किए जिससे जितना जल्दी ठीक हो सकूँ हो जाऊँ पर यह सही होने का नाम नहीं ले रहा, आज दोपहर में बुखार यूँ था की देह काँप रही थी। इन दिनों में कुछ नहीं किया बस बिस्तर पकड़े पड़ा रहा, कुछ कविता संग्रह पलटता रहा, कुछ कहानी पढ़ी, दो फिल्में देखी, 'बारामुला' और 'स्कारफेस'.. दोनों अपने आप में अपने कॉन्सेप्ट में अदभुत हैं। कश्मीरी पंडितों पर हुई बर्बरता को बारामुला में जिस ढंग से दिखाया गया है वो बिल्कुल नए ढंग का है, बिल्कुल कसा हुआ निर्देशन, मन काँप के रह जाता है।  स्कारफेस 80 के दशक में क्यूबा शहर के शरणार्थियों और ड्रग माफिया गैंग की कहानी है, फ़िल्म में अल पचिनो ने अपूर्व काम किया है, उनके हाव भाव से दहशत भरती है वह देर तक रहती है।  आज दिन भर कु...

पता नहीं क्या , मगर कुछ

ज़िंदगी की गाड़ी जैसे ही पटरी पर चढ़ने लगती है कोई कहीं न कहीं से कुछ ऐसा प्रबंध कर देता है कि फिर उतर जाए और उतर जाती ही है क्योंकि आदमी के जीवन में रिश्तों का जाल ऐसा है कि जाल का कोई एक धागा कहीं से टूटे टूटता पूरा जाल है। मन जैसे ही कही न कहीं से आश्वस्त होने लगता है कोई न कोई घटना ऐसी घट जाती है कि ..  दिन अजीब सा बीता, कल शाम से मन थका सा था, टूटा सा कुछ कुछ वह बना रहा, कुछ कुछ पढ़ पाया, सोची हुई योजना पर समय ने अपनी योजना रखी और कुछ भी मन का नहीं हो सका। चिल्लाते लड़ते और कुछ जनों के गंवारपने पर कोफ़्त खाते बीत गया। भीतर इतनी बातें, इतना क्रोध इकट्ठा हो गया था कि शरीर उसे पचा नहीं सका। अन्ततः ख़ूब उल्टियां हुईं। एक मित्र दिल्ली से आए थे उन्हें समय न दे सका, दुःख इस बात से अधिक है कि वह समय मैं न अपने को दे सका न अपने मन को ही। बस कल्पता रहा, भीतर एक अजीब सी कुढ़न होती है। कभी कभी मन होता है अपना सिर फोड़ दूँ। कल मुझे देर रात तक समझाया गया था, मैं उसे लागू करने का प्रयास कर रहा था और फिर आज.. मैं जिस चीज़ से जितना कटना चाहता हूं उतना ही फँसता जाता हूँ। अब तो लगने लगा है ऐसे ही फँसे फँस...

जीवन के इंद्रजाल में

इन दिनों में मन बासी भोजन की मानिंद हुआ रहता है। मिर्च मसाला पाक सब सही होने के बावजूद स्वाद गायब है, स्वाद उस भीतरी गर्मी से था जो भोजन में अब नहीं है।  कल की शाम खुशनुमा थी। आलोक ही आलोक था चारो तरफ, पटाखों की गूंज थी और दीपों की रौशनी। पर यह आलोक मनुष्य की उपस्थिति से धूमिल हुआ जाता था, अब हर जगह आदमी इतने हो जाते हैं कि कितनी भी व्यवस्था हो वह अव्यवस्था में बदल जाती है। मुझे साथ सुंदर लगता है, लेकिन सबका नहीं, सबके साथ को साथ कहा भी तो नहीं जा सकता, साथ वही अच्छा है जहाँ दो मस्तिष्क एक तरह की जीवन शैली के आसपास के हों, उनके पैरामीटर लगभग एक जैसे हों। इन सबके बावजूद जो सबसे जरूरी सेतु है किसी साथ में वह है टॉलरेंस और अपने से ऊपर किसी को रख सकने की क्षमता।  मौसम अब नम हो चला है, हवा न भी चल रही हो तो भी लगती है, ठण्ड अपने पांव पसार रहा है। मैं यूँ ही हल्की हवा और धूल से छींकने लगता हूँ, वही हुआ।  कुछ क्षणों को ख़त्म नहीं होने देने का मन करता है। कुछ साथ बिल्कुल नहीं छोड़ने का मन करता है, पर..  कभी कभी सोचता हूँ क्या मैं सबको विदा कहने के लिए ही बना हूँ क्...

जो कुछ हो सकता था

बहुत लंबी कविता हो या कहानी बोझिल हो जाती है, भावनाओं को ज्ञान से पाट देना किसी विद्या में सत्यापित नहीं हो सकता। अगर ज्ञान देना है या कोई तर्कसंगत बात करनी है तो निबंध या या लेख रूप है कविता कहने या कहानी कहने की जरूरत क्या है ?   मैं नहीं स्वीकार पाता। भावनाओं में तर्क कभी नहीं फिट हो सकता है। जहाँ होगा वहाँ भावना पीड़ित दमित होगी।  ********* मर्द बर्फ का पहाड़ है जिसे प्रेम की गर्मी से ही पिघलाकर जल किया जा सकता है और किसी से नहीं।  ******** दिन भर निगाह बार बार फोन पर ही रही। जाने क्या देखता अगोरता रहा। एक बात तो है.. इंतजार करने वाले को समय जितना बेहतर पता होता है उतना किसी को नहीं।  आज ख़ूब सोया हूँ, दोपहर में भी सो ही रहा था, आज व्रत था तो कुछ खाने पीने की चिंता थी नहीं, बस सोकर दिन काटने का जतन किया। कमरे के सामान  इधर उधर किया। कुछ पढ़ा। आज सातवें दिन बाहर कुछ दूर बाइक लेकर निकला।  गमले में लगाये हुए पौधों में फूल आ रहे हैं, इन दिनों अडेनियम और गुलाब खिल रहा है, रातरानी का पौधा बहुत छोटा सा है फिर भी दो चार फूल रोज रहता है। आज हरश्रिंगार में कुछ न...

बीत चुके की याद

जब मन अस्थिर हो तो कलम भी स्थिर नहीं होती, शायद नहीं हो पाती, हिलती हुई मेज पर सीधा अक्षर नहीं लिखा जा सकता। अजीब सी खीझ गुस्सा प्रेम सब भीतर दौड़ते रहे, मैं कुछ न कह सकने की अवस्था में हूँ न कर सकने के, मैंने पुकार कर देख लिया, मेरी पुकार एक दो वाक्य भर है या उसके भी नहीं।  कुछ नहीं किया सिवा बिस्तर पर पड़े रहने के अपनी इच्छाओं से जूझते रहने के क्या मैं यूँ ही झेलने और रोने के लिए पैदा हुआ हूँ ..  ― 27 oct 2025

जो कुछ कहा जा सकता है

छोटी छोटी इच्छाओं पर बड़ी बड़ी जिम्मेदारी आकर बैठ जाती हैं और मन मसोस कर सोचता हूँ चलो फिर कभी.. यही करते करते 28 का होने को आया।  मैं कभी अपने किए, वादों, इरादों, देखे हुए सपनों, न जी पाए हुए पलों को सोचता हूँ और भूल जाता हूँ कि मैं यह हूँ जो यह लिख रहा है।  कहता हूँ और अपने कहे पर एक उदासीन भाव देखकर सोचता हूँ, काश !  यह कहा हुआ, अनकहा हो सकता या इस कहे की और उसपर न हुए अमल की स्मृति को मिटाया जा सकता तो मिटा देता, पर यह कहाँ सम्भव है। हम धीरे धीरे यह महसूस करते हैं कि हमारी ताकत, हमारा चार्म मिट रहा है और हम उसे मिटते देखते हैं।  भारतीय जीवन संस्कृति जिस तरह बनी है और हमारे भीतर जिस तरह के संस्कार भरे गए हैं वो हमें बचपन से भीरु बनाते हैं, हमें संशयी बनाते हैं कि हम अपने फैसले और अपने लिए फैसले तो ले ही न सकें। हमने तमाम दर्शन बनाए, ख़ूब नीतियां गढ़ी पर जब जमीन पर देखो तो सब बेकार है, वहाँ बनाने वाला ही वही कर रहा होता है जिसे वो करने को मना करने को लिखता कहता है। इतनी गुथमगुत्थी है कि कोई एक डोर पकड़ो तो उसे और कई डोर पकड़ कर कस लेतीं हैं, आप अकेले निकलना चाहें तो आपको...